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क्या पूर्वोत्तर के लोगों की अस्मिता ख़तरे में है, नागरिकता विधेयक से बढ़ेगा संकट?

नागरिकता संशोधन विधेयक ने पूर्वोत्तर में  ख़ुद को असुरक्षित समझने वाले और अपनी अस्मिता व पहचान बरक़रार रखने के लिए जूझ रहे लोगों का डर और बढ़ा दिया है। जो लोग यह मान कर चल रहे थे कि वे अपने ही घरों में अल्पसंख्यक हो जाएंगे और बाहरी लोग उनके संसाधनों का दोहन करते हुए वहाँ बहुसंख्यक बन जाएंगे, उनका डर मानो सामने खड़ा उन्हें ललकार रहा है। नतीजा सामने है, पूरा पूर्वोत्तर उबल रहा है।

पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) और अब नागरिकता संशोधन विधेयक, इन दो चीजों ने असम समेत पूरे पूर्वोत्तर को उद्वेलित कर रखा है। अधिकतर लोगों का कहना है कि ये दोनों चीजें एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। लोगों का यह कहना भी है कि पहले एनआरसी के ज़रिए ध्रुवीकरण किया गया, हिन्दू-मुसलमान विद्वेष बढ़ाया गया, लेकिन जब ऐसा लगा कि इससे बीजेपी का कोर वोट बैंक भी प्रभाावित हो सकता है, उसे दुरुस्त करने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक का दाँव चल दिया। यह एक तरह से डैमेज कंट्रोल है। 
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असम में विरोध ज़्यादा तीखा क्यों?

बराक घाटी को छोड़ कर पूरे राज्य में लोगों को यह डर सता रहा है कि बांग्लादेश से आए लोगों की वजह से उनकी भाषा और संस्कृति बुरी तरह प्रभावित होगी। बराक घाटी में बांग्ला भाषियों की तादाद ज़्यादा है, नतीजतन, वहाँ के लोग नागरिकता संशोधन विधेयक से खुश हैं। पर राज्य के दूसरे इलाक़े के लोग बुरी तरह नाराज़ हैं।

नागरिकता विधेयक में कट ऑफ़ डेट 31 दिसंबर 2014 है, यानी इस तारीख तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए हुए लोगों को नागरिकता दी जाएगी। लेकिन असम के लोगों का कहना है कि वे तो 1951 से 1971 के बीच लाखों की तादाद में घुस आए बांग्लाभाषियों से परेशान हैं क्योंकि इससे उनकी अस्मिता ख़तरे में है। इन लोगों का कहना है कि वे केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं कर सकते, यह विधेयक असम समझौते को निष्प्रभावी कर देगा।

असम समझौते में यह प्रावधान किया गया था कि दिसंबर 1971 के बाद बांग्लादेश से आए हुए लोगों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर कर दिया जाएगा। पर नागरिकता संशोधन विधेयक से ऐसा नहीं हो सकेगा, उन लोगों को नागरिकता मिल जाएगी।

इनर लाइन परमिट का फ़ायदा नहीं

असम के लोगों का यह भी मानना है कि पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों को इनर लाइन परमिट और छठी अनुसूची का फ़ायदा नहीं मिलेगा। असम के सिर्फ़ 3 ज़िले छठी अनुसूची में आते हैं, जहाँ यह विधेयक क़ानून बनने पर लागू नहीं होगा। इस अनुसूची के तहत आदिवासी बहुल ज़िलों को स्वायत्तता मिली हुई है, नतीजतन, वहाँ इस विधेयक के प्रावधान लागू नहीं होंगे। 

पूर्वोत्तर की नस्लीय बुनावट

इस विधेयक के ख़िलाफ़ पूर्वोत्तर के लोगों के उबलने की एक दूसरी और बड़ी वजह राज्य की नस्लीय बुनावट भी है। पूर्वोत्तर में 238 मूल आदिवासी जनजातियों के लोग रहते हैं। ये पारंपरिक हिन्दू नहीं हैं, वे अपनी जनजातीय मतों को मानते हैं। इनमें तिब्बत-बर्मा मूल, खासी-जयन्तिया और मॉन्ग-ख्मेर मूल की जनजाति के लोग प्रमुख हैं। वे न तो हिन्दू हैं हैं न ही वे मैदानी इलाक़ों के अर्थ में भारतीय। उनकी भाषा-संस्कृति, खाना-पीना और तमाम दूसरी चीजें बिल्कुल अलग हैं। 

इस तरह की जनजाति के लोगों के लिए बांग्ला भाषी या उस तरह का दूसरा कोई भी आदमी बाहरी है।
उन्हें लगता है कि ये लोग बाहर से आकर उनके बीच बस रहे हैं, उनके संसाधनों को दोहन कर रहे हैं, उन्हें धीरे-धीरे पीछे धकेल रहे हैं। एक दिन आएगा जब ये बाहरी लोग उनकी तमाम चीजों पर कब्जा कर लेंगे और वे अपनी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक और दूसरों की दया पर निर्भर होने को मजबूर होंगे।

अल्पसंख्यक होने का डर

बाहरी लोगों के प्रति अविश्वास की भावना पूरे पूर्वोत्तर में है और सभी बाहरी लोगों के लिए है, सिर्फ़ बांग्लाभाषियों के लिए नहीं। मसलन, अरुणाचल प्रदेश के लोग बांग्लादेश से आए बौद्ध चकमा लोगों को नागरिकता दिए जाने के ख़िलाफ़ हैं। मिज़ोरम के लोग नहीं चाहते कि बांग्लादेश के चटगाँव इलाक़े से आए ब्रू और रियांग जनजाति के बौद्धों को नागरिकता दी जाए। हज़ारों की तादाद में ब्रू आदिवासी बीते 21 साल से त्रिपुरा के शरणार्थी कैंपों में शरण लिए हुए हैं। वे मिज़ोरम जाना चाहते हैं और मिज़ोरम उन्हें घुसने नहीं दे रहा है, जहाँ से उन्हें खदेड़ दिया गया था। 

पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम के लोगों ने जब बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था, उन्हें लगा था कि यह पार्टी असम समझौते को लागू करेगी, जिसे अब तक सही अर्थों में लागू नहीं किया गया है। आम जनता को लगता था कि एनआरसी बनने से कम से कम बांग्लाभाषियों पर कुछ लगाम तो लगेगा।
कुछ लोगों को यह उम्मीद भी थी कि एनआरसी को लागू किया जाएगा और बाहर के लोगों की पहचान कर उन्हें बाहर कर दिया जाएगा। 

उम्मीद के उलट निकली बीजेपी?

इसके उलट हो रहा है। असम के लोगों को यह देख हैरानी और निराशा हो रही है कि कहां तो वे दिसंबर, 1971 के बाद आए लोगों को निकालना चाहते थे और कहां अब दिसंबर, 2014, तक बांग्लादेश से आए लोगों को नागरिकता दी जाएगी। ये भले ही हिन्दू हैं, पर हैं तो बांग्लाभाषी, यानी असमिया संस्कृति पर हावी होने का जो डर पहले था, वह बरक़रार है। 

असम के ज़्यादातर लोग एनआरसी और नागरिकता विधेयक को एक साथ जोड़ कर देखते हैं। उन्हें लगता है कि पहले तो एनआरसी के नाम पर बाहर के लोगों की पहचान करने की बात की गई, पर जब यह पाया गया कि उनमें से ज़्यादातर हिन्दू हैं तो नागरिकता विधेयक लाया गया ताकि बीजेपी का हिन्दू कोर वोट बैंक सुरक्षित रहे। 

दिक्कत यह है कि असम के लोगों को अपनी पहचान गुम होने का ख़तरा है, वे बाहरी लोगों, ख़ास कर बांग्लाभाषियों से अपनी अस्मिता की रक्षा करना चाहते हैं। उन्हें इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान। बीजेपी और असम के लोगों की सोच में यही फ़र्क सारी मुसीबत की वजह है। 
प्रमोद मल्लिक

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