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चुनाव में दिग्गज

अलका लांबा का जाना, क्या अहंकारी हो गए हैं केजरीवाल!

तो आख़िर अलका लांबा ने भी आम आदमी पार्टी (आप) का साथ छोड़ ही दिया। अलका ने पार्टी का साथ छोड़ना ही था। पिछले नौ महीनों से वह जिस तरह से पार्टी में रह रही थीं, उससे लग रहा था कि वह पार्टी में रहकर भी पार्टी की नहीं हैं। उन्हें पार्टी के सारे सोशल मीडिया ग्रुप से बाहर कर दिया गया था। उनके विधानसभा क्षेत्र चांदनी चौक में अगर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आते थे तो उन्हें बुलाना तो दूर अधिकारिक रूप से सूचना भी नहीं दी जाती थी। वह आठ महीने से केजरीवाल से मिलने की कोशिश कर रही थीं लेकिन उन्हें मिलने का वक़्त नहीं दिया जा रहा था। 

यहां तक कि सरकार और पार्टी में नंबर दो माने जाने वाले उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी उनसे मिलना गवारा नहीं समझते थे। लोकसभा चुनाव के प्रचार में केजरीवाल ने उन्हें अपनी कार में बिठाने से इनकार कर दिया था और उनसे कहा गया था कि वह काफ़िले में केजरीवाल की कार के पीछे पैदल चलें। उनके इलाक़े में सीसीटीवी लगाने की योजना को रोक दिया गया था। तंग आकर विधायक लांबा को ख़ुद मुख्यमंत्री निवास के सामने दो बार धरने पर बैठना पड़ा था। 

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आख़िर में अलका को यह कहना पड़ा कि मैं आम आदमी पार्टी के बजाय अगला चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़ना पसंद करूंगी तो फिर अलका ‘आप’ में रह ही कहां गई थीं। ‘आप’ को भी यह पता था कि अब वह हमारे साथ नहीं हैं। इसलिए यहां तक जवाब दे दिया गया था कि अगर वह ट्विटर पर इस्तीफ़ा दे दें तो भी मंजूर कर लिया जाएगा। 

आख़िरकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात के 48 घंटों के भीतर अलका ने ट्विटर पर ही इस्तीफ़ा दे दिया। ज़ाहिर है कि अब उनकी विधानसभा की सदस्यता ख़त्म करने का एलान भी हो जाएगा।

अलका लांबा 2013 में उस वक़्त कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी में आई थीं, जब यह पार्टी एकाएक दिल्ली की राजनीति में अपने पांव जमाती नज़र आ रही थी। अलका लांबा का कांग्रेस को छोड़ना सभी को हैरान करने वाला फ़ैसला था। यह इसलिए क्योंकि वह 20 साल तक कांग्रेस में रहकर उसकी महिला नेता के रूप में पहचान बना चुकी थीं। टीवी डिबेट हो या फिर कहीं भी पार्टी में तेजतर्रार युवा चेहरे की ज़रूरत हो, अलका का नाम सबसे पहले आता था। इसलिए उनका जाना कांग्रेस को अख़रा था। इस अचानक हुए हृदय परिवर्तन के कारण ही आम आदमी पार्टी कभी उनपर विश्वास नहीं कर सकी। 

भले ही अलका लांबा ने यमुना बाज़ार इलाक़े में नशे के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया हो या फिर चांदनी चौक के सौंदर्यीकरण की बात हो, पार्टी ने उन्हें कभी भरपूर समर्थन नहीं दिया। यही वजह है कि पार्टी का एक बड़ा तबक़ा जिसे केजरीवाल के निकट माना जाता है, हमेशा उन्हें शक भरी नजरों से देखता रहा। 

अलका का कांग्रेस छोड़कर आने का बड़ा फ़ैसला भी केजरीवाल को कभी यह विश्वास नहीं दिला सका कि वह आम आदमी पार्टी में ही बनी रहेंगी।

केजरीवाल का फ़ैसला मानना ज़रूरी

दरअसल, यह माना जाता है कि केजरीवाल को कुछ ख़ास लोगों के अलावा बाक़ी किसी पर विश्वास रहा भी नहीं। केजरीवाल के निकटवर्ती यह कहते हैं कि केजरीवाल किसी भी मुद्दे पर ख़ुद ही फ़ैसला कर लेते हैं और फिर उसका फरमान सुना दिया जाता है। वह कभी भी पार्टी में सलाह-मशविरा नहीं करते। सलाह-मशविरे के नाम पर सिर्फ़ उनके फ़ैसले पर मुहर लगानी होती है। 

पार्टी में केजरीवाल के फ़ैसले के विरोध का मतलब होता है बग़ावत और उस बग़ावत की सजा यही है कि आप पार्टी में नहीं रह सकते। अलका लांबा के साथ भी वही हुआ जो अब तक पार्टी छोड़कर गए बाक़ी नेताओं के साथ हुआ है।

पिछले साल दिसंबर में दिल्ली विधानसभा में एक प्रस्ताव लाया गया था जिसमें कहा गया कि 1984 के दंगों के कारण पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भारत रत्न वापस ले लिया जाए। अलका लांबा के पास उस प्रस्ताव की मूल प्रति थी जिसमें दंगों की निंदा की गई थी लेकिन राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने की बात नहीं थी। इस लाइन को बाद में जोड़ा गया और अलका ने इसी का विरोध किया। दरअसल, यह विरोध भी एक नाटक ही था क्योंकि एक तरफ तो केजरीवाल दिल्ली के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ समझौते की बात कर रहे थे और दूसरी तरफ इसलिए यह प्रस्ताव लाया गया था कि उन्हीं दिनों सज्जन कुमार को दिल्ली हाई कोर्ट ने सिख दंगों के एक मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। 

अलका का विरोध यह था कि पार्टी की मीटिंग में जो प्रस्ताव लाया गया था, उसमें बदलाव कैसे कर दिया गया। अलका यूं भी कांग्रेस से आई थीं तो इसे उनकी कांग्रेस से हमदर्दी के रूप में ले लिया गया और साथ ही इसे पार्टी से बग़ावत भी माना गया क्योंकि सच्चाई यह थी कि पार्टी ने इस मामले में भी उन पर विश्वास नहीं किया था जिसका अलका को आघात पहुंचा था।

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आपको याद होगा 14 फरवरी 2015 को जब केजरीवाल ने दिल्ली के रामलीला मैदान में दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तो ‘इनसान का इनसान से हो भाईचारा’ गाने के साथ ही यह भी कहा था कि इतनी बड़ी जीत पर अहंकार मत करना लेकिन केजरीवाल ख़ुद उस अहंकार से नहीं बच सके। 

यह सच है कि 2013 और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव केजरीवाल के नाम पर ही जीते गए लेकिन केजरीवाल को इस मुक़ाम पर पहुंचाने में जिन लोगों का योगदान था, उनमें से ज़्यादातर केजरीवाल का साथ छोड़कर जा चुके हैं। अलका लांबा इस लिस्ट में नया नाम है। 

क्या कभी केजरीवाल ने यह सोचने की ज़रूरत समझी कि आख़िर उनका साथ छोड़ने वालों की लिस्ट लंबी क्यों होती जा रही है। शायद नहीं। इसका सबूत यह है कि ज़्यादातर लोगों ने पार्टी इसलिए छोड़ी कि उन्हें केजरीवाल का अहंकार रास नहीं आया।

केजरीवाल ने कभी भी इस बात की परवाह नहीं की कि अगर कोई निकट का साथी उन्हें छोड़कर जा रहा है तो उसे रोकने का प्रयास करें। उसे मनाने का प्रयास करें। उसे जो शिकायत है, उसे सुनें और अगर वह जायज है तो उस पर ग़ौर करें। 

यहां तक कि केजरीवाल ने नाराज हुए नेताओं के आरोपों का जवाब देना तक मुनासिब नहीं समझा। इसके दो मतलब होते हैं, पहला तो यह कि आप इतने मगरूर हैं कि उन आरोपों का जवाब देना ही नहीं चाहते और दूसरा यह कि वे आरोप सच्चे हैं और आपके पास उसका जवाब ही नहीं है। 

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आवाज़ उठाने का मतलब बग़ावत!

केजरीवाल ने इस बात की भी परवाह नहीं की कि कहीं इसे अहंकार न समझ लिया जाए। प्रशांत भूषण या योगेंद्र यादव ने क्या सवाल उठाए थे? उन्होंने यही तो कहा था कि पार्टी के टिकट जिन लोगों को दिए जाएं, उनकी पड़ताल कर ली जाए क्योंकि कई टिकटार्थियों पर आरोप लग रहे हैं। यह तो ख़ुद केजरीवाल ने कहा था कि पार्टी ठोक-बजाकर उम्मीदवार खड़े करेगी लेकिन उनकी इस बात को बग़ावत मान लिया गया। 

कुमार विश्वास और आशुतोष ने भी तो दिल्ली में राज्यसभा के टिकट वितरण पर सवाल उठाए थे लेकिन उनके सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें अलग-थलग कर दिया गया। पंजाब के नेताओं ने भी संजय सिंह और दुर्गेश पाठक पर आरोप लगाए तो उन्हें किनारे लगा दिया गया। ज़्यादा दूर क्यों जाते हैं? पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली के कुछ विधायकों ने शिकायत की कि उनसे पैसा मांगा जा रहा है तो उन्हें पार्टी छोड़कर जाना पड़ा। 

कपिल मिश्रा ने भी भ्रष्टाचार के इतने गंभीर आरोप लगाए कि पार्टी की छवि तक ख़तरे में पड़ गई। केजरीवाल ने इनमें से किसी सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझा। यही वजह है कि जिस अहंकार से दूर रहने की बात वह कह रहे थे, उनका साथ छोड़ने वाले सारे नेताओं का यही आरोप है कि वह ख़ुद उसी अहंकार के शिकार हो गए हैं। यही वजह है कि यह लिस्ट लंबी होती जा रही है। 

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को जिल्लत के साथ पार्टी छोड़नी पड़ी। आशीष खेतान और आशुतोष भी केजरीवाल के व्यवहार से दुखी होकर अलग हो गए। कुमार विश्वास पार्टी का पार्टी में होना न होना बराबर है।

कपिल मिश्रा के साथ-साथ, वेद प्रकाश, अनिल वाजपेयी, देवेंद्र सहरावत, संदीप कुमार और अलका लांबा यानी छह विधायक पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। 67 विधायकों की संख्या अब 61 पर आ गई है। इनमें से जिन विधायकों ने पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाए, उनका कोई जवाब सामने नहीं आया। 

महाराष्ट्र में पार्टी के सबसे सीनियर नेता मयंक गांधी ने पार्टी छोड़ते हुए केजरीवाल के बारे में कहा था कि वह पार्टी को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। आप की संस्थापक सदस्य मधु भादुड़ी ने भी पार्टी में महिलाओं के साथ ग़लत व्यवहार का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी थी। आनंद कुमार, अजीत झा, अंजलि दमानिया, अश्विनी उपाध्याय, अशोक अग्रवाल, सुरजीत दासगुप्ता, नूतन ठाकुर, मौलाना मकसूद अली काज़मी...सभी ने केजरीवाल पर मनमानी करने और तानाशाही का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ी।

इतना सब होने के बावजूद पार्टी पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। अलका का आम आदमी पार्टी छोड़कर जाना वे इस रूप में देख रहे हैं कि उन्हें तो कांग्रेस में लौटना ही था लेकिन असल में यह आम आदमी पार्टी के अंदरूनी हालात से आंखें मूंदने जैसा नहीं तो और क्या है?

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दिलबर गोठी

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