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दिल्ली दंगों की चार्जशीट में सीताराम येचुरी, योगेंद्र यादव, जयति घोष, अपूर्वानंद

क्या दिल्ली पुलिस मोदी सरकार का खुलकर विरोध करने वालों को दिल्ली दंगों की आड़ में निशाना बना रही है? क्या दिल्ली दंगों के बहाने मोदी सरकार की नीतियों की जमकर आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों को कठघरे में खड़ा कर रही है और उनकी छवि पर कीचड़ उछालने का काम किया जा रहा है? 
ये सवाल इसलिये उठ रहे हैं और पुलिस की मंशा संदिग्ध लग रही है, क्योंकि दिल्ली पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, मशहूर अर्थशास्त्री जयति घोष, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद और फ़िल्मकार राहुल राय के नाम दंगों में दाखिल अपनी पूरक चार्जशीट में डाला हैं। 
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इस साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 53 लोंगों की मौत हुयी थी और सैकड़ों घायल हुये थे। भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने एक जुलूस निकाला था और वरिष्ठ पुलिस अफ़सरों को खुले आम कहा था कि यदि उन्होंने शाहीन बाग में धरने पर बैठी महिलाओं को नहीं हटाया तो कुछ भी हो सकता है। उसके बाद ही उत्तर पूर्व दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। बहरहाल, चार्जशीट में कपिल मिश्रा का नाम नहीं है। साथ ही सरकार में मंत्री अनुराग ठाकुर का भी नाम नहीं है जिन्होंने नारा लगवाया था 'देश के ग़द्दारों को, गोली मारा सालों को।'

चार्जशीट में क्या है?

मूल चार्जशीट में जिन लोगों के नाम हैं, उनमें पिंजड़ा तोड़ आन्दोलन की देवांगना कलिता और नताशा नरवाल, जामिया मिलिया इसलामिया की गुलफ़िशां फ़ातिमा के नाम मुख्य रूप से शामिल हैं। उन पर आरोप है कि जफ़राबाद में समान नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ था, जिसके बाद वहां दंगा भड़का था और इसमें इन लोगों की भूमिका थी।
पूरक चार्जशीट में यह कहा गया है कि नरवाल और कलिता के बयानों से यह साफ़ होता है कि अपूर्वानंद, राहुल राय और जयति घोष ने सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ दिल्ली के अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन के निर्देश दिए थे।
चार्जशीट में यह भी कहा गया है कि गुलफ़िशां के बयान से पता चलता है कि सीताराम येचुरी और योगेंद्र यादव ने सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने के लिए इन लोगों को 'एकत्रित किया और उकसाया।'

एक जैसे बयान कैसे?

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दिलचस्प बात यह है कि नरवाल और कलिता के बयान बिल्कुल एक जैसे हैं। इन बयानों में कहा गया है कि जयति घोष, अपूर्वानंद और राय ने 'कथित तौर पर उन्हें समझाया कि सीएए-एनआरसी का विरोध करने के लिए वे किसी हद तक जा सकते हैं।' इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि उमर खालिद ने उन्हें विरोध प्रदर्शन के 'टिप्स' दिए। लेकिन सबसे मजेदार बात तो यह है कि अंग्रेजी शब्द 'मैसेज' को ‘मसाज' लिख दिया गया है और यह शब्द दोनों ही बयानों में एक सा ही है।
इस चार्जशीट में यह भी कहा गया है कि नरवाल और कलिता ने अपने बयानों पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया है। सवाल ये उठता है जब इन दोनों ने इन बयानों को अपना मानने से इंकार कर दिया तो पुलिस किस आधार पर उसे सही कह सकती है और क्यों उसे पूरक चार्जशीट में रखा गया।

सरकार को बदनाम करने की साजिश?

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 'पिंज़ड़ा तोड़' आन्दोलन के इन दो सदस्यों के बयानों में कहा गया है, “सीएए पारित होने के बाद ज़यति घोष, अपूर्वानंद, राहुल राय ने हमें समझाया कि इसका विरोध करना ज़रूरी है और इस मामले में हम किसी हद तक जा सकते हैं, जिससे सरकार को बदनाम किया जा सके।”
चार्जशीट के अनुसार, उमर खालिद ने प्रदर्शन के टिप्स भी दिए। खालिद के संगठन युनाइटेड अगेन्स्ट हेट ग्रुप जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी और पिंजड़ा तोड़ ने एक साथ मिल कर दिल्ली के अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया।
इस चार्जशीट पर भरोसा करें तो गुलफिशां के बयान में कहा गया है कि “24 फरवरी को लोग तरह-तरह के हथियार लेकर आने लगे।” यह भी कहा गया है कि 25 फरवरी को 10-12 हज़ार लोग हथियारों से लैश होकर ज़फ़रबाद मेट्रो स्टेशन के सामने जमा हो गए। यह भी दावा किया गया है कि महिलाएं अपने साथ मिर्ची पाउडर ले कर आई थीं। 

चार्जशीट पर संदेह क्यों?

लेकिन यह पूरा चार्जशीट ही संदेहों से भरा हुआ है, जिस पर यकीन करना मुश्किल है। नरवाल और कलिता के बयान हूबहू होने से यह संकेत मिलता है कि किसी ने इसे लिख कर तैयार किया और उस पर इन महिलाओं से दस्तख़त करने को कहा, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया।

पुलिस का क्या कहना है?

दिल्ली पुलिन से इस पूरे मामले पर सफ़ाई दी है। पुलिस के प्रवक्ता अनिल मित्तल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है, 'यह बता देना ज़रूरी है कि संदिग्धों के इकबालिया बयान बहुत ही सही तरह से रिकॉर्ड किए गए हैं और वही रिकॉर्ड हुआ है जो उन्होंने कहा है।' 
उन्होंने इसके आगे कहा है कि 'किसी व्यक्ति को सिर्फ इकबालिया बयान के आधार पर ही अदालत में पेश नहीं किया जाता है। उसके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत होने पर ही आगे की क़ानूनी कार्रवाई की जाती है। यह मामला भी अदालत में है।' 

क्या कहना है अपूर्वानंद का?

प्रोफ़सर अपूर्वानंद ने इस पर अपना जवाब 'सत्य हिन्दी' को भेजा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि 'दिल्ली पुलिस सरकार की कही गई बातों को ही दुहरा रही है।' 

उन्होंने कहा है कि 'हालांकि एफ़आईआर 50/2020 गोली लगने से अमान नामक व्यक्ति के घायल होने और उसके बाद उसकी मौत होने के मामले में दर्ज कराया गया है, पर जाँच को इस पर केंद्रित कर दिया गया है कि विरोध प्रदर्शन ग़ैरक़ानूनी था और उस वजह से ही अमान की मौत हुई थी।' 

अपूर्वानंद ने कहा है, 'हालांकि मुझे अभियुक्त नहीं बनाया गया है, पर मुझे इस पर आश्चर्य है कि उन्होंने तीन युवतियों पर 17 साल के एक लड़के की हत्या का आरोप बग़ैर किसी आधार के ही लगा दिया है। आरोप लगाया गया है कि इन युवतियों ने ही किसी अज्ञात व्यक्ति को उकसाया और उसने गोली चलाई। जाँच से यह पता नहीं चला है कि गोली किसने चलाई, पर इस तरह पेश किया जा रहा है कि जिस किसी ने भी चलाई, वह सीएए-विरोधी आन्दोलन और उसमें इन अभियुक्तों के रवैए से उकसाया गया।' 
अपूर्वानंद ने यह भी कहा है कि '1 सितंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने देवांगना कलिता की ज़मानत याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि यह साबित नहीं किया जा सका है कि देवांगना ने भड़काऊ भाषण दिए।' दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ने कहा है कि

'चार्जशीट से साफ़ है कि राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है, प्रदर्शनकारियों की छवि खराब की जा रही है और इस कोशिश में ही हमसब के नाम लिए जा रहे हैं।'


अपूर्वानंद, प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने आगे कहा, 'विरोध प्रदर्शन की योजना को हिंसा करने की साजिश के रूप में पेश किया जा रहा है। इसमें दूसरे लोगों के साथ ही मुझे भी इस तरह पेश किया जा रहा है माने हमने मामले को भड़काया है, हालांकि इसके पीछ कोई तथ्य नहीं है।' 
उन्होंने कहा है कि 'पुलिस को अभी भी फरवरी के हिेंसा के पीछे की वजह का पता लगाना चाहिए। वह सीएए-विरोधी प्रदर्शनों का अपराधीकरण न करे, इस तरह का प्रदर्शन नागरिकों का जायज हक़ है।' 

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