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सुदर्शन टीवी का सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा- 'यूपीएससी जिहाद' एक खोजी पत्रकारिता!

सुदर्शन न्यूज़ के जिस यूपीएससी जिहाद कार्यक्रम के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने 'मुसलिम समुदाय को बदनाम करने वाला', 'चालबाज़', 'बेहूदा' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, आज उसी सुदर्शन न्यूज़ ने अब हलफ़नामा दाखिल कर क्या नई 'चालबाज़ी' दिखाई है? चैनल ने दावा किया है कि उसका कार्यक्रम एक खोजी पत्रकारिता है। उसने तर्क दिया है कि वह ‘नागरिकों और सरकार को राष्ट्र विरोधी और समाज विरोधी गतिविधियों के बारे में जगाने के लिए खोजी पत्रकारिता’ कर रहा है। 

अजीब बात यह है कि यह तर्क वह चैनल दे रहा है जिसके कार्यक्रम के ख़िलाफ़ सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले ही देश भर में बेलगाम टीवी चैनलों के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणी की थी। अब यह देश भर में बहस का मुद्दा बन गया है। अदालत ने जिस तरह की टिप्पणियाँ की थीं उससे लगा कि कुछ टेलिविज़न चैनलों ने देश को बड़ा नुक़सान पहुँचाया, सामाजिक तानेबाने को तोड़ने की कोशिश की और समाज में ज़हर घोलने का काम किया।

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सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने सुदर्शन टीवी शो का हवाला देते हुए पूछा था, ‘एंकर की शिकायत यह है कि एक विशेष समूह सिविल सेवाओं में प्रवेश पा रहा है। यह कितना घातक है? ऐसा चालबाज़ीपूर्ण आरोप यूपीएससी परीक्षाओं पर सवालिया निशान लगाता है, यूपीएससी पर संदेह पैदा करता है। बिना किसी तथ्यात्मक आधार के ऐसे आरोप, इसे कैसे अनुमति दी जा सकती है? क्या ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति एक स्वतंत्र समाज में दी जा सकती है।’

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुदर्शन टीवी के वकील श्याम दीवान से कहा था, 'आपका मुवक्किल देश को नुक़सान पहुँचा रहा है और यह स्वीकार नहीं कर रहा है कि भारत विविध संस्कृति वाला देश है। आपके मुवक्किल को सावधानी के साथ अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने की ज़रूरत है।' इसके साथ ही बेंच ने उस शो को ‘बेहूदा’ क़रार दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की ऐसी सख़्त टिप्पणाी के बाद ही आज सुदर्शन न्यूज़ के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके की ओर से अपने कार्यक्रम के बचाव में कोर्ट में हलफ़नामा पेश किया गया है। यह हलफ़नामा 91 पेज का है। ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, हलफ़नामे में दावा किया गया है कि उनका किसी भी समुदाय या व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई दुर्भावना नहीं है और यह भी चार एपिसोड जो प्रसारित किए गए हैं उनमें कोई बयान या संदेश नहीं था कि किसी विशेष समुदाय के सदस्यों को यूपीएससी में शामिल नहीं होना चाहिए।

हलफ़नामे में जो दावे किए गए हैं वे कार्यक्रम के शीर्षक ‘यूपीएससी जिहाद’ और इसके प्रोमो के कंटेंट के बिलकुल उलट हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी उस कंटेंट को लेकर थी।

बहरहाल, सुरेश चव्हाणके की ओर से हलफ़नामे में यूपीएससी जिहाद पर भी सफ़ाई दी गई है। उन्होंने कहा कि है कि ‘यूपीएससी जिहाद’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि उन्हें कई माध्यमों से जानकारी मिली कि ज़कात फ़ाउंडेशन को आतंक से जुड़े विभिन्न संगठनों से धन प्राप्त हुआ है। ‘लाइव लॉ’ के अनुसार, हलफ़नामा में कहा गया है, ‘ऐसा नहीं है कि ज़कात फ़ाउंडेशन के सभी योगदानकर्ता आतंक से जुड़े हुए हैं। हालाँकि, कुछ योगदानकर्ता आतंकी संगठनों से जुड़े हुए हैं या ऐसे संगठन हैं जो चरमपंथी समूहों को फंड करते हैं। ज़कात फ़ाउंडेशन द्वारा प्राप्त धन, बारी-बारी से आईएएस, आईपीएस या यूपीएससी के लिए प्रत्याशियों का सहयोग देने के लिए उपयोग किया जाता है।’

‘सेल्फ़ रेग्युलेशन' को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर देखिए 'आशुतोष की बात'-

हलफ़नामे में चैनल ने और भी कई मुद्दों पर अपनी बात रखी है और दावा किया है कि पूरे मामले को सही परिप्रेक्ष्म में नहीं देखा गया। चैनल ने कहा है कि कार्यक्रम को केवल कुछ स्लाइड्स के आधार पर नहीं आँका जाना चाहिए और सभी दस प्रकरणों को उस परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए देखा जाना चाहिए, जिसे चव्हाणके प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहे थे।

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बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर को यह कहकर शो के बाक़ी एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी है कि इसका उद्देश्य ‘मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना’ था। सुप्रीम कोर्ट उस मामले में सुनवाई कर रहा था जिसमें सुदर्शन न्यूज़ के ‘बिंदास बोल’ में ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए 7 पूर्व नौकरशाहों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर तीन न्यायाधीशों की बेंच सुनवाई कर रही थी। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​और जस्टिस केएम जोसेफ शामिल थे। 

सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से बेलगाम टीवी चैनलों को लेकर देश में बहस तेज़ हो गई है। बहस हो भी क्यों न, कोर्ट ने मीडिया के संचालन और नियमन को लेकर सवाल जो खड़े कर दिए हैं। सुदर्शन न्यूज़ के उस यूपीएससी जिहाद कार्यक्रम को लेकर सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट ने टीआरपी के लिए मुसलिम समुदाय को बदनाम करने से लेकर किसी व्यक्ति की छवि को ख़राब करने तक, मीडिया के मालिकाना हक व उनकी कमाई की जानकारी, न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन की नियमन पर सफ़ाई, मीडिया इथिक्स और प्रेस की आज़ादी, इन सभी मुद्दों पर खरी-खरी टिप्पणी की थी। 

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