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दूध की कीमतों में उबाल, खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का सबूत!

पूरे देश में प्याज तो कड़वा था ही, अब दूध की कीमतों में भी उबाल आ गया है, जिससे आम लोगों की जेब पर काफी दबाव बढ़ा है। ‘अमूल’ और ‘मदर डेरी’ ब्रांड की दूध सहकारी संस्थाओं ने पैकेज्ड दूध की कीमत प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ा दी है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब पहले से ही देश की अर्थव्यवस्था के ख़राब होने और उत्पादन कम होने की ख़बरे चल रही थीं। 
गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन (जीसीएमएमएफ़) ‘अमूल’ ब्रांड के दूध की आपूर्ति करता है जबकि नैशनल डेरी डेवलपममेंट बोर्ड (एनडीडीबी) ‘मदर डेरी’ ब्रांड के दूध की सप्लाई के व्यवसाय में है। इन दोनों ने ही प्लास्टिक की थैली में पैकेज किए हुए टोन्ड दूध की कीमत प्रति लीटर 3 रुपए कर दी है। अब टोन्ड दूध बाज़ार में 48 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है। 

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बढ़ी कीमतें नहीं गिरेंगी

पर्यवेक्षकों का कहना है कि दूध की कीमत में बढ़ोतरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे यह संकेत मिल रहा है कि खाद्य उत्पादों की कीमतें एक बार फिर बढ़ने लगी हैं, जो तरन्त नहीं रुकेंगी। प्याज और दूध में यहीं अंतर है।
प्याज की कीमत नई फसल के आते ही गिर जाएगी और स्थिति सामान्य होने लगेगी। पर दूध की कीमत एक बार बढ़ी है तो यह कम नहीं होगी। यह कीमत पहले स्थिर रहेगी और उसके बाद बढ़ भी सकती है।

पहले भी बढ़ी थीं दूध की कीमतें

अगर इसे राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह नहीं कह सकते कि इस सरकार में दूध की कीमतें बहुत बढ़ी हैं। पिछली सरकार में भी दूध की कीमतें बढ़ी थीं और वह बढ़ोतरी इससे कम नहीं थी। इसे इससे समझा जा सकता है कि कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के दौरान फरवरी 2010 में टोन्ड दूध की कीमत 24 प्रति लीटर थी, जो फरवरी 2014 में 36 रुपए प्रति लीटर थी। उस समय से अब तक 46 रुपए प्रति लीटर हो गई है। इसी तरह फुल क्रीम दूध की कीमत 2010 में 30 रुपए थी जो बढ़ कर 2014 में 46 रुपए और अब 56 रुपए प्रति लीटर हो गई। 
दूध की बढ़ी कीमतों को उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर से जोड़ कर देखा जा रहा है, जो नवंबर में 10.01 पर पहुँच गई। साल 2013 के बाद पहली बार हुआ है कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर दहाई अंक में है।

किसानों को मिले अधिक पैसे

दूध की कीमतें बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन को साल 2018-19 में पहले की तुलना में तकरीबन 5-6 प्रतिशत कम दूध मिला। यह स्थिति उस समय हुई है जब जीसीएमएमएफ़ ने प्रति किलो वसा की कीमतों में 100 रुपए से 110 रुपए तक की वृद्धि की है। उसने 30 लाख दूध उत्पादकों को यह बढ़ी हुई कीमत दी है, पर उसकी दूध उगाही पहले से कम हुई है। 

महंगाई की मार किसानोें पर भी

एक दूसरी चिलचस्प बात समय भी है, जब दूध की क़िल्लत हुई है और कीमतें बढ़ी हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक के समय को दूध के लिए बेहतर माना जाता है, जिस समय दूध का उत्पादन ज़्यादा होता है यानी गाय-भैंस अधिक दूध देती हैं। इसकी वजह यह है कि उस समय चारा आसानी से उपलब्ध होता है और तापमान व आर्द्रता भी कम रहती है। लेकिन इस बार लगभग उसी समय ज़ोरदार बारिश होने से चारागाह लंबे समय तक पानी में डूबे रहे, जिससे चारा की कमी हो गई।
हालांकि किसानों ने चारा की कीमत अधिक चुकाई, खल्ली, चोकर और भूसे की कीमत भी बढ़ गई। इसके बावजूद चारा पूरा नहीं मिलने से दूध कम हुआ।
दूध की कीमतें बढ़ना केंद्र सरकार के लिए चिंता की बात है। मामला सिर्फ़ दूध तक सीमित नहीं है, प्याज का भी मामला नहीं है। मामला यह है कि लोगों में यह संदेश जा रहा है कि एक ओर देश में आर्थिक मंदी है, आमदनी कम हो रही है तो दूसरी ओर महंगाई बढ़ रही है। लोग अपने आप को दो पाटों के बीच फँसा हुआ पा रहे हैं। 

केंद्र सरकार के मंत्री भले ही कहें कि एक फ़िल्म की कमाई  100 करोड़ रुपए होने से सफ़ है कि मंदी नहीं है, या दूसरे मंत्री कहें कि ट्रेन में भीड़ है तो कैसे कह रहे हैं कि मंदी चल रही है, पर सच यह है कि  लोगों को ऐसा लग रहा है कि आर्थिक स्थिति ख़राब है। भले ही प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को ‘प्रोफ़ेशनल पेसीमिस्ट’ क़रार दें और कहें , कि ‘सब चंगा सी’ दूध और प्याज की कीमतें बता रही हैं कि सबकुछ चंगा नहीं है।  

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