loader
रुझान / नतीजे

बिहार विधानसभा चुनाव 20200 / 243

एनडीए
0
महागठबंधन
0
अन्य
0

चुनाव में दिग्गज

अर्थव्यवस्था बचाने के लिए मोदी सरकार के पास क्या कोई रास्ता है?

साफ़ है कि संकट गहरा है। अर्थव्यवस्था पहले ही मुसीबत में थी और कोरोना ने उसे पूरी तरह बिठा दिया है। सरकार क्या करेगी यह तो आगे दिखेगा, लेकिन इतना साफ़ दिखने लगा है कि अभी तक जितने भी राहत या स्टिमुलस पैकेज आए हैं, उनका कोई बड़ा फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा है।
आलोक जोशी

सरकार के लिए अब सही मायनों में हिम्मत दिखाने का वक़्त आ गया है क्योंकि जीडीपी के ताज़ा आँकड़े बुरी तरह डरा रहे हैं। कहा जाता है कि डर के आगे जीत है। लेकिन उस जीत तक पहुँचने के लिए ही हिम्मत की ज़रूरत होती है। 40 साल में पहली बार भारत मंदी की चपेट में जा रहा है।

अप्रैल से जून के बीच भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ने की जगह क़रीब 24 प्रतिशत कम हो गई है। आशंका है कि अगली तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के बीच की ख़बर जब आम होगी तब भी यह गिरावट बढ़त में नहीं बदल पाएगी। यानी 40 साल में पहली बार भारत आर्थिक मंदी की चपेट में जा चुका होगा। वह भी ऐसे समय पर जब भारत 'विश्वगुरु बनने की तैयारी' कर रहा था।

आज़ाद भारत के इतिहास में अर्थव्यवस्था इतने ख़राब हाल में कभी नहीं आई। हालाँकि, इससे पहले भी सुस्ती या स्लोडाउन के झटके आए हैं लेकिन इस बार की बात एकदम अलग है।

ताज़ा ख़बरें

1979 का संकट

इससे पहले जब भी देश आर्थिक संकट में फँसा तो उसके दो ही कारण होते थे- या तो बारिश न होना यानी मॉनसून कमज़ोर पड़ना या फ़ेल हो जाना और दूसरा अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दामों में उछाल आना।

1947 में देश आज़ाद होने से लेकर 1980 तक ऐसे पाँच मौक़े रहे हैं जब देश की अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय घटी है। इनमें सबसे गंभीर झटका वित्तवर्ष 1979-80 में लगा था जब देश की जीडीपी 5.2 प्रतिशत गिरी थी। इसकी वजह भी थी। एक तरफ़ भयानक सूखा था और दूसरी तरफ़ तेल के दामों में आग लगी हुई थी। दोनों ने मिलकर देश को विकट स्थिति में डाल दिया। महँगाई की दर 20 प्रतिशत पर पहुँच गई थी। 

याद रहे कि यह वही दौर था जब भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार तीन-साढ़े तीन परसेंट हुआ करती थी यानी दो साल से ज़्यादा की बढ़त पर एक ही बार में पानी पड़ गया था।

यह वो वक़्त था जब इंदिरा गाँधी लोकसभा चुनाव में अपनी करारी हार के बाद दोबारा चुनाव जीतकर सत्ता में लौटी थीं और उनकी सरकार को आते ही अर्थव्यवस्था की इस गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा।

खेती और उससे जुड़े काम धंधों यानी फ़ार्म सेक्टर में 10 प्रतिशत की गिरावट, आसमान छूते तेल के दाम और आयात के मुक़ाबले निर्यात कम होने से लगातार बढ़ता दबाव; इमर्जेंसी के बाद पहली बार सत्ता मैं लौटी इंदिरा गाँधी की सरकार को ये मुसीबतें उपहार में मिली थीं।

आपदा में 'अवसर'

हालाँकि, उस सरकार ने इसके लिए जनता पार्टी की खिचड़ी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन साथ ही आपदा को अवसर में बदलने का भी इंतज़ाम किया। पहली बार देश से निर्यात बढ़ाने और आयात कम करने पर ज़ोर दिया गया।

आज़ाद भारत के तब तक के इतिहास का वो सबसे गंभीर आर्थिक संकट था और उस वक़्त नए नोट छापकर घाटा भर लेना सरकारों का आज़माया हुआ नुस्खा था।

लेकिन उस सरकार ने घाटा पूरा करने के इस तरीक़े पर कम निर्भर रहने का फ़ैसला किया और यह भी तय किया कि सीमेंट, स्टील, खाद, खाने के तेल और पेट्रोलियम जैसी चीज़ों के इंपोर्ट के भरोसे रहना देश के लिए ख़तरनाक हो सकता है, इन्हें देश में भी बनाने का इंतज़ाम करना ज़रूरी है। 

हालाँकि उसके बाद भी नोट छापकर घाटा पाटना जारी रहा, लेकिन इसे तरीक़े का इस्तेमाल कम करने की चिंता शुरू हो गई थी। फिर 1997 में तो सरकार ने बाक़ायदा रिज़र्व बैंक के साथ समझौता कर लिया कि अब नोट छापकर घाटा पूरा करने का काम नहीं किया जाएगा।

90 के दशक की शुरुआत में देश को एक और गंभीर आर्थिक संकट से गुज़रना पड़ा लेकिन बात मंदी तक नहीं पहुँची थी। संकट यह खड़ा हुआ कि भारत के पास विदेशी मुद्रा की कमी पड़ गई थी। उस समय भी खाड़ी युद्ध की वजह से तेल के दाम अचानक तेज़ी से बढ़े और हाल यह हुआ कि भारत के पास कुछ ही दिनों का तेल ख़रीदने लायक विदेशी मुद्रा बची। इसी स्थिति में चंद्रशेखर की सरकार ने देश का सोना बेचने और गिरवी रखने का कठोर फ़ैसला किया।

उसी साल चुनावों के दौरान राजीव गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस की सरकार आई और पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक सुधारों का वो पूरा पैकेज लागू किया जिसे भारत की आर्थिक तरक्की की रफ्तार में तेज़ी के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। लाइसेंस राज का ख़ात्मा और बाज़ार में खुले मुक़ाबले का रास्ता खोलने के काम उसी वक़्त हुए थे।

'एक्ट ऑफ़ गॉड'

लेकिन वर्तमान स्थिति आज तक के सभी संकटों से अलग है क्योंकि तेल के दाम बहुत कम स्तर पर चल रहे हैं। मॉनसून पिछले कई साल से लगातार अच्छा रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार लबालब भरा हुआ है। फिर देश की अर्थव्यवस्था के गर्त में जाने का क्या अर्थ है?

इसकी एक वजह तो कोरोना महामारी है और वो वजह सबसे बड़ी है, इसमें भी किसी को शक नहीं है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था के मौजूदा हाल को 'एक्ट ऑफ़ गॉड' या दैवीय आपदा का नतीजा बताया है। 

कोरोना को तब ज़रूर 'एक्ट ऑफ़ गॉड' माना जा सकता है, जब आप क़तई तर्क के मूड में न हों। वरना यह सवाल तो बनता ही है कि कोरोना फैलने की ख़बर आने के बाद भी उसकी गंभीरता समझने और उससे मुक़ाबले के तरीक़े तलाशने में जो वक़्त लगा, उसके लिए कौन सा गॉड ज़िम्मेदार है?

और अगर आप कोरोना के संकट और उससे पैदा हुई सारी समस्याओं को 'ईश्वर का प्रकोप' मान भी लें तो इस बात का क्या जवाब है कि कोरोना का असर आने से पहले भी इस मुल्क की यानी सरकार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी।

पूर्व वित्तमंत्री चिदंबरम और बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले पर क़रीब-क़रीब एकसाथ खड़े हैं। स्वामी ने तो एक्ट ऑफ़ गॉड पर सीधा सवाल पूछा- क्या जीडीपी ग्रोथ रेट 2015 के आठ परसेंट से लेकर इस साल जनवरी में 3.1% तक पहुँच जाना भी एक्ट ऑफ़ गॉड ही था?

अर्थतंत्र से और ख़बरें

क्या है रास्ता? 

साफ़ है कि संकट गहरा है। अर्थव्यवस्था पहले ही मुसीबत में थी और कोरोना ने उसे पूरी तरह बिठा दिया है। सरकार क्या करेगी यह तो आगे दिखेगा, लेकिन इतना साफ़ दिखने लगा है कि अभी तक जितने भी राहत या स्टिमुलस पैकेज आए हैं, उनका कोई बड़ा फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा है।

आर्थिक संकट मुख्य रूप से दो जगह दिखता है। एक- माँग कैसे बढ़े और दूसरा- उद्योगों, व्यापारियों या सरकार की तरफ़ से नए प्रोजेक्ट्स में नया निवेश कैसे शुरू हो। ये दोनों चीजें एक दूसरे से जुड़ी ही नहीं हैं, बल्कि एक दूसरे पर टिकी हुई भी हैं।

माँग नहीं होगी तो बिक्री नहीं होगी और बिक्री नहीं होगी तो कारख़ाना चलाने के लिए पैसे कहाँ से लाएँगे? और अगर उनके पास पैसा नहीं आया तो फिर वो अपने कामगारों को पैसा कहाँ से देंगे?

चारों तरफ़ यही हाल रहा तो नौकरियाँ जाएँगी, लोगों का वेतन कटेगा या ऐसा ही कोई और तरीक़ा आज़माया जाएगा।

ऐसे में सरकार के पास बहुत से रास्ते तो हैं नहीं। लेकिन एक रास्ता जो कई विशेषज्ञ सुझा चुके हैं, वो यह है कि सरकार को कुछ समय सरकारी घाटे की फ़िक्र छोड़कर नोट छपवाने चाहिए और उन्हें लोगों की जेब तक पहुँचाने का इंतज़ाम करना भी ज़रूरी होगा। तभी इकोनॉमी में नई जान फूँकी जा सकेगी। एक बार अर्थव्यवस्था चल पड़ी तो फिर ये नोट भी वापस हो सकते हैं।

(आर्थिक मामलाों के विशेषज्ञ आलोक जोशी का यह मूल लेख बीबीसी हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है। बीबीसी से साभार। )

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए


गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
आलोक जोशी

अपनी राय बतायें

अर्थतंत्र से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें