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अलविदा, कपिला वात्स्यायन

कला विदुषी कपिला वात्स्यायन का निधन हो गया। 25 दिसंबर, 1928 को पंजाबी पारंपरिक परिवार में जन्मी वात्स्यायन ने भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। मौजूद समय में जब संस्कृति के संसार में एक भीषण बंजर फैला हुआ है और संस्कृति के नाम पर निकृष्ट हिंदुत्व की हुंकार मची है, कपिला जी जैसी सभ्यता-बहुल व्यक्तित्व का न रहना खलने वाली घटना है।
मंगलेश डबराल

अक्सर वे दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दिख जाती थीं। एक दुबली-छरहरी, गोरी, तेज़ क़दमों से चलती हुई काया, जिन्हें देख कर यह नहीं लगता था कि वे प्राचीन इतिहास, कला-शिल्प और शास्त्रीय नृत्य-रूपों की विदुषी होने के अलावा संस्कृति के क्षेत्र में बड़ी हैसियत रखने वाली महिला भी हैं।

कपिला वात्स्यायन ( जन्म: 25 दिसंबर 1928; निधन: 16 सितम्बर 2020) शायद पुपुल जयकर के बाद दूसरी ऐसी हस्ती थीं जिन्हें कला-संस्कृति को संचालित और विकसित करने वाली संस्थाओं में काम करने के बहुत अवसर मिले। वे सरकार में उच्च सांस्कृतिक पदों पर रहीं, दो बार राज्य सभा की सदस्य मनोनीत हुईं और जब 1985 में तब के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अपनी माँ की स्मृति में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र की स्थापना की तो कपिला जी को उसका संस्थापक निदेशक बनाया गया। 

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कला केंद्र के इस विशाल परिसर को बहुत महत्त्वाकांक्षी उद्देश्यों के साथ कला-संस्कृति के शास्त्रीय और लोक रूपों के विकास और उनके अंतर्संबंधों के अनुसंधान, प्रदर्शन और विकास के लिए शुरू किया गया था। वह लम्बे समय तक थोड़ा-बहुत सक्रिय रहा, फिर कपिला जी ने सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने के कारण त्यागपत्र दे दिया और अब भारतीय जनता पार्टी के राज में हिंदुत्व का रंग चढ़ा कर उसे लगभग नष्ट किया जा चुका है।

कपिला वात्स्यायन का जन्म एक जागरूक परिवार में हुआ था। पिता रामलाल जाने-माने वकील थे और माँ सत्यवती मलिक अच्छी लेखक और कला-संगीत-प्रेमी। यह परिवार आज़ादी के संघर्ष से भी गहरे जुड़ा था और उस वक़्त के कई प्रमुख हिंदी लेखक उनके घर में होने वाली गोष्ठियों में शरीक होते थे। कपिला जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एमए और फिर मिशिगन से इतिहास में भी एमए किया और बाद में बनारस विश्वविद्यालय में वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे विद्वान के निर्देशन में विशेष छात्र के तौर पर इतिहास, पुरातत्व और वास्तुकला में शोध किया। प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' से विवाह भी उनके जीवन की एक उल्लेखनीय घटना थी। लेकिन यह बंधन सिर्फ़ तेरह साल 1956 से 1969 तक बना रहा। विच्छेद होने के बाद कपिला जी अज्ञेय के निधन (1987) के बाद ही उनके घर गयीं।

कपिला वात्स्यायन ने अच्छन महाराज से कथक सीखने के अलावा भरतनाट्यम, मणिपुरी और आधुनिक पश्चिमी नृत्यों की भी शिक्षा ली। कथक उन्होंने बचपन से शुरू कर दिया था। एक बातचीत में उन्होंने कहा,

मुझे याद है, दस वर्ष की उम्र में मैंने अर्धनारीश्वर किया था। फिर मुझे अच्छन महाराज ने बुलाया। निर्मला जोशी ने मुझे उन जैसे महान गुरु के पैर छूने को कहा। उन्होंने कहा, ‘बहुत अच्छा नाची हो, लेकिन तालीम की ज़रूरत है।'


कपिला वात्स्यायन

प्राचीन -रूपों और पुरातत्व को समझने के लिए कपिला जी ने संस्कृत का अध्ययन भी किया। उनके जुनून का कारण यह था कि वे सभी परम्पराओं के सार-तत्व को समझना और उनकी एकसूत्रता खोजना चाहती थीं। स्वाधीनता मिलने के बाद अपनी संस्कृति की पहचान की यह एक स्वाभाविक कोशिश थी। कपिला जी ने एक बातचीत में कहा था: 

‘भले ही हम नादान रहे हों, लेकिन हम पूरी तरह से आदर्शवादी थे और उस देश की अवधारणा के प्रति समर्पित थे जिसने हाल ही में आज़ादी पायी थी। हमारे सामने कुछ आदर्श थे। मेरी माँ और कमला देवी चट्टोपाध्याय और कुछ दूसरे लोग।’

भारतीय नृत्य, शिल्प में नृत्य छवियों, नाट्यशास्त्र और प्रकृति पर कपिला जी की किताबें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी में जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ का सुन्दर अनुवाद भी किया। उन्हें हिंदी साहित्य से भी गहरा लगाव था और बहुत अच्छी हिंदी जानती थीं। ख़ास बात यह है कि प्राचीनता को विश्लेषित करते हुए उनकी दृष्टि में कहीं संकीर्णता नहीं थी, बल्कि परंपरा को आधुनिक ढंग से देखने का आग्रह था। वे भारतीय नृत्य के लास्य अंग को जितना पसंद करती थीं उतना ही आधुनिक पश्चिमी नृत्य कला की हिमायती भी थीं। उनका कहना था कि ‘पश्चिमी नृत्य ने मुझे अपने शरीर को समझने की दृष्टि दी।’

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कपिला वात्स्यायन का 91 वर्ष का जीवन एक सफल जीवन की मिसाल माना जा सकता है। उन्हें सरकार का दूसरा सबसे बड़ा अलंकरण ‘पद्मविभूषण’ प्राप्त हुआ, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी की सबसे प्रमुख फेलोशिप मिलीं और  इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के आजीवन न्यासी होने के साथ-साथ वे उसके एशिया प्रोजेक्ट की अध्यक्ष भी रहीं। इसके अलावा भी उन्हें बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। संस्कृत के क्षेत्र की बहुत सी संस्थाओं की स्थापना का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है और कथक गुरु बिरजू महाराज को वे कथक केंद्र के निदेशक पद पर लाई थीं। इस सबके बावजूद उनके व्यक्तित्व में अहंकार का भाव नहीं था। कला विधाओं पर बाज़ार और पश्चिमीकरण के बढ़ते असर को लेकर भी उनके मन में कई संशय थे। उन्हीं के शब्दों में,

‘कलाकार को ( इससे) सफलता मिलती है— और यह बहुत अच्छी बात है— लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इससे कला का क्या होता है… याद रहे कि हम एक संकट से गुज़र रहे हैं। हम में से कई लोग नृत्य में बहुत प्रवीण हैं, लेकिन कला में प्राण फूँकना एक मुश्किल काम है।’

मौजूद समय में जब संस्कृति के संसार में एक भीषण बंजर फैला हुआ है और संस्कृति के नाम पर निकृष्ट हिंदुत्व की हुंकार मची है, कपिला जी जैसी सभ्यता-बहुल व्यक्तित्व का न रहना खलने वाली घटना है।

मंगलेश डबराल

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