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अल्काजी: एक बड़े पर्दे का गिरना

अल्काजी 95 वर्ष की भरपूर उम्र में दुनिया को छोड़ कर गए हैं। लेकिन जाना हमेशा के लिए एक विशाल नाट्य-दृश्य के पर्दे का गिरना है जो अब कभी खुलेगा नहीं।

मंगलेश डबराल

‘ऐसे किले जब टूटते हैं तो अन्दर से भरभराकर टूटते हैं!’ सन 1972 में जब यह वाक्य दिल्ली के पुराने किले के ऐतिहासिक अवशेषों के विस्तार में खुले आसमान के नीचे गूंजा था, तो दर्शकों ने उसे इंदिरा गांधी की सल्तनत के भीतर दरारें पड़ने के रूपक के तौर पर समझा था। 

यह गिरीश कर्नाड के नाटक ’तुग़लक’ का संवाद था। वह एक बड़ी सामजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था, जिसकी परिणति आख़िरकार इमरजेंसी में हुई हालांकि उसके संकेत सन 1972 से ही मिलने लगे थे।

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नाटक के निर्देशक इब्राहिम अल्काजी थे। चौदहवीं सदी के सनकी बादशाह ‘तुग़लक’ की भूमिका उनके सबसे चहेते छात्र मनोहर सिंह ने की थी।

इस प्रस्तुति की भव्यता, उदात्तता, चमक-दमक, वेशभूषा, और ‘स्पेस’ के अनोखे इस्तेमाल को आज भी रंगकर्म की दुनिया में याद किया जाता है।
अल्काजी 95 वर्ष की भरपूर उम्र में दुनिया को छोड़ कर गए हैं। लेकिन जाना हमेशा के लिए एक विशाल नाट्य-दृश्य के पर्दे का गिरना है जो अब कभी खुलेगा नहीं।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय

‘तुगलक’ से पहले अल्काजी महाभारत पर आधारित धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधायुग’ को भी फिरोज़शाह कोटला की फसीलों के बीच प्रस्तुत कर चुके थे। उन दिनों वियतनाम पर अमेरिकी आक्रमण का दुनिया भर में विरोध हो रहा था। युद्ध की व्यर्थता और बेहूदगी को बतलाने  वाला यह प्रदर्शन  अनायास ही युद्ध-विरोध से जुड़ गया।

इस सबने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उसके निदेशक अल्काजी की एक बड़ी पहचान दी और फिर अगले 15 वर्षों के उनके कार्यकाल में एनएसडी देश की सबसे प्रमुख नाट्य-संस्था बना रहा। हिंदी नाटकों के ज़्यादातर बड़े अभिनेता उन्हीं की देखरेख में प्रशिक्षित हुए और उनमें से कई ने सिनेमा में भी कीर्तिमान बनाए।
उनके प्रशिक्षित अभिनेताओं में मनोहर सिंह, उत्तरा बावकर, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, रोहिणी हट्टंगड़ी, ओम शिवपुरी, नादिरा बब्बर हैं।
रंग निर्देशकों में रंजीत कपूर, एम. के. रैना,  प्रसन्ना,  बंसी कौल, विजया मेहता, बलराज पंडित, भानु भारती आदि ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी।

पश्चिमी शैली पर ज़ोर

अल्काजी ने अपने छात्रों को रंगकर्म की परंपरा और प्रयोगशीलता और उसके बदलते मुहावरों के संपर्क में लाने का काम किया, लेकिन उनका खास आग्रह पश्चिमी शैली पर था।
नसीरुद्दीन शाह ने एक इंटरव्यू में अल्काजी की रंग-शैली की जकड़बंदी और पश्चिमी प्रभाव की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने अगर पश्चिम की बजाय हमारी देसी शैलियों और सामाजिक सचाइयों की कहानियों पर ध्यान दिया होता तो  ज्यादा बड़ा काम हो सकता था।

अरब पिता, क़ुवैती माँ

अल्काजी का जन्म 18 अक्टूबर, 1925 को पुणे में हुआ था। उनके पिता अरब थे और माँ कुवैती। उन्होंने लन्दन की मशहूर रॉयल एकेडेमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स ( राडा) में रंगकर्म का प्रशिक्षण लिया था।
भारत-पाक विभाजन के समय उनके कई भाई पाकिस्तान चले गए, लेकिन अल्काजी ने बंबई में ही रह कर रंगकर्म शुरू किया। वह चित्रकारों के संगठन प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप में हुसैन सूजा और रजा जैसे प्रतिभावान चित्रकारों से भी जुड़े।

नेहरू के ज़ोर पर बने एनएसडी प्रमुख

उन्हीं दिनों दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की स्थापना हुई।
जवाहर लाल नेहरु ने इब्राहिम अल्काजी से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का निदेशक बनने का आग्रह किया तो इच्छा न होते हुए भी उन्होंने यह ज़िम्मा संभाल लिया।
पंद्रह वर्ष और बहुत से कीर्तिमानों और कुछ विवादों के बाद सन 1979 में विद्यालय को छोड़ कर उन्होंने अपनी एक नाट्य संस्था बनायी।
वह कलाकृतियों और फोटोकारी के संग्रहण में लग गए और अपने चित्रों की कुछ प्रदर्शनियाँ भी आयोजित कीं। ए रामचंद्रन के 60 फुट लम्बे मशहूर म्यूरल ‘ययाति’ को अल्काजी ने ही प्रायोजित किया था।

पूर्णतावादी

अल्काजी को कला में पूर्णतावादी होने के साथ-साथ काम में कड़े अनुशासन और दफ्तर में समय की पाबंदी के लिए भी जाना जाता था। कहते हैं, वे नाट्य विद्यालय में साफ़-सफाई का इतना ख़याल रखते थे कि कई बार उसके शौचालय भी खुद ही साफ़ करते थे।

अल्काजी सही अर्थों में हिंदी रंगमंच  की पहली आधुनिक प्रतिभा थे। उनसे पहले सत्यदेव दुबे बंबई में अपने ही प्रयासों से हिंदी रंगमंच को संवारने का काम कर रहे थे, लेकिन अल्काजी ने संस्थागत साधनों से उसे नयी ऊंचाइयों तक पहुँचाया।
एक दूसरे बड़े रंगकर्मी हबीब तनवीर का प्रवेश उनके कुछ बाद हुआ जो उन्हीं की तरह राडा से प्रशिक्षण लेकर लौटे थे, लेकिन उनका मुहावरा बहुत अलग और देसी ढंग का था।

तादात्म्यवादी अभिनय शैली

अल्काजी पर रूस के प्रख्यात रंगकर्मी और सिद्धांतकार कोन्स्तान्तिन स्तानिस्लावास्की के तादात्म्यवादी अभिनय शैली का प्रभाव था, जिसमें अभिनेता नाटक के चरित्र को आत्मसात करके एक तरह से परकाय-प्रवेश करता है और उसमें विलीन हो जाता है। उसका अभिनय दिखाने की बजाय ‘वही’ बन जाता है।
यह अभिनय-सिद्धांत लम्बे समय तक मुख्य सिद्धांत बना रहा और आज भी है, हालांकि जर्मनी के बेर्टोल्ट ब्रेख़्त ने इसके बरक्स रंगमंच में अलगाव-प्रभाव का विचार अपनाया, जिसे हिंदी रंगमंच में हबीब तनवीर के काम में देखा जा सकता है।

अल्काजी और हबीब तनवीर की दो रंग-शैलियाँ लम्बे दौर तक आधुनिक हिंदी नाट्य-कर्म की तसवीर को मुक़म्मल बनाती रहीं।
अल्काजी द्वारा निर्देशित ‘अंधायुग’, ‘तुगलक,’ ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘वेटिंग फॉर गोदो’ और हबीब तनवीर का ‘आगरा बाज़ार, ‘चरणदास चोर’ और ‘हिरमा की कहानी’ हिंदी नाट्य कर्म की यादगार प्रस्तुतियों के रूप में जीवित रहेंगी। 

मंगलेश डबराल

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