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दूर होने का नाम नहीं ले रही जातिवादी कुंठा, एम्स के डॉक्टर फिर बेनकाब

भारतीय समाज में जब भी वंचित तबक़े को कुछ सहूलियत देने की बात आती है तो ये नारे लगाए जाते हैं कि अब जातीय घृणा नहीं रह गई है। वहीं जातीय कुंठा और उत्पीड़नों की ख़बरों से देश भर के अख़बार भरे पड़े होते हैं। आश्चर्य तब होता है जब कथित रूप से प्रीमियर कहे जाने वाले संस्थानों में बजबजाते जातिवाद के मामले सामने आते हैं। इस बार एम्स में मामला सामने आया है।

अनुसूचित जाति एवं जनजाति सेल समिति द्वारा सौंपी गई एक रिपोर्ट में पाया गया है कि एम्स की महिला डॉक्टर के ख़िलाफ़ जातिगत और लैंगिक टिप्पणी की गई है। उसके सीनियर रेजिडेंट ने महिला चिकित्सक को ‘औकात में रहो’ जैसी टिप्पणियाँ कीं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक़ समिति ने 24 जून को अपनी 17 पृष्ठ की रिपोर्ट एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया को सौंपी और दोषी के ख़िलाफ़ उचित प्रशासनिक और क़ानूनी कार्रवाई करने को कहा जो अस्पताल के सेंटर फ़ॉर डेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च (सीडीईआर) से जुड़ा है।

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शिकायत करने वाली डॉक्टर 17 अप्रैल को दवा का ओवरडोज लेने के कारण अपने हॉस्टल में अचेत पाई गई थी। इस मसले में दर्ज प्राथमिकी में डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि उसके फैकल्टी मेंबर ने ‘तू एससी है, अपने लेवल में रह’,  ‘अपना मुंह बंद कर’, ‘काली बिल्ली की तरह मेरा रास्ता मत काट’ जैसी टिप्पणियाँ की थीं।

दुखद बात यह है कि उत्पीड़न के ऐसे मामलों में वरिष्ठ और ज़िम्मेदार अधिकारियों का समर्थन उत्पीड़कों को मिलता है। यह उत्पीड़न पढ़ाई के स्तर पर ही शुरू हो जाता है औऱ लंबे समय तक चलता रहता है। इस मामले में भी यही हुआ था और जब महिला डॉक्टर ने अपने तात्कालिक वरिष्ठ से शिकायत की तो उसे लिखित शिकायत न करने की सलाह दी और उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

दलितों और पिछड़ों के उत्पीड़न का यह मसला नया नहीं है। दो साल पहले चंडीगढ़ एम्स में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में अनिल गंगवार को चयन न करने का मामला आया था। 2011 में एम्स के एमबीबीएस के छात्र बालमुकुंद भारती ने आत्महत्या कर ली जिस पर एक दहला देने वाली डॉक्यूमेंट्री ‘द डेथ ऑफ़ मेरिट’ नाम से आई। इसके अलावा तमाम प्रीमियर इंजीनिरिंग व मेडिकल कॉलेजों में दलितों की सांस्थानिक हत्याओं पर कई डाक्टूमेंट्री सामने आईं

प्रीमियर शिक्षण संस्थानों में जातीय उत्पीड़न की कहानी लगातार जारी है। यह उत्पीड़न दलितों के एडमिशन लेने के समय रैगिंग से शुरू होता है जिसमें जातीय टिप्पणियाँ, पिटाई शामिल होती है। रैगिंग को लेकर तमाम क़ानून बनने के बावजूद दलित अभी भी उससे बच नहीं पाते।

ग़रीब परिवारों के बच्चे बहुत ज़्यादा अंक प्राप्त कर अपने परिवार, रिश्तेदारों और तमाम वंचितों के सपने लेकर इन संस्थानों में पढ़ाई के लिए पहुँचते हैं और भेदभाव उन्हें आत्महत्या में धकेल देता है।

एम्स के ताज़ा मामले में एससी-एसटी सेल की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि आरोपी ने अनुचित टिप्पणी की है। आरोपी ने इसे स्वीकार भी कर लिया है और गवाहों ने इसे पुष्ट किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है क सीडीईआर द्वारा गठित आंतरिक समिति ने मामले की सही से जाँच नहीं की और पीड़िता से शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डाला गया। इस मामले में रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने 22 मार्च को एम्स के निदेशक को पत्र भी लिखा था।

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सवाल यह है कि शिकायत और एफ़आईआर के बाद भी अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? एससी-एसटी सेल की रिपोर्ट में उत्पीड़न को पुष्ट पाया गया जबकि उसके पहले एफ़आईआर और एक आंतरिक विभागीय जाँच में आरोपी चिकित्सक के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई। वंचित तबक़े के चिकित्सा विद्यार्थियों का समर्थन करने वाले वरिष्ठ चिकित्सक नहीं होते, उनकी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं होती कि वे मज़बूती से लड़ाई लड़ सकें। ऐसे में उनके मामले दबते हैं और आख़िरकार कैरियर बचा लेने के दबाव में उन्हें समझौतों के लिए बाध्य होना पड़ता है।

आरक्षण के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले बार-बार इस बात की दुहाई देते हैं कि अब जातीय भेदभाव नहीं रहा। जबकि जातीय भेदभाव अब भी भारत के शिक्षण संस्थानों सहित विभिन्न संस्थानों में इस कदर फैला हुआ है कि दलितों-पिछड़ों की मेरिट की हत्या कर दी जाती है।

आरक्षण एक सहारा देता है कि वे भी ऐसे संस्थानों में प्रवेश पा सकें लेकिन वहाँ विराजमान ज़िम्मेदार अधिकारी इस कदर जातिवादी होते हैं कि उन्हें आत्महत्या कर लेने को मजबूर कर देते हैं। 

अगर एससी-एसटी और ओबीसी तबक़ा मज़बूत हो चुका है, उसे आरक्षण की ज़रूरत नहीं है, उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल चुका है तो इन संस्थानों में मौजूद वे लोग कौन हैं जो दलितों-पिछड़ों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के बावजूद बेखौफ होकर जातीय टिप्पणियाँ और उत्पीड़न कर रहे हैं। यह भारत में मेरिट की हत्या है जो राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र तक कायम है। भारत के शासन-प्रशासन से अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा हट गया है लेकिन नया प्रभुत्व वर्ग आ गया है। यह तबक़ा नया अंग्रेज़ बनकर उभरा है। देश में मलाईदार पदों/जगहों पर जब तक सवर्ण तबक़े का क़ब्ज़ा बना रहेगा, येन-केन-प्रकारेण अपनी ही जाति में योग्यता और मेरिट ढूंढते रहेंगे और देश की 85 प्रतिशत आबादी में मौजूद मेरिट की हत्या होती रहेगी।

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