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चीन से युद्ध के ख़तरे के बीच विभाजनकारी नीतियाँ, नफ़रत का एजेंडा चला रही है बीजेपी

इस समय देश कोरोना महामारी का सामना करने के साथ ही ऐतिहासिक आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। बेरोज़गारी चरम पर हैं। तमाम विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ आने वाले दिनों में हालात के बेहद भयावह होने की चेतावनी दे रहे हैं। इसी सबके बीच सरकार की उदासीनता के चलते देश की सीमाओं भी शक्तिशाली पड़ोसी चीन के साथ युद्ध का ख़तरा मंडरा रहा है। इस सबके बावजूद हैरानी की बात यह है कि सरकार और सत्तारूढ पार्टी अपना विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडा छोड़ने को कतई तैयार नहीं है।
अपने जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर रहे नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में यह सातवां साल है। प्रधानमंत्री बनने से पहले वह क़रीब साढे बारह वर्ष तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने देश-दुनिया में अपनी छवि विकास पुरुष की बनाई थी और इसी छवि के सहारे वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए थे।
प्रधानमंत्री बनने के पहले उन्होंने देश की जनता से 60 महीने मांगे थे और कई वादे किए थे, तरह-तरह के सपने दिखाए थे, जिनका लब्वोलुआब यह था कि वह 5 साल में भारत को विकसित देशों की कतार में ला खड़ा करेंगे। देश की जनता ने उनके वादों पर एतबार करते हुए उन्हें न सिर्फ 5 साल का एक कार्यकाल सौंपा बल्कि पहले कार्यकाल में तमाम मोर्चों पर नाकामी के बावजूद पूर्ण बहुमत के साथ 5 साल का दूसरा कार्यकाल भी दे दिया। 
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इस दौरान कई राज्यों में भी बीजेपा की सरकारें बन गईं। कहीं स्पष्ट जनादेश के साथ तो कहीं विपक्षी विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के जरिए जनादेश का अपहरण करके।

'विकास का झंडा-नफ़रत का एजेंडा'

मोदी के दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष से ज़्यादा का समय बीत गया है। छह वर्ष से ज़्यादा के अभी तक के कार्यकाल में उनका और उनकी सरकार का एक ही मूल मंत्र रहा है- 'विकास का झंडा और नफ़रत का एजेंडा।’ इसी मंत्र के साथ काम करते हुए मोदी सरकार अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर तो बुरी तरह विफल साबित हो ही रही है, देश के अंदरूनी हालात भी बेहद असामान्य हैं। पिछले 6 वर्षों के दौरान देश के भीतर बना जातीय और सांप्रदायिक तनाव-टकराव का समूचा परिदृश्य गंभीर हालात का आभास दे रहा है। 
सवा 6 साल पहले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के ढाई महीने बाद जब स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से पहली बाद देश को संबोधित किया था तो उनके भाषण को समूचे देश ने ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे तमाम देशों ने भी बड़े ग़ौर से सुना था। नरेंद्र मोदी ने अपने उस भाषण में देश की आर्थिक और सामाजिक तसवीर बदलने का इरादा जताते हुए देशवासियों और ख़ासकर अपनी पार्टी तथा उसके सहमना संगठनों के कार्यकर्ताओं से अपील की थी कि अगले 10 साल तक देश में सांप्रदायिक या जातीय तनाव के हालात पैदा न होने दें। 

क्या कहा था प्रधानमंत्री ने?

प्रधानमंत्री ने कहा था- 'जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, सामाजिक या आर्थिक आधार पर लोगों में विभेद, यह सब ऐसे ज़हर हैं, जो हमारे आगे बढने में बाधा डालते हैं। आइए, हम सब अपने मन में एक संकल्प ले कि अगले 10 साल तक हम इस तरह की किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।' उन्होंने इसके आगे कहा था, 

'हम आपस में लड़ने के बजाय ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा तथा तमाम सामाजिक बुराइयों से लड़ेंगे और एक ऐसा समाज बनाएँगे जो हर तरह के तनाव से मुक्त होगा। मैं अपील करता हूँ कि यह प्रयोग एक बार अवश्य किया जाए।'


नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

सदिच्छा?

मोदी का यह भाषण उनकी स्थापित और बहुप्रचारित छवि के बिल्कुल विपरीत, सकारात्मकता और सदिच्छा से भरपूर था। देश-दुनिया में इस भाषण को व्यापक सराहना मिली थी। राजनीतिक और कारोबारी जगत में भी यही माना गया था कि जब तक देश में सामाजिक-सांप्रदायिक तनाव या संघर्ष के हालात रहेंगे, तब तक कोई विदेशी निवेशक भारत में पूँजी निवेश नहीं करेगा और विकास संबंधी दूसरी गतिविधियाँ भी सुचारु रूप से नहीं चल सकती हैं, इस बात को जानते-समझते हुए ही मोदी ने यह आह्वान किया है।
प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद उम्मीद लगाई जा रही थी कि उनकी पार्टी तथा उसके उग्रपंथी सहमना संगठन अपनी वाणी और व्यवहार में संयम बरतेंगे। लेकिन हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री की नसीहत को उनकी पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ता तो दूर, केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्टी के प्रवक्ताओं-जिम्मेदार पदाधिकारियों ने भी तवज्जो नहीं दी। इन सबके श्रीमुख से सामाजिक और सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने वाले नए-नए बयानों के आने का सिलसिला जारी रहा। 
इसे संयोग कहें या साज़िश कि प्रधानमंत्री के इसी भाषण के बाद देश में चारों तरफ से सांप्रदायिक और जातीय हिंसा की ख़बरें आने लगी। कहीं गोरक्षा तो कहीं धर्मांतरण के नाम पर, कहीं मंदिर-मसजिद तो कहीं आरक्षण के नाम पर, कहीं वंदे मातरम और भारतमाता की जय के नारे लगवाने को लेकर।

इसी सिलसिले में कई जगह महात्मा गांधी और बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्तियों को भी विकृत और अपमानित करने तथा कुछ जगहों पर नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने जैसी घटनाएँ भी हुईं।

ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटनाएं मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले नहीं होती थीं। पहले भी ऐसी घटनाएं होती थीं, लेकिन कभी देश के इस कोने में तो कभी उस कोने में, लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो ऐसी घटनाओं ने देशव्यापी रूप ले लिया। संगठित तौर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया जाने लगा। 

गुजरात

अगस्त 2015 में गुजरात में पटेल बिरादरी ने आरक्षण की मांग को लेकर एक तरह से विद्रोह का झंडा उठा लिया। व्यापक पैमाने पर हिसा हुई। अरबों रुपए की सरकारी और निजी संपत्ति आगजनी और तोड़फोड़ का शिकार हो गई। एक 24 वर्षीय नौजवान अपनी बिरादरी के लिए हीरो और राज्य सरकार के लिए चुनौती बन गया। 
आंदोलन को काबू में करने के लिए राज्य सरकार को अपनी पूरी ताकत लगानी पडी। इस हिंसक टकराव के कुछ ही दिनों बाद उसी सूबे में दलित समुदाय के लोगों पर गोरक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री की पार्टी के सहयोगी संगठनों का कहर टूट पडा। कुल मिलाकर हालात इतने बेकाबू हो गए कि सूबे की मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी छोडनी पड़ी। 

हरियाणा

गुजरात की इस घटना के चंद महीनों बाद ही 2016 के जून महीने में दिल्ली से सटे हरियाणा में भी जाट समुदाय ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की माँग को लेकर आन्दोलन शुरू कर दिया। उस आन्दोलन ने जिस तरह हिसक रूप धारण किया वह तो अभूतपूर्व था ही, राज्य सरकार का उस आंदोलन के प्रति मूकदर्शक बने रहना भी कम आश्चर्यजनक नहीं था। हरियाणा वह प्रदेश है जहाँ प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के सहारे भाजपा ने पहली बार अपनी सरकार बनाई थी।

प्रधानमंत्री मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाले सूबे यानी उत्तर प्रदेश में तो हालात आज तक बेहद गंभीर बने हुए हैं। वहाँ गोरक्षा के नाम पर बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पहले से ही आतंक मचा रखा था, जिसका सिलसिला वहां बीजेपी की सरकार बनने के बाद और तेज़ हो गया।

मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, बिहार, पंजाब और झारखंड में भी पिछले छह वर्षों के दौरान जातीय और सांप्रदायिक तनाव की अनेक घटनाएँ हुई हैं।

हेट स्पीच

चूंकि शुरू में तो यह माना गया था और अपेक्षा की गई थी कि इस तरह की घटनाएं प्रधानमंत्री की मंशा और विकास के उनके घोषित एजेंडा के अनुकूल नहीं हैं, लिहाज़ा ऐसी घटनाओं पर प्रधानमंत्री राज्य सरकारों और अपने पार्टी कॉडर के प्रति सख़्ती से पेश आएंगे, लेकिन इस अपेक्षा के उलट प्रधानमंत्री मोदी न सिर्फ मूकदर्शक बने रहे, बल्कि विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए उनके विभाजनकारी भाषणों से भी उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढा और इस तरह की घटनाओं में इजाफ़ा होता रहा।
प्रधानमंत्री ने कहीं श्मशान और कब्रिस्तान की बात कही, तो कहीं पर कहा कि अगर बीजेपी हार गई तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि खुद प्रधानमंत्री ही लालकिले से अपने पहले संबोधन में किए गए आह्वान को भूल गए।

सीएए-एनआरसी

यही नहीं, सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने के मक़सद से ही उनकी सरकार ने विवादास्पद नागरिक नागरिकता संशोधन क़ानून भी पारित कराया और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार करने का इरादा जताया। जब इसके ख़िलाफ़ देशभर में आन्दोलन हुआ तो पुलिस के जरिए उस अहिंसक आंदोलन को भी बलपूर्वक दबाने की कोशिशें हुईं।
आन्दोलन को बदनाम करने के लिए कई जगह तो पुलिस के लोगों ने ही सादे कपड़ों में तोड़फोड़ की कार्रवाई को अंजाम दिया और प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से उस तोड़फोड़ के लिए बग़ैर नाम लिए मुसलिम समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा कि ऐसे लोगों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है।

निशाने पर मुसलमान!

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ दिल्ली के शाहीन बाग में चले महिलाओं के ऐतिहासिक आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के भडकाऊ बयान प्रधानमंत्री की पार्टी के नेताओं और मंत्रियों ने दिए, जिसकी परिणति भीषण दंगों में हुई। हैरानी की बात यह है कि सभी ऐसे सभी नेताओं के भड़काऊ बयान और भाषण रिकॉर्ड पर होने के बावजूद पुलिस ने उन्हें छोड दिया और दंगों का आरोपी उन लोगों को बनाया जो दंगों को शांत करने में या दंगा पीडितों की मदद में जुटे हुए थे।

नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के जरिए देश भर में बनाए जा रहे नफ़रत के माहौल और दिल्ली में हो रहे दंगों के दौरान ही कोरोना महामारी ने भारत में दस्तक दे दी थी। इस महामारी की भयावहता को देखते हुए लगा था कि अब तो सरकार अपना पूरा ध्यान महामारी से निबटने में लगाएगी और उसकी ओर से सांप्रदायिक नफ़रत को बढावा देने जैसा कोई काम नहीं होगा। लेकिन महामारी की आड़ में भी नफरत का एजेंडा स्थगित नहीं हुआ।
दिल्ली में हुए तबलीग़ी जमात के एक कार्यक्रम को कोरोना फैलने का कारण बताकर प्रचारित कर टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से देश भर में ऐसा माहौल बना दिया गया मानो इस महामारी का संबंध सिर्फ मुसलमानों से ही है और देश में वे ही इसे फैला रहे हैं।

पीएम की चुप्पी!

इस दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करने कई बार टीवी पर भी आए, लेकिन उन्होंने इस अभियान तरह के अभियान पर खेद तक तक नहीं जताया। नफ़रत भरे प्रचार और उस पर प्रधानमंत्री की चुप्पी का परिणाम यह हुआ कि कई जगह मुसलमानों का सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा। बीजेपी- शासित राज्यों में इस तरह की नफ़रत फैलाने में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी अहम भूमिका निभाई।
इस सबकी दुनिया भर में प्रतिक्रिया हुई और विश्व स्वास्थ्य संगठन को अपील जारी करनी पड़ी कि इस महामारी को किसी धर्म, संप्रदाय और नस्ल विशेष से जोड़ कर न देखा जाए। कई मुसलिम राष्ट्रों ने आधिकारिक तौर पर भारत सरकार से इस नफ़रत भरे अभियान को लेकर विरोध दर्ज कराया।
लेकिन यह अभियान तभी थमा जब यह महामारी देशभर में व्यापक तौर पर फैल गई और कई केंद्रीय मंत्री, बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक और बीजेपी के अन्य बड़े नेता भी इसकी चपेट में आने लगे। 
लेकिन यह अभियान तभी थमा जब यह महामारी देशभर में व्यापक तौर पर फैल गई और कई केंद्रीय मंत्री, बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक और बीजेपी के अन्य बड़े नेता भी इसकी चपेट में आने लगे। 
अनिल जैन

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