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अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता में भारत भी शामिल, अफ़ग़ानिस्तान में आशा की किरण

अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता में भारत भी शामिल हुआ है। अब देखना यह है कि यह समझौता कैसे होता है? क्या कुछ समय के लिए तालिबान और अशरफ गनी की काबुल सरकार मिलकर कोई संयुक्त मंत्रिमंडल बनाएँगे? या नए सिरे से चुनाव होंगे? या तालिबान सीधे ही सत्तारूढ़ होना चाहेंगे यानी वे गनी सरकार की जगह लेना चाहेंगे? इसमें शक नहीं कि तालिबान का रवैया इधर काफ़ी बदला है। 
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

इसी वर्ष के मार्च और मई में मैंने लिखा था कि कतर की राजधानी दोहा में तालिबान और अफ़ग़ान-सरकार के बीच जो बातचीत चल रही है, उसमें भारत की भी कुछ न कुछ भूमिका ज़रूरी है। मुझे खुशी है कि अब जबकि दोहा में इस बातचीत के अंतिम दौर का उद्घाटन हुआ है तो उसमें भारत के विदेश मंत्री ने भी वीडियो पर भाग लिया। उस बातचीत के दौरान हमारे विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव जे.पी. सिंह दोहा में उपस्थित रहेंगे। जे.पी. सिंह अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान, इन दोनों देशों के भारतीय दूतावास में काम कर चुके हैं। वह जब जूनियर डिप्लोमेट थे, वह दोनों देशों के कई नेताओं से मेरे साथ मिल चुके हैं। 

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इस वार्तालाप के शुरू में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपिओ ने भी काफ़ी समझदारी का भाषण दिया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी जो कुछ कहा, उससे यही अंदाज़ लगता है कि तालिबान और काबुल सरकार इस बार कोई न कोई ठोस समझौता ज़रूर करेंगे। इस समझौते का श्रेय जलमई खलीलजाद को मिलेगा। जलमई नूरजई पठान हैं और हेरात में उनका जन्म हुआ था। वह मुझे 30-32 साल पहले कोलंबिया यूनिवर्सिटी में मिले थे। वह काबुल में अमेरिकी राजदूत रहे और भारत भी आते रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अमेरिकी नागरिक के तौर पर वह अमेरिकी हितों की रक्षा अवश्य करेंगे। लेकिन वह यह नहीं भूलेंगे कि वह पठान हैं और उनकी मातृभूमि तो अफ़ग़ानिस्तान ही है। 

दोहा-वार्ता में अफ़ग़ान-प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व डाॅ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला कर रहे हैं, जो कि अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनका परिवार वर्षों से दिल्ली में ही रहता है। वह भारतप्रेमी और मेरे मित्र हैं। इस दोहा-वार्ता में भारत का रवैया बिल्कुल सही और निष्पक्ष है। बजाय इसके कि वह किसी एक पक्ष के साथ रहता, उसने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत ऐसा समाधान चाहता है, जो अफ़ग़ानों को पूर्णरुपेण स्वीकार हो और उन पर थोपा न जाए। लगभग यही बात माइक पोंपियो और शाह महमूद कुरैशी ने भी कही है। 

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अब देखना यह है कि यह समझौता कैसे होता है? क्या कुछ समय के लिए तालिबान और अशरफ गनी की काबुल सरकार मिलकर कोई संयुक्त मंत्रिमंडल बनाएँगे? या नए सिरे से चुनाव होंगे? या तालिबान सीधे ही सत्तारूढ़ होना चाहेंगे यानी वे गनी सरकार की जगह लेना चाहेंगे? इसमें शक नहीं कि तालिबान का रवैया इधर काफ़ी बदला है। उन्होंने काबुल सरकार के प्रतिनिधि मंडल में चार महिला प्रतिनिधियों को आने दिया है और कश्मीर के मसले को उन्होंने इधर भारत का आंतरिक मामला भी बताया है। यदि तालिबान थोड़ा तर्कसंगत और व्यावहारिक रुख अपनाए तो पिछले लगभग पचास साल से उखड़ा हुआ अफ़ग़ानिस्तान फिर से पटरी पर आ सकता है।

(लेखक, अफ़ग़ान-मामलों के विशेषज्ञ हैं। डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

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