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मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा। (फ़ाइल फ़ोटो)

कर्नाटक के वोटरों ने दलबदलुओं को सज़ा के बजाय इनाम क्यों दिया?

कर्नाटक के उपचुनाव परिणाम भारत की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत लेकर आए हैं। किसी राज्य में व्यापक स्तर पर यह पहली बार हुआ है कि वहाँ के वोटरों ने पद और पैसे के लालच में दलबदल करने वाले विधायकों को दंडित करने के बजाय उनको फिर से जिता दिया है। लेकिन ऐसा उन्होंने क्यों किया? एक त्वरित विश्लेषण।
नीरेंद्र नागर

कर्नाटक उपचुनावों के नतीजे चौंकाने वाले हैं। चौंकाने वाले इसलिए कि उन 15 सीटों पर जहाँ कोई डेढ़ साल पहले कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के उम्मीदवार विजयी हुए थे, उनमें से 12 में बीजेपी जीत चुकी है। कांग्रेस के नेता डी. के. शिवकुमार ने हार स्वीकार करते हुए कहा है कि इससे पता चलता है कि जनता ने दलबदलुओं को स्वीकार कर लिया है।

शिवकुमार ने जो बात कही है, वह एक बड़ा संकेत है आज की और आने वाले दिनों की राजनीति के बारे में। क्या इन परिणामों का यह मतलब निकाला जाए कि राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में जिस दलबदल को नैतिक दृष्टि से बुरा समझा जाता है, वह भारतीय वोटर, ख़ासकर कर्नाटक के वोटर की दृष्टि में बुरा नहीं है?

पहली नज़र में यही लगता है लेकिन कर्नाटक के इन 12 चुनाव क्षेत्रों में जहाँ बीजेपी विजयी रही है, वहाँ के वोटरों के इस व्यवहार के पीछे कुछ और कारण भी हो सकते हैं।

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पहला कारण पूरी तरह गणितीय हो सकता है। हर चुनाव क्षेत्र में अधिकतर वोटर पार्टी के आधार पर वोट देते हैं जिन्हें प्रतिबद्ध वोट कहा जाता है। लेकिन कुछ वोट उम्मीदवार की निजी लोकप्रियता के कारण भी पड़ते हैं। अब इस चुनाव में कितने वोटरों ने उम्मीदवार को वोट दिए और कितनों ने पार्टी को, यह तो अंतिम आँकड़े मिलने के बाद ही कहा जा सकता है, लेकिन पहली नज़र में यही लगता है कि दलबदलू उम्मीदवार भी अपनी निजी लोकप्रियता के कारण अच्छे-ख़ासे वोट हासिल कर पाए हैं।

इसे यूँ समझिए कि किसी सीट पर पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को 40 वोट मिले थे और बीजेपी उम्मीदवार को 30। कांग्रेस जीत गई। बाद में उसके उम्मीदवार ने पार्टी बदल ली। इस चुनाव में बीजेपी ने वही उम्मीदवार उतारा तो उसे न केवल बीजेपी समर्थकों के 30 वोट मिले, बल्कि दलबदलू उम्मीदवार की निजी लोकप्रियता की वजह से 10 वोट और मिल गए जो पहले कांग्रेस के खाते में गए थे। इससे उसके कुल वोट हो गए 40 जबकि नए कांग्रेसी उम्मीदवार को केवल अपने प्रतिबद्ध 30 वोट मिले। इस तरह से परिणाम उलट गया।

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दूसरा कारण यह हो सकता है कि दलबदलू उम्मीदवार को जो अतिरिक्त वोट मिले हैं, वे उसे उसकी निजी लोकप्रियता के कारण नहीं बल्कि बीजेपी की बढ़ी हुई लोकप्रियता के कारण मिले हैं। यह तो हम जानते ही हैं कि पिछले चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी मगर बहुमत से कुछ पीछे रह गई थी। तब कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बना ली थी और सबसे कम सीटें पाने वाली पार्टी जेडीएस के कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बन गए थे। हो सकता है, लोगों को उनका मुख्यमंत्री बनना और बाद में मिलीजुली सरकार का काम पसंद न आया हो और इस कारण बीजेपी का वोट शेयर इस बार पहले से ज़्यादा बढ़ गया हो।

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तीसरा कारण यह हो सकता है कि इन चुनाव क्षेत्रों के वोटरों को यह अहसास था कि ये दलबदलू उम्मीदवार अगर जीत गए तो मौजूदा बीजेपी सरकार में कोई अच्छा पद हासिल करेंगे (क्योंकि उसी के लिए तो उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दिया था) और अपने पद और महत्व के कारण वे उनके इलाक़े के लिए काम कर पाएँगे। अपने इस हित या स्वार्थ को देखते हुए ही कुछ वोटरों ने जिन्होंने पहले कांग्रेस या जेडीएस को वोट दिया था, वे इस बार बीजेपी में शामिल हुए दलबदलू उम्मीदवार के साथ आ गए और इस कारण उसके और बीजेपी के हिस्से के वोट बढ़ गए हों।

कर्नाटक में दलबदलुओं की जीत के पीछे इन तीनों में से कोई एक, दो या थोड़ा-बहुत तीनों कारण हो सकते हैं। वजह चाहे जो हो, इन परिणामों से निष्कर्ष तो यही निकलता है कि आज का वोटर यह नहीं देखता कि कौन नेता कितना ईमानदार या बेईमान है या वह अपनी पार्टी के प्रति कितना वफ़ादार है। वह केवल यह देखता है कि क्या वह उसका काम करा पाने की स्थिति में है।

वह ऐसा इसलिए भी सोच रहा है कि उसे मालूम है कि राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं। जो इधर हैं, वे भी और जो उधर हैं, वे भी। इसलिए उसने उम्मीदवार चुनने के अपने क्राइटीरिया में से ईमानदारी और नैतिकता की अनिवार्यता को हटा दिया है।

राजनीतिज्ञों के लिए यह ख़ुशी की बात है। अब वे ईमानदारी और वफ़ादारी को कूड़ेदान में डाल सकते हैं।

नीरेंद्र नागर

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