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गाँधी ज़िंदा होते तो निर्भया के दोषियों को क्या सज़ा दी जाती?

गाँधी का बहुत साफ़ मानना था कि अगर हम जान दे नहीं सकते तो हमें जान लेने का अधिकार नहीं है। उनके इस कथन और वाक्य प्रयोग को भी याद करना चाहिए कि ‘ऐन आई फ़ॉर ऐन आई विल मेक होल वर्ल्ड ब्लाइंड’ (आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगा) जैसा हिंसक बदला पूरी दुनिया के नाश पर ही जाकर रुकेगा।
अरविंद मोहन

बात सिर्फ़ इस बार की नहीं है। हर बार जब किसी अपराधी को फाँसी देने का अवसर आता है तो देश में एक अलग क़िस्म का जुनून छा जाता है। कहना न होगा कि इधर फाँसी की सज़ा मिलने का क्रम भी बढ़ा है। ‘रेयर ऑफ़ द रेयरेस्ट’ के नाम पर सिर्फ़ जान लेने के मामलों में ही नहीं, देशद्रोह या बलात्कार जैसे अपराधों के लिए न सिर्फ़ फाँसी की सज़ा दी जाने लगी है बल्कि जब ऐसे मामलों की सुनवाई चल रही होती है तभी से मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य मंचों से फाँसी की माँग का ऐसा शोर मचता है कि जज भी उससे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहते और एकाध मामलों में उन्होंने कबूल किया कि अदालती सबूत और गवाहियों से फाँसी लायक दोष साबित न होने पर भी उन्हें यह आख़िरी हथियार मुल्क के सामूहिक जुनून को देखते हुए करना पड़ता है।

बात सिर्फ़ अदालतों की नहीं है। मीडिया भी इन मामलों को जुनूनी रंग देने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है क्योंकि उसकी रेटिंग चढ़ जाती है या उसकी प्रसार संख्या बढ़ जाती है। और ऐसे वक़्त अगर मानवाधिकार की परवाह करने वाला या सामान्य करूणा से भरा कोई व्यक्ति फाँसी के ख़िलाफ़ ज़ुबान भी खोलने की हिम्मत करता है तो उसे देशद्रोही और अपराध का संरक्षक जैसे विशेषणों से विभूषित कर दिया जाता है।

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निर्भया से बलात्कार और हत्या के मामलों के अपराधियों को फाँसी पर चढ़ाने के अवसर पर भी यही सब कुछ हुआ।ऊपरी अदालत में अर्जी देने, पुनर्विचार याचिका या क्युरेटिव पेटीशन और दया की अर्जी जैसे विकल्पों के चलते भी जब फाँसी की तारीख़ टली, ऐसा उबाल आया है मानो भीड़ इन अपराधियों को ख़ुद भी फाँसी देने में पीछे नहीं हटेगी। बलात्कार और हत्या के मामलों में जो वकील अभियुक्तों को क़ानूनी मदद उपलब्ध कराने आते हैं उन्हें खलनायक की तरह पेश किया जाता है, जबकि आम तौर पर इस तरह के अभियुक्त बहुत मौद्रिक लाभ देने की स्थिति में नहीं होते। जुनूनी क़िस्म के वकील ही पैरवी करने के लिए आगे आते हैं।

निर्भया मामले में उसकी माँ और परिवार के लोगों का ग़ुस्सा, उसे न्याय दिलाने की बड़ी लड़ाई लड़ने वाले लड़कियों-लड़कों का ग़ुस्सा सात्विक माना जा सकता है। बेटी गँवाने वाली माँ की ऐसी भावनात्मक अभिव्यक्ति को सामान्य प्रतिक्रिया ही मानना चाहिए। और उसकी तुलना इस बात से भी करने की ज़रूरत नहीं है कि गाँधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे को फाँसी देने के ख़िलाफ़ गाँधी के दो बेटों रामदास और देवदास ने गृह मंत्री पटेल को लिखित अर्जी दी थी या हाल में राजीव गाँधी के हत्यारों की सज़ा माफ़ी के लिए सोनिया, राहुल और प्रियंका ने भी सार्वजनिक माँग की थी।

इन बातों को कुछ देर भूल भी जाएँ तो भी यह याद रखना ज़रूरी है कि यह साल गाँधी की 150वीं जयंती का है और राष्ट्रपिता माने जाने वाले महात्मा (ही नहीं हमारे संविधान के निर्माता बाबा साहब आम्बेडकर) फाँसी के सख़्त ख़िलाफ़ थे।

अगर क़ानून में फाँसी की सज़ा को बनाए रखा गया तो ‘रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर’ मामलों के लिये, वरना भारी से भारी जुर्म की सज़ा आजीवन कारावास ही रखी गई।

गाँधी का बहुत साफ़ मानना था कि अगर हम जान दे नहीं सकते तो हमें जान लेने का अधिकार नहीं है। उनके इस कथन और वाक्य प्रयोग को भी याद करना चाहिए कि ‘ऐन आई फ़ॉर ऐन आई विल मेक होल वर्ल्ड ब्लाइंड’ (आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगा) जैसा हिंसक बदला पूरी दुनिया के नाश पर ही जाकर रुकेगा।

‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’

गाँधी की राय दो वाक्यों वाली न थी और न ही वह शौकिया मानवाधिकारवादी थे। उनके लिए अहिंसा एक बुनियादी मूल्य था और इसके सहारे उन्होंने क्या कुछ हासिल किया, इसे यहाँ दोहराने की ज़रूरत नहीं है। उनका इस नीति वाक्य पर शत-प्रतिशत भरोसा था कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। उनका मानना था, 

“इस नीति वाक्य को समझना बहुत आसान है पर इस पर अमल करना बहुत मुश्किल। इस पर शायद ही कभी अमल किया जाता है इसलिए दुनिया में घृणा का विष फैलता जा रहा है। अहिंसा सत्य के शोध का आधार है। मैं दिन ब दिन इस बात का कायल होता जा रहा हूँ कि सत्य का शोध तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका आधार अहिंसा न हो। किसी प्रणाली का प्रतिरोध करना और उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उचित है लेकिन उसके कर्ता का प्रतिरोध और उस पर हमला मानो अपने ही ऊपर हमला है। हम सब एक ही सृष्टिकर्ता की संतानें हैं इसलिए हम सब में असीम दैवी शक्तियाँ हैं। एक भी मनुष्य का अपमान करना उन दैवी शक्तियों का अपमान करना है।” (आत्मकथा, पृ. 203) 

महात्मा गाँधी मानते थे कि हर आदमी में किसी भी पल बदलाव सम्भव है। और दुनिया में बुरे का अच्छा बनने और अच्छे का बुरा बनने के उदाहरणों की कमी नहीं है।

गाँधी की राय थी, “मनुष्य और उसका कर्म दो अलग-अलग चीजें हैं। जहाँ सद्कर्म का अनुमोदन किया जाना चाहिए और और कुकर्म की निंदा की जानी चाहिए वहीं उनका कर्ता, चाहे वह भला हो या दुष्ट, सदैव यथास्थिति, आदर या दया का पात्र होना चाहिए।” (हरिजन,1/6/1947) 

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एक अन्य अवसर पर गाँधी कहते हैं, “जो लोग इस विश्वास के चलते आचरण के बजाय आचरणकर्ता को नष्ट करना चाहते हैं कि उनके साथ ही उसका आचरण भी मर जाएगा, उन आचरणों को स्वयं अपना लेते हैं और जिस व्यक्ति को समाप्त करना चाहते हैं, उससे भी ज़्यादा बुरे साबित होते हैं। दरअसल वे बुराई की जड़ को नहीं पहचानते।” (यंग इंडियन, 17/3/1927)

गाँधी यह भी कहते हैं, “मेरे जीवन में बड़े विजेता और सफल राजनेता पथप्रदर्शक नहीं हो सकते। मुझे तो कृष्ण में विश्वास है। मेरा कृष्ण ब्रह्मांड का स्वामी, और हम सबका सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारक है। वह सृष्टिकर्ता है इसलिए संहार भी कर सकता है....” (यंग इंडियन, 9/4/1925)

पर क्या ऐसे युग में जबकि गाँधी का नाम लेकर गाँधी के उसूलों को मिटाने का क़ारोबार चालू है, उनकी बातों पर ग़ौर किया जाएगा?

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अरविंद मोहन

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