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योगी आदित्यनाथ को 'मुग़ल' शब्द से इतनी चिढ़ क्यों?

आगरा की मुग़ल संस्थापना पर हमला बोलने का सिलसिला अकबर और ताजमहल पर हमला बोलने से शुरू हुआ। अकबर की तमाम कृत्रिम नकारात्मकताओं को प्रचारित -प्रसारित करने की कोशिश हुई। ताजमहल को 'तेजोमहल' बनाकर पेश करने का 'संघ परिवार' का प्राचीन एजेंडा था ही, अब उसकी लोकप्रियता को कैसे कम किया जाए, यह सवाल मोदी सम्प्रदाय को परेशान कर रहा था।
अनिल शुक्ल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सबसे सबसे बड़ा शौक़ है 'प्रदेश' के शहरों के पुराने और ऐतिहासिक नामों को ज़मींदोज़ कर नए नामों की स्थापना करना, भले ही उनका कोई ऐतिहासिक महत्व हो या न हो। नाम बदलने के उनके शौकों में शहरों की जगह अब ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व की इमारतों ने लेनी शुरू की है और इसमें सबसे पहले गाज गिरी है आगरा के 'मुग़ल म्यूज़ियम' पर।
बीते रविवार मुख्यमंत्री ने इसका नाम बदल कर  ‘शिवाजी म्यूज़ियम’ रख दिया। उनके इस अप्रत्याशित निर्णय पर न सिर्फ़ इतिहास के अकादमिक क्षेत्रों में व्यापक नकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है, बल्कि आगरा के सामान्य नागरिकों ने भी इसे ‘बेमतलब की कोशिश’ बताया है। 

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'वन प्वाइंट अजेंडा'

उत्तर प्रदेश में बीजेपी जब-जब सत्ता में आई है, आगरा को लेकर उसका 'वन प्वाइंट एजेंडा' यहाँ के ऐतिहासिक संसार में मुगलों के महत्व को कम करके दर्शाना रहा है। इत्तेफ़ाक़ से पिछली सरकारें न तो लम्बे समय रह पाई और न स्वतंत्र दल होने के चलते उन्हें यह अवसर मिल सका। पिछले दौर में आगरा के डिग्री कॉलेजों के इतिहास के कुछ छुटभैया अध्यापकों को बटोर कर आगरा के इतिहास में कुछ नए 'तथ्यान्वेषण' रोपने की कोशिश की गई थी, हालांकि ऐसा हो नहीं सका।
2014 में केंद्र में सत्तानशीन होने और उसके 3 साल बाद यूपी में सरकार बना लेने के बाद उनके लिए आगरा के इतिहास का मैदान हाज़िर- नाज़िर था, जहाँ वे मुग़लों के ऐतिहसिक महत्व को कमतर बनाने और अनैतिहासिक तथ्यों की स्थापनाओं के चौके -छक्के लगाने के लिए उन्मुक्त थे और उन्होंने ऐसा किया भी।

जल्द पूरा हो जाएगा निर्माण कार्य

'मुग़ल म्यूज़ियम' की आधारशिला तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जनवरी 2016 में रखी थी। 6 एकड़ भूमि में फैला बहुमंज़िला परिसर और महत्वाकांक्षी योजनाओं वाला यह म्यूज़ियम तब से तेज़ी से निर्माणाधीन है और उम्मीद है कि पूरा हो जाने के बाद यह पयटकों के लिए आकर्षण का बहुत बड़ा केंद्र साबित होगा। आने वाले पर्यटकों के लिए यह सम्पूर्ण मुग़ल काल की झांकी प्रस्तुत करेगा।
मुख्यमंत्री के ताज़ातरीन फ़ैसले के बाद लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या मध्यकाल के पूरे इतिवृत्त की पूर्ति शिवाजी के अत्यंत अल्पकालीन आगरा प्रवास से हो जायेगी?

क्या कहना है इतिहासकारों का?

मध्यकाल के सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो० इरफ़ान हबीब कहते हैं ‘देश की नई या पुरानी इमारतों को सांप्रदायिक बनाकर लोगों के वहां जाने से रोका नहीं जा सकता। लोग वहां जाएंगे भी और उन्हें जानना भी चाहेंगे। आप एक स्रोत को कुछ वक़्त के लिए रोकेंगे तो दूसरे बहुत सारे स्रोत खुले हुए हैं। किस किस को रोकेंगे? उन्होंने सत्य हिन्दी से कहा, 

‘मुग़ल हमारे हीरो नहीं थे, आपके कह देने भर से वे विलेन नहीं हो जाते। उनका जो भी अच्छा या बुरा रोल था, आपके नकारने से वह ख़त्म थोड़े ही हो जाता है!’


इरफ़ान हबीब, इतिहासकार

आगरा के पुरातात्विक स्मारकों के बड़े शोधकर्ता और सेंट जॉन्स कॉलेज के इतिहास विभाग के रिटायर्ड अध्यक्ष प्रो० आर. सी. शर्मा मुख्यमंत्री के इस निर्णय को बेतुका बताते हैं। वह कहते है, 

‘आपको अगर मुग़ल शब्द से चिढ़ थी तो आप इसका नाम 'अकबर म्यूज़ियम' रख देते। अगर अकबर से कोई रंजिश थी तो 'दाराशिकोह म्यूज़ियम' रख सकते थे। अगर दाराशिकोह भी नहीं पसंद आ रहा था तो 'ताज म्यूज़ियम' रख देते।'


आर. सी. शर्मा, शोधकर्ता

वह कहते हैं,  'शिवाजी के छोटे से आगरा विज़िट को आप आगरा के इतिहास में कितना लम्बा खींचोगे? वह आए और चले गए।’ प्रो० शर्मा 'मिठाई के टोकरी' में बैठ कर फ़रार हो जाने की घटना को भी कपोलकल्पित मानते हैं।'  

टोकरी में बैठ कर भाग निकले थे शिवाजी?

शिवाजी काल के बड़े मराठी इतिहासकार प्रो० एस. एस. पागड़ी भी टोकरी में बैठ कर भाग जाने को एक क़िस्सा भर मानते हैं। 'नेशनल बुक ट्रस्ट' से शिवाजी पर प्रकाशित अपनी पुस्तक में वह सवाल करते है कि शिवाजी ने रामसिंह से 66 हज़ार रुपये उधार लिए थे, वे कहाँ गए? रामसिंह जयपुर के सवाई जयसिंह के पुत्र थे और 5 हज़ार से भी कम वाले मनसबदार थे। 
प्रो० पागड़ी मानते हैं की बादशाह ने पहली और एकमात्र मुलाक़ात में उन्हें 'भूमिया' (छोटा सा ज़मींदार) कहकर बुलाया, जिससे शिवाजी आहत हुए। वह कहते हैं, 

'यह कहना कि शिवाजी क़िले में क़ैद थे, बेतुका है। क़िले की जेल 'अंडरग्राउंड होती थीं और वहां से भागना नामुमकिन है। शिवाजी वहीं ग्वालियर रोड के तम्बू में नज़रबंद थे।'


एस. एस. पागड़ी, इतिहासकार

शिवाजी ने घूस दिया था?

रामसिंह से उधार लिए 66 हज़ार रुपयों में से उन्होंने कुछ सिपाहियों को घूस दी और कुछ मुग़ल दरबारियों को। बाक़ी का पैसा वह राह खर्च के लिए अपने पास रखकर फ़रार हो गए।

इतिहास में दर्ज़ तारीखें इतनी उथली नहीं होती की उन्हें राजनीतिक चाकू से खुरच कर मिटाया जा सके। अलबत्ता उनके साथ कुछ फर्ज़ी तारीखों को ज़रूर जोड़ने की कोशिश की जा सकती है, भले ही देश और दुनिया का इतिहास उसे स्वीकार न करे।
इस सारी कोशिश में जो एकमात्र उपलब्धि होती है वह है कुछ समय के लिए नयी और अनजान पीढ़ी को भ्रमित कर डालना। बीजेपी का यही उद्देश्य है।

मुग़लों का महत्व कम करने की कोशिश

साल 2014 से ही भारत के इतिहास में मुग़लों को ग़ैर महत्व का बनाकर पेश करने की कोशिशें शुरू हो गईं। ज़ाहिर है, आप यह तो साबित कर नहीं सकते थे कि सन 1526 में पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोधी को पराजित करके आगरा कूच करने और उसको राजधानी बना कर खुद को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित करने वाले शख़्स का नाम मुग़ल ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर नहीं, बल्कि घासीराम शास्त्री पुत्र लल्लूलाल आर्य था।
आप यह भी नहीं साबित कर सकते कि भारत के मध्यकालीन इतिहास का नायक अकबर नहीं, चोखेलाल शर्मा था। मान लिया कि यदि कागज-पत्तर और प्राइमरी पाठ्यक्रम में इंक रिमूवर लगाकर आपने यह सब हास्यास्पद बातें लिख भी दीं तो क्या चोखेलाल के बेटे का नाम जहांगीर, पोते का नाम शाहजहां और पड़पोते का नाम औरंगज़ेब साबित कर सकेंगे?
क्या आप सारी दुनिया के सामने यह भी साबित कर पाएंगे कि ताजमहल का निर्माण राजा भगोनालाल ने अपनी महारानी कटोरी देवी की स्मृति में करवाया था? यक़ीनन नहीं!
 अलबता ज़्यादा से ज़्यादा आप उनके नाम से बनी सड़कों के नाम बदल सकते हैं। आप शहरों और रेलवे स्टेशनों की नाम पट्टिकाओं को बदल सकते हैं। बीजेपी यही कर सकती थी और उसने यही किया। 

इलाहाबाद से प्रयागराज

इलाहाबाद की जगह प्रयागराज लिखना तो प्रशासकीय मोहर बदल कर मुमकिन है, लेकिन इलाहाबादी बाशिंदे से प्रयागराजी नागरिक बन चुके वरिष्ठ कॉरपोरेट कंसल्टेंट पीयूष श्रीवास्तव पूछते है ‘इलाहाबादी अमरूद’ का नाम मोहर लगाकर  'प्रयागराजी अमरूद' किया जा सकता है? क्या आप मुझे मशहूर शायर का नाम अकबर इलाहाबादी से पलटकर अकबर प्रयागराजी रख देने की इजाज़त देंगे?’
आगरा की मुग़ल संस्थापना पर हमला बोलने का सिलसिला अकबर और ताजमहल पर हमला बोलने से शुरू हुआ। अकबर की तमाम कृत्रिम नकारात्मकताओं को प्रचारित -प्रसारित करने की कोशिश हुई। ताजमहल को 'तेजोमहल' बनाकर पेश करने का 'संघ परिवार' का प्राचीन एजेंडा था ही, अब उसकी लोकप्रियता को  कैसे काम किया जाए, यह सवाल मोदी सम्प्रदाय को परेशान कर रहा था। से कैसे निबटें? 

मुगल संस्थापना पर हमला

प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा हो जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल  में ही बल्लभभाई पटेल की 'स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी' का खूंटा ठोंक दिया। उत्तर के राजस्थान और दक्षिण के केरल और तमिलनाडु के महान मूर्तिशिल्पियों को बरफ़ में लगा कर 'मेकिंग ऑफ़ इण्डिया' के लीजेंड नरेंद्र मोदी चीन से मूर्ति 'कसवा' लाए इस नारे के साथ- कि दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। जब दुनिया की दूसरी मूर्तियों ने हाथ उठकर खड़ी होकर अपनी लम्बाई दिखाने लग गईं तो हमले की तोपें ताजमहल की और मोड़ दी गईं।
प्रचार शुरू हो गया कि उद्घाटन से पहले ही 'स्टैच्यू' देखने आने वाले पर्यटकों की तादाद ताजमहल जाने वालों से ज़्यादा है। अक्टूबर 2018 में.जबकि 'स्टैच्यू' का उद्घाटन हो गया तब तो 'दर्शक संख्या' और भी अधिकृत होकर फैलाई जाने लगी।
साल 2018-19 में महान झूठ गढ़ा गया कि ताजमहल को देखने वालों की तादाद 7.5 लाख है जबकि 'स्टैच्यू' देखने वाले 26 लाख हैं। कुछ खोजी मंत्रालय के आँकड़े निकाल लाए- नहीं जी, ताजमहल आने वाले पर्यटक 70 लाख थे और 'स्टैच्यू' वाले 26 लाख।

मुगल स्थापत्य में दिलचस्पी कम?

विदेश से आने वाले राजकीय और कूटनीतिक अतिथियों को सरकारी तोहफे के रूप में संगमरमर देने की परंपरा थी, उसे बंद कर दिया गया। बीजेपी के आईटी सेल ने वॉट्सऐप उद्योग में खबर प्रसारित की कि मुग़लों द्वारा निर्मित पुरातात्विक इमारतों में लोगों की रुचि कम हो गई है।
यह 'सत्य' भी प्रसारित किया गया कि ताजमहल की आय लगातार घट रही है और जितनी आमदनी नहीं, उससे ज़्यादा रख रखाव का खर्च हो रहा है।
इसमें कोई शक नहीं कि ऐतिहासिक प्राचीन और मध्यकालीन मंदिर और उनकी लालित्यपूर्ण स्थापत्य कला इसी देश की विरासत है और पर्यटक उद्योग में उन्हें भी खूब प्रचारित-प्रसारित किया जाना चाहिए।
लेकिन मुग़लकालीन स्थापत्य को हेठा, अनाकर्षक और पयटकों को को कम लुभाने का झूठ भी किसी पर्यटन संसार का सच नहीं हो सकता। 
पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल को नवम्बर 2019 में प्रश्नोत्तरकाल के दौरान लोकसभा को बताना पड़ा कि बीते 3 सालों में ताजमहल की आय 200 करोड़ है, जो देश के किसी भी ऐतिहासिक स्मारक की तुलना में सर्वाधिक है। इसके रखरखाव पर होने वाला खर्च 13.37 करोड़ है।

5 स्मारक

आय के बावजूद हाल के सालों में हुए घटिया रखरखाव के लिए पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कस कर फटकारा भी था। पटेल ने यह भी बताया कि देश के केंद्रीय नियंत्रण वाले कुल स्मारकों की आधे से ज़्यादा आय वाले 5 स्मारक- 1.ताजमहल, 2. लाल क़िला, 3. क़ुतुब मीनार, 4. आगरा क़िला और 5. फतेहपुर सीकरी हैं। आईटी सेल के पर्यटक संख्या में गिरावट के दावों के विपरीत पर्यटन मंत्री ने बताया कि अकेले 2017-18 की तुलना में 2018-19 में ताजमहल में आने वाले पर्यटकों की तादाद में 6% की वृद्धि हुई है। पिछले 5 वर्षों में संख्या का यह ग्राफ निरंतर ऊपर जा रहा है।
उन्होंने यह भी माना कि कोणार्क का 'सूर्य मंदिर' बेशक पर्यटकों की संख्या की दृष्टि से दूसरा है, लेकिन आय की दृष्टि से यह इन 5 से बहुत पीछे है, क्योंकि यहाँ विदेशी पर्यटक नहीं आते। 

300 साल 

साल 1526 से शुरू होकर 1857 तक खिंचने वाला मुग़लों का इतिहास किन्ही 2-4 व्यक्तियों की निजी गाथा नहीं बल्कि 3 सौ साल से ज़्यादा का एक काल है, जिसने भारत की जीवन शैली, सामंती आर्थिक ढाँचे, भूमि प्रबंधन, शिक्षा, कला, स्थापत्य, संगीत और संस्कृति को एक नयी रंगत दी।  इसमें बहुत से तत्व तुर्की, अरबी और गज़नी के थे और बहुत से भारतीयता वाले।
मुगलों का योगदान यह है कि उन्होंने इन सारे तत्वों के मिश्रण से एक नई भूमि और माटी को जन्म दिया जो वैश्विक इतिहास में मुगल संस्कृति के नाम से दर्ज़ है।

मुग़ल लूट कर नहीं ले गए

अंग्रेज़ों की तरह मुग़ल हमारे यहाँ से कुछ लूट कर कहीं नहीं ले गए। उन्होंने जो भी कमाया, युगों-युगों तक सब इसी देश में रहा। उनकी इस सारी व्यवस्था को, कोई सहमत हो या असहमत तो हो सकता है, उसे नकार नहीं सकता।
यदि मुग़ल हमारे नायक नहीं थे तो क्या वे हिन्दू राजा हमारे नायक थे जो अपने आपसी स्वार्थों और झगड़ों की ख़ातिर आक्रांता मुसलिम शासकों को हमला करने की दावत देकर बुला लाये और जिन्होंने दूसरी सहस्त्राब्दी की शुरुआत में ही 'सल्तनत काल' को जन्म दिया-  मुग़लों से तीन सौ साल पहले!। 
सरकार के इस फ़ैसले के विरोध में आगरा के प्रबुद्ध वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। 'आगरा विश्विद्यालय शिक्षक संघ' (औटा) के पूर्व महामंत्री और शिक्षक नेता डॉ० रक्षपाल सिंह ने बीते सोमवार मुख्यमंत्री को एक लम्बा पत्र भेजा है। वह लिखते हैं ‘... सच्चाई यह है कि मुगलों से अपने संघर्ष की बदौलत ही शिवाजी महाराज छत्रपति कहलाए। आप मुग़लों का नाम ही महत्वहीन कर देंगे तो शिवाजी महाराज का वर्तमान में क्या महत्व रह जाएगा?’ स्थानीय दैनिक अखबारों में अनेक सामाजिक संगठन के लोगों के नाराज़गी भरे बयान छपे है।
अनिल शुक्ल

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