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फ़ोटो साभार: ट्विटर/सुशांत सिंह राजपूत

सुशांत केस- बिहार पुलिस ने ज़ीरो एफ़आईआर क्यों नहीं दर्ज की!

सुशांत सिंह राजपूत केस में बिहार पुलिस ने ज़ीरो एफ़आईआर क्यों नहीं दर्ज की और इस मामले को मुंबई पुलिस के पास क्यों नहीं भेज दिया? जब एक ही केस में दो पुलिस थाने जाँच कर रहे हों और दोनों की फ़ाइंडिंग अलग-अलग हो तो केस का ख़राब होना तय है। ऐसे में जाँच में बहुत सारी उलझनें पैदा होने की पूरी संभावना है। मुम्बई पुलिस की थ्योरी कुछ और होगी, बिहार पुलिस की कुछ और। 
आलोक वर्मा

सुशांत सिंह राजपूत केस पर बिहार पुलिस और मुंबई पुलिस अब सार्वजनिक रूप से आमने-सामने हैं। पटना के सिटी एसपी विनय तिवारी के हाथ पर क्वारंटीन की मुहर लगाकर मुंबई पुलिस ने साफ़ कर दिया है कि जाँच में बिहार पुलिस के कूदने से वह ख़ुश नहीं है। ख़ुश हो भी तो कैसे? क्या कोई यह बता सकता है सारा मामला किसी और राज्य में होने के बाद भी बिहार पुलिस ने अपने यहाँ मुक़दमा क्यों दर्ज किया?

सुशांत के परिजनों के प्रति पूरी सहानुभूति रखने के साथ-साथ कुछ बातों पर विचार होना ज़रूरी है। पहली बात तो यही कि बिहार पुलिस ने ज़ीरो एफ़आईआर क्यों नहीं दर्ज की और इस मामले को मुंबई पुलिस के पास क्यों नहीं भेज दिया? दूसरी अहम बात यह भी कि ऐसे कितने मामलों में बिहार पुलिस ने मुक़दमे दर्ज किए हैं? ये सवाल बिहार पुलिस को अटपटे लग सकते हैं। लेकिन परिवार वालों की शिकायत और हादसों के मुताबिक़ जालसाजी से लेकर मौत तक मुंबई में हुए तो मामला तो मुंबई का ही बनता था। बिहार पुलिस अगर ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज कर उसका पूरा विवरण मुंबई पुलिस के पास भेज देती तो मुंबई पुलिस इसे अपनी जाँच का हिस्सा बनाने पर मजबूर होती।

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अब अगर मुंबई पुलिस की बात करें तो वह भी दूध की धुली नज़र नहीं आती। मुंबई पहुँची बिहार पुलिस के साथ जो व्यवहार किया गया, और किया जा रहा है वह कहीं से क़ानून संगत या न्याय संगत नहीं है। अगर मुंबई पुलिस की नियत साफ़ होती तो वह बिहार से गए पुलिसकर्मियों के साथ जाँच की कार्रवाई शेयर करने के साथ-साथ सौहार्द का वातावरण बनाए रखती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक चमचमाते सितारे की असामयिक मौत की जाँच विवादों की बलि चढ़ने पर है।

वक़्त के साथ इन सवालों के जवाब अब कोर्ट से ही मिलेंगे, यह तय है, लेकिन इस बीच एक अच्छी बात ज़रूर हुई है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले में ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी कार्रवाई शुरू कर दी है। इसके साथ ही यह संकेत भी मिल रहे हैं कि आख़िर में यह मामला सीबीआई के पास ही जाएगा।

हाल ही में आया बिहार के सीएम नीतीश कुमार का बयान इस केस की सीबीआई जाँच की ओर इशारा करता है। यह तय माना जा रहा है कि ईडी और सीबीआई के जुड़ने से इसमें फ़िल्मी दुनिया के ‘नेपोटिज़्म’ चलाने वाले गैंग और अंडरवर्ल्ड कनेक्शन भी खुलकर सामने आ सकता है।

क्या सीबीआई जाँच होगी?

सुशांत सिंह की मौत के मामले में बिहार सरकार और महाराष्ट्र की सरकार आमने-सामने है। महाराष्ट्र सरकार कहती है कि इस मामले में सीबीआई जाँच की ज़रूरत नहीं है। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री ने साफ़ कर दिया है कि अगर एक्टर के पिता चाहेंगे तो बिहार सरकार सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश करेगी। आपको बता दें कि राज्य सरकार के निर्देश या कोर्ट के आदेश पर कोई मामला सीबीआई जाँच के लिए भेजा जा सकता है लेकिन मामले की फ़ाइल कार्मिक मंत्रालय के डीओपीटी यानी कार्मिक मंत्रालय से होता हुआ जाता है और उसके बाद भी सीबीआई मामले की जाँच करने से मना कर सकती है। यह बात दीगर है कि सीबीआई कभी ऐसा करती नहीं और इसकी उम्मीद इस मामले में भी नहीं है। 

फ़िलहाल सुशांत सिंह की मौत मुम्बई में हुई है। मुम्बई पुलिस में इसकी जाँच हो रही है। इस केस का ज्यूरिस्डिक्शन यानी न्यायिक अधिकार क्षेत्र भी मुम्बई पुलिस का बनता है। मुम्बई पुलिस की अब तक की जाँच इस निष्कर्ष पर है कि ये सुसाइड का मामला है, और इसमें किसी दूसरी एजेंसी की जाँच की ज़रूरत नहीं है। महाराष्ट्र के गृह मंत्री भी यह कह चुके हैं कि इस केस में सीबीआई जाँच की ज़रूरत नहीं है।

ज्यूरिस्डिक्शन का सवाल

यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या इस मामले में बिहार पुलिस का ज्यूरिस्डिक्शन यानी अधिकार क्षेत्र बनता है, मामला दर्ज करने का? क्योंकि सुशांत सिंह के साथ ठगी हुई या नहीं, उनपर किसी ने दबाव बनाया या नहीं, यह बताने के लिए सुशांत अब दुनिया में नहीं हैं।  ऐसे में जब पीड़ित सामने नहीं है तो उसकी जगह परिवार की शिकायत पर बिहार पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। जबकि घटना पटना में नहीं हुई है, मुम्बई में हुई है। और मुम्बई पुलिस पहले ही जाँच कर रही है।

हालाँकि परिवार की शिकायत पर पटना में मामला दर्ज हो सकता है लेकिन ज़ीरो एफ़आईआर के रूप में। यही ज़ीरो एफ़आईआर मुंबई पुलिस के दर्ज मामले में ‘मर्ज’ (जुड़) हो जाती और लगे आरोपों को मुम्बई पुलिस अपनी जाँच में शामिल कर सकती थी। सामान्य तौर पर पुलिस केस में और जाँच पड़ताल में यही होता है।

इस केस में उल्टा हो रहा है। जहाँ वारदात हुई वहाँ जाँच धीमी है। और जहाँ वारदात नहीं हुई जो केस के ज्यूरिस्डिक्शन में नहीं है वहाँ बहुत तेज़ी से जाँच आगे बढ़ रही है।

बिहार पुलिस की टीम मुम्बई जाकर बहुत तेज़ी से अपनी जाँच में जुटी है। बिहार पुलिस को मुम्बई पुलिस की जाँच में सहयोग भी नहीं मिल पा रहा है। फिर भी बिहार पुलिस इस केस में मुम्बई में ना केवल डेरा डाले हुए है बल्कि बिहार के डीजीपी गुप्तेशवर पांडे ट्वीट से लेकर मीडिया में बयान दे देकर रिया से लेकर हर चीज पर सवाल उठा रहे हैं। विनय तिवारी को क्वारंटीन करने का तो उन्होंने वीडियो तक ट्वीट किया है।

अब बात इन मुद्दों की 

जब एक ही केस में दो पुलिस थाने जाँच कर रहे हों और दोनों की फ़ाइंडिंग अलग-अलग हो तो केस का ख़राब होना तय है। क्योंकि अदालत में ऐसे मामले टिक नहीं पाते। यहाँ तो दो थाने नहीं बल्कि दो राज्यों की पुलिस एक ही मामले की जाँच कर रही है।

विचार से ख़ास

ऐसे में जाँच में बहुत सारी उलझनें पैदा होने की पूरी संभावना है। मुम्बई पुलिस की थ्योरी कुछ और होगी, बिहार पुलिस की कुछ और। ऐसे स्थिति में केस फँस, उलझ सकता है और कोर्ट के सामने ऐसे मामले को सीबीआई को सौंपने का एक मज़बूत आधार बन जाता है। हालाँकि बिहार सरकार भी अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश कर सकती है। जिससे कि यह केस सीबीआई को ट्रांसफ़र हो जाए। अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच में केंद्र सरकार की दो एजेंसियाँ-  प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जुट जाएँगी।

फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत में दो अहम सवाल का जवाब लोग जानना चाहते हैं। क्या बहुत बड़ा कोई वित्तीय घोटाला इस केस में हुआ है? और दूसरा आख़िर सुशांत की मौत करने की असली वजह क्या थी?

मौत की गुत्थी पर सीबीआई की जाँच यह तय करेगी कि मौत की वजह क्या थी। सीबीआई यह भी तय करेगी कि यह मामला सुसाइड का ही था या कुछ और। यह भी तय होगा कि अगर सुसाइड का ही मामला है तो आत्महत्या करने के लिए उकसाने का मामला बनता है या नहीं और बनता है तो किनके ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी सुलझे या न सुलझे, लेकिन इस केस की जाँच के ज़रिए वो तमाम किरदार सामने आ सकते हैं जो अभी तक कभी भी बेनकाब नहीं हुए हैं।

आलोक वर्मा

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