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पोंगापंथियों को चुभ रहे ‘नो गॉड, नो रिलीजन, नो गाँधी, नो कांग्रेस एंड नो ब्राह्मण’ का नारा देने वाले पेरियार

समाज के वंचित तबक़े के संघर्षों के प्रतीक महापुरुषों के ख़िलाफ़ व्यापक घृणा उत्तर भारत से चलकर दक्षिण भारत में पहुँच चुकी है। तमिलनाडु के कोयंबटूर में इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ (ईवीआर) की प्रतिमा को विरूपित करने की कवायद इसकी एक कड़ी है। भले ही तमिनलाडु की राजनीति पर ईवीआर के विचारों के समर्थकों का कब्जा है लेकिन वह दक्षिण भारत में वर्ण व्यवस्था और जातीय श्रेष्ठता को मानने वालों के निशाने पर लगातार रहे हैं। हाल के वर्षों में पेरियार की प्रतिमाओं को तोड़ने, उन्हें विरूपित करने की घटनाएँ कई बार हो चुकी हैं, जिसमें बीजेपी से जुड़े एक स्थानीय नेता की गिरफ्तारी भी हुई थी।

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नायकर के ख़िलाफ़ सवर्णों की घृणा को समझने के लिए हमें स्वतंत्रता के पहले के द्रविड़ राजनीति और नायकर के इतिहास पर नज़र डालनी होगी। पेरियार का अर्थ होता है महान व्यक्ति। नायकर को ईवीआर के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म 17 सितंबर 1879 में हुआ। 1919 के सत्याग्रह के बाद वह महात्मा गाँधी और कांग्रेस के उत्साही समर्थक के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। वह 1920 में तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। वह मद्रास के आसपास गाँधी के असहयोग आंदोलन के सबसे बड़े नेता बन गए और नवंबर 1921 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। कुछ महीने बाद छूटने पर वह गाँधी के आंदोलनों में सक्रियता से लगे रहे। उन्होंने खादी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। 

1924 की सर्दियों में उन्होंने मंदिरों के शहर त्रावणकोर में वायकोम सत्याग्रह चलाया जो अछूत एझवा जाति को मंदिर में प्रवेश दिलाने को लेकर था। उस समय कांग्रेस व गाँधी के सुधार आंदोलन में अछूतों का मंदिर में प्रवेश एक महत्त्वपूर्ण विषय था। गाँधी ने छुआछूत को पाप बताया और 1920 के बाद कांग्रेस ने छुआछूत की औपचारिक रूप से आलोचना की और इसे हिंदू धर्म का कलंक बताया।

कांग्रेस के 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में टी के माधवन ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें मंदिर में प्रवेश को सभी हिंदुओं का अधिकार बताया गया।

गाँधी वायकोम सत्याग्रह पर नज़र रख रहे थे और उन्होंने सत्याग्रह का प्रभार सीरिया के एक ईसाई के संभालने पर हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वायकोम सत्याग्रह इसाइयों की चिंता का विषय नहीं है और हिंदुओं को यह काम करना चाहिए। छुआछूत को लेकर गाँधी ने अपना रुख़ साफ़ कर दिया, जिसमें संकेत था- अछूतों को हिंदुओं के तहत लाया जाना है। 1921 में स्थानीय जमींदारों व ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मोपला मुसलमानों द्वारा किए गए मोपला विद्रोह के झटके के बाद कांग्रेस को वायकोम सत्याग्रह से दक्षिण में बहुत सहारा मिला।

ईवीआर वायकोम सत्याग्रह के हीरो

ईवीआर वायकोम सत्याग्रह के हीरो थे। ईवीआर ने पाया कि कांग्रेस का मुख्य मक़सद हिंदू धर्म में क्रमबद्ध रूप से सुधार करना है, और कांग्रेस और गाँधी के मक़सद में सामाजिक सुधार की संभावना काफ़ी कम है। उन्होंने वायकोम सत्याग्रह के बाद गाँधी और कांग्रेस के साथ तमाम मसले उठाए और मद्रास के नज़दीक कांग्रेस के गुरुकुलम में ब्राह्मण व ग़ैर ब्राह्मण विद्यार्थियों के अलग खाने का विरोध किया। इस विवाद के बाद ईवीआर ने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का समर्थन किया। उसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया स्पिनर्स एसोसिएशन की तमिलनाडु इकाई में ग़ैर ब्राह्मण प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कवायद की लेकिन पार्टी का समर्थन दिलाने में असफल रहे। इस बार भी उन्हें ब्राह्मण नेताओं से टकराना पड़ा जिन्होंने गुरुकुल में खाने के मसले पर ईवीआर के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा था।

आख़िरकार 1925 में ईवीआर ने कांग्रेस छोड़ने का फ़ैसला किया। उसके बाद उन्होंने अपना राजनीतिक एजेंडा घोषित किया, ‘नो गॉड, नो रिलीजन, नो गाँधी, नो कांग्रेस एंड नो ब्राह्मण।’ 1925 दक्षिण की राजनीति में बदलाव का साल रहा।

1926 में ईवीआर ने सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट शुरू किया। उस समय शुरुआत में जस्टिस पार्टी को ग़ैर ब्राह्मण आंदोलन की भूमिका बनाने वाला माना जाता है जो आनुपातिक प्रतिनिधित्व की समर्थक थी, वहीं सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट में जाति ख़त्म करने, विवाह व अन्य क्रियाकलापों के नए तरीक़े पर ज़ोर था। इस आंदोलन के दौरान ब्राह्मणवाद की आलोचना हुई और पुजारियों पर हमले हुए। अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया गया। पेरियार ने नास्तिकता की वकालत की और इसे पूरी दुनिया का एकमात्र तार्किक विचार बताया। ईवीआर के समर्थकों ने मनुस्मृति की प्रतियाँ जलाईं, मंदिरों पर हमले किए और पुजारियों व मूर्तियों को जूतों से पीटा। उन्होंने कुदी अरासू अख़बार माध्यम से ब्राह्मणवाद और कांग्रेस पर हमला बोला, वहीं ब्राह्मण मुख्यधारा के अख़बार द हिंदू का इस्तेमाल करते थे।

जातिवाद पर गाँधी और पेरियार

1927 में गाँधी ने मद्रास में दिए एक भाषण में चार वर्णों की व्यवस्था को श्रेष्ठ क़रार दिया और कहा कि जाति में कोई ऊँच या नीच का दर्जा नहीं है। उन्होंने अंतरजातीय विवाह के प्रतिबंध और अलग-अलग खाने को आदर्श व्यवस्था बताया। उसके बाद ईवीआर ने तिनेवेल्ली में एक सार्वजनिक सभा में कहा कि अगर दलित गाँधी की सलाह का पालन करते हैं तो उनकी ज़िंदगी ब्राह्मणों की सेवा में ही ख़त्म हो जाएगी। सितंबर 1927 में ईवीआर ने गाँधी से मुलाक़ात की लेकिन कोई मतभेद दूर नहीं किया जा सका। ईवीआर ने गाँधी से कह दिया कि भारत को असली स्वतंत्रता तभी मिल सकती है जब कांग्रेस, हिंदूवाद और ब्राह्मणवाद ख़त्म होंगे। (कास्ट्स ऑफ माइंड, कोलोनियलिज्म ऐंड द मेकिंग ऑफ़ माडर्न इंडिया, लेखक-निकोलस बी. डिर्क्स, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2001,  पेज 260)

1930 आते-आते सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट के माध्यम से सभी धर्मों की कुरीतियों व उच्च जातियों के दुष्प्रचारों का व्यापक विरोध होने लगा। ईवीआर ने ब्राह्मण प्रभुत्व का विरोध बहुत तेज़ किया।

(कास्ट्स ऑफ़ माइंड, कोलोनियलिज्म ऐंड द मेकिंग ऑफ़ माडर्न इंडिया, लेखक-निकोलस बी. डिर्क्स, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2001, पेज 263)

विचार से ख़ास

नायकर ने कांग्रेस के हिंदी अभियान का भी विरोध किया और इसे आर्यों का षड्यंत्र करार दिया और अलग तमिलनाडु बनाने की वकालत की। उन्होंने स्वायत्त द्रविडनाडु के गठन की माँग की। 1944 में ईवीआर ने द्रविड़ दल ‘द्रविड कषगम’ की स्थापना की जिसका मक़सद ग़ैर ब्राह्मण या द्विड़ देश की स्थापना था। 1944 में जब आंबेडकर ईवीआर से संयुक्त पहल करने के मसले पर मिले तो उन्होंने कहा कि पूरे देश की समस्या एक है और पूरे भारत पर द्रविड़िस्तान की अवधारणा लागू की जानी चाहिए।

1948 में गाँधी की हत्या पर ईवीआर ने एक अनोखा शोक संदेश लिखते हुए हत्या की आलोचना की और कहा कि गोडसे कोई अलग गुंडा या पागल नहीं है बल्कि गाँधी ने जिस हिंदू राष्ट्रवाद की खेती की है, उसी की फ़सल है और यह खेती पूरे देश में फैल चुकी है।

स्वतंत्रता के बाद ईवीआर को विपक्ष मिला। उनकी कड़ी आलोचनात्मक भाषा ने उन्हें विरोधी चरित्र का बना दिया था। इस बीच पेरियार और सीएन अन्नादुरै के बीच मतभेद हुए और पार्टी टूट गई। अन्नादुरै ने द्रविण मुनेत्र कषगम (डीएमके) की स्थापना की और 1956 में राजनीति में आई। हिंदी के ख़िलाफ़ आंदोलन ने डीएमके को ताक़त दी और 1967 में डीएमके ने राज्य से कांग्रेस का सफाया कर दिया। अन्नादुरै पहले मुख्यमंत्री बने और 1967 में ही उनकी मृत्यु के बाद एम करुणानिधि मुख्यमंत्री हुए।

ईवीआर ने अंतिम राजनीतिक लड़ाई सत्तासीन द्रविड़ मुनेत्र कषगम के साथ मिलकर लड़ी। 1970 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने एक क़ानून पर हस्ताक्षर किया जिसमें खानदानी रूप से पुजारियों की नियुक्ति पर रोक लगा दी गई और सभी जातियों के पुजारी बनने की राह खुल गई। करुणानिधि के नेतृत्व को 1969 में एमजी रामचंद्रन ने चुनौती दी और 1972 में डीएमके का विभाजन हुआ व एमजीआर ने ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) बना ली। ईवीआर की मृत्यु 24 दिसंबर 1973 को हुई।

तमिलनाडु में तमाम दल हैं। लेकिन संसदीय राजनीति कर रहे ज़्यादातर दल ईवीआर के सिद्धांतों पर ही चलने वाले हैं और अब तक तमिलनाडु की राजनीति में उनकी धमक है। नायकर स्वतंत्रता के पहले से लेकर अब तक द्रविड़ राजनीति पर इस कदर छाए रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ जाकर किसी दल के लिए राजनीति संभव नहीं होती। तमिलनाडु के सामाजिक व राजनीतिक स्थिति पर उनका इतना गहरा असर है कि कम्युनिस्ट से लेकर दलित आंदोलन, तमिल राष्ट्रभक्त से लेकर तर्कवादी और नारीवादी सभी उनका सम्मान करते हैं। हाल में उनकी प्रतिमा पर केसरिया रंग फेंकने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ट्वीट कर कहा कि घृणा चाहे जितनी हो, उस महान व्यक्ति का नुक़सान नहीं कर सकती।

उनकी प्रतिमा को बार-बार विरूपित करने की घटना केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार बनने के बाद वर्ण व्यवस्था में भरोसा रखकर ख़ुद को जातीय आधार पर उच्च दिखाने वालों के हौसलों को दिखाता है।

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प्रीति सिंह

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