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सुरेश रैना। फ़ोटो साभार: ट्विटर/सोनू सूद

युवराज की ही तरह टीम इंडिया के प्रिंस साबित हुए सुरेश रैना

आरपी सिंह कहते हैं कि रैना को यह पता था कि किसी गेंदबाज़ से कैसे फ़ायदा लेना है। उसको किस तरीक़े से प्रोत्साहित किया जाए। रैना को वहाँ बहुत मौक़े नहीं मिले। लेकिन, 2016 सीज़न में जब रैना गुजरात लॉयंस के लिए खेले तो उनकी कप्तानी ने ब्रैंडन मैक्कलम को भी अपना मुरीद बनाया। युवराज की ही तरह रैना भी भारतीय क्रिकेट में प्रिंस की ही भूमिका में रहे।
विमल कुमार

भारतीय क्रिकेट सुरेश रैना का आकलन कैसे करेगा? गिलास आधा भरा हुआ या फिर गिलास आधा खाली? यह आपकी सोच और आपके नज़रिए पर निर्भर करेगा। उत्तर प्रदेश के ही रुद्र प्रताप सिंह जिन्होंने 9वीं कक्षा के साथ ही रैना के साथ खेलना शुरू किया, उनके अचानक संन्यास लेने की बात से हैरान हैं। आरपी का कहना है कि उन्हें हैरानी नहीं होगी अगर रैना आईपीएल ख़त्म होने के बाद दोबारा अपने फ़ैसले पर ग़ौर करें। आख़िर कुछ हफ्ते पहले ही रैना ने एक और साथी खिलाड़ी इरफ़ान पठान से बातचीत में कहा था कि वह टेस्ट क्रिकेट में वापसी का माद्दा रखते हैं। ऐसे में अचानक ऐसा फ़ैसला क्यों लिया?

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सबसे बड़ी वजह रही मौजूदा कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री का उनकी काबिलियत पर से भरोसा उठ जाना। 2019 वर्ल्ड कप से पहले भारतीय चयनकर्ताओं ने विजय शंकर, रिषभ पंत, दिनेश कार्तिक से लेकर अंजिक्या रहाणे और उन तमाम खिलाड़ियों को मौक़ा दिया जिनमें से कुछ हक़दार नहीं भी थे, लेकिन रैना का नंबर कभी नहीं आया। इस बात से रैना को काफ़ी ठेस लगी। लेकिन, चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट की दलील यह रही कि पिछले कुछ सालों में रैना ने घरेलू क्रिकेट में कुछ ख़ास ही नहीं किया तो उन्हें क्यों बुलाया जाता। और तो और पिछले दो सीज़न में वो आईपीएल में भी अपनी असाधारण साख के साथ न्याय करते नहीं दिखे।

बहरहाल, युवराज सिंह की ही तरह रैना को अंडर 19 के समय से एक बेजोड़ प्रतिभा के तौर पर देखा गया। युवराज ने वन-डे क्रिकेट में धाकड़ शुरुआत की लेकिन रैना को कुछ वक़्त इंतज़ार करना पड़ा। फरीदाबाद में जैसे ही इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 2006 में उन्होंने एक शानदार पारी खेली तो इंग्लैंड के पूर्व कप्तान ग्राहम गूच ने रैना में भविष्य के तेंदुलकर की झलक देख ली। 

ख़ुद रैना और उस दौर का हर बायें हाथ का बल्लेबाज़ तेंदुलकर की बजाए युवराज बनना चाहते थे। रैना का जब वन-डे करियर ख़त्म हुआ तो उनके आँकड़े अपने आदर्श युवी के आस-पास ही थे जिस पर उन्हें नाज़ हो सकता है।

युवी ने भले ही 8 हज़ार से ज़्यादा रन बनाये लेकिन रैना के 10 शतक और 5615 रन उन्हें वन-डे क्रिकेट का महान खिलाड़ी बनाने के लिए काफ़ी हैं। औसत क़रीब 35 का, स्ट्राइक रेट लगभग 94 का। युवी का औसत उनसे सिर्फ़ थोड़ा बेहतर यानी 36 का रहा तो स्ट्राइक रेट युवराज से काफ़ी बेहतर जो 87 का था। अंतर सिर्फ़ इतना है कि जहाँ युवराज के योगदान को सुपरस्टार के तौर पर देखा जाता है जिसने धोनी को टी-20 वर्ल्ड कप जिताया। पर 2011 वर्ल्ड कप तो रैना की निर्णायक लम्हों में हमेशा सहयोगी पारी खेलने के लिए याद की जायेगी। लेकिन, अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फ़िल्मों में आप उनके साथी अभिनेता विनोद खन्ना, शशि कपूर या फिर ऋषि कपूर को भूल जाते हैं क्या? 2011 वर्ल्ड कप से ठीक पहले रैना जूझ रहे थे लेकिन धोनी ने उन पर भरोसा बनाए रखा। वर्ल्ड कप के शुरुआती मैचों में यूसुफ़ पठान को तवव्जो मिली रैना की जगह। लेकिन, जब अति-अहम क्वार्टर फ़ाइनल (ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़) और सेमीफ़ाइनल (पाकिस्तान के ख़िलाफ़) मुक़ाबले हुए तो रैना ने साबित किया कि आख़िर क्यों धोनी उन्हें इतना पसंद करते हैं।

महेंद्र सिंह धोनी के साथ सुरेश रैना। फ़ोटो साभार: फ़ेसबुक/सुरेश रैना

अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि युवराज की तरह रैना भी टेस्ट क्रिकेट में अपनी प्रतिभा को प्रदर्शन में नहीं बदल पाये। अगर युवराज ने 40 टेस्ट खेले और सिर्फ़ 3 शतक लगाये तो रैना सिर्फ़ 18 टेस्ट ही खेल पाये और पहले ही मैच में शतक लगाने के बाद इस कमाल को दोहरा नहीं पाये। और शायद यही वजह है कि आर पी सिंह ने मुझे बताया कि रैना 35 फ़ीसदी और ज़्यादा कामयाबी हासिल कर सकते थे।

लेकिन, आरपी ने रैना के बारे में एक और ख़ूबसूरत बात बतायी जिस पर क्रिकेट जानकार कभी ध्यान नहीं देते हैं और ना देंगे। रैना की लीडरशीप।

रैना ने अंडर-19 के दिनों से अपनी कप्तानी से हर किसी को प्रभावित किया। कितने लोगों को पता है कि विराट कोहली और आर अश्विन ने अपने टी-20 करियर की शुरुआत रैना की कप्तानी में की थी? आरपी कहते हैं कि रैना ने उन्हें जूनियर क्रिकेट में बताया कि अगर वो शुरू में 2 विकेट लेते हैं तो उनके 5 विकेट की ज़िम्मेदारी वो लेंगे। मतलब यह था कि निचले क्रम के बल्लेबाज़ जब आयेंगे तो आरपी को दोबारा बुलाया जायेगा और उनके 5 विकेट पूरे हो जायेंगे।

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यह कि रैना को यह पता था कि किसी गेंदबाज़ से कैसे फ़ायदा लेना है। उसको किस तरीक़े से प्रोत्साहित किया जाए। भारत के लिए धोनी के अलावा कप्तानी का विकल्प कोई और नहीं था। कभी धोनी ने आराम किया तो कभी वीरेंद्र सहवाग तो कभी गौतम गंभीर और फिर विराट कोहली को मौक़े मिले। रैना को वहाँ बहुत मौक़े नहीं मिले। चेन्नई सुपर किंग्स के साथ तो मुमकिन ही नहीं था। लेकिन, 2016 सीज़न में जब रैना गुजरात लॉयंस के लिए खेले तो उनकी कप्तानी ने ब्रैंडन मैक्कलम को भी अपना मुरीद बनाया।

बहरहाल, युवराज की ही तरह रैना भी भारतीय क्रिकेट में प्रिंस की ही भूमिका में रहे। या यूँ कहें कि धोनी के बेहद कामयाब सेनापति। और यह उपलब्धि थोड़े ही कम है।

विमल कुमार

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