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अमित शाह कुछ कहें, पाकिस्तान में मुसलमान भी हैं धार्मिक उत्पीड़न के शिकार

गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन विधेयक के पीछे मुख्य तर्क यह दिया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में चूंकि मुसलमान बहुसंख्यक हैं, लिहाज़ा मुसलमानों के धार्मिक उत्पीड़न का कोई सवाल ही नहीं उठता है, इसलिए इस विधेयक में मुसलमानों को नागरिकता देने का प्रावधान नहीं है। हालाँकि उन्होंने नाम बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान का भी लिया है, पर उनका ज़ोर तो पाकिस्तान पर ही है।
उनके कहने का मूल आशय यह है कि पाकिस्तान में मुसलमानों के साथ धार्मिक वजहों से भेदभाव नहीं किया जाता है। क्या यह सच है? थोड़ी सी पड़ताल करने से यह बहुत ही साफ़ हो जाता है कि पाकिस्तान में शिया, अहमदिया और इसमाइली समुदायों के मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न मुल्क बनने के साथ ही शुरू हो गया था जो आज भी बदस्तूर जारी है। उनके निशाने पर भारत से गए मुसलमान शरणार्थी भी रहे हैं, जिन्हें मुहाज़िर कहा जाता है और जिनमें बड़ी तादाद सुन्नी मुसलमानों की है। 

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ज़िया ने बदला पाकिस्तान

पाकिस्तानी राजनीति और सामाजिक ताना-बाना में बड़ी गड़बड़ी जनरल ज़िया-उल-हक़ के शासनकाल में शुरू हुई, जब उन्होंने अपनी तानाशाही से लोगों का ध्यान बँटाने के लिए धार्मिक आधार पर लोगों को लामबंद करने की कोशिश की।
जनरल ज़िया-उल-हक़ के समय जैसे-जैसे धार्मिक कट्टरता बढ़ी और बहावी इसलाम का रास्ता अपनाया गया, शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ पहले से मौजूद भावना कट्टर और ज़हरीली होती चली गई।

कौन हैं शिया मुसलमान?

पैगंबर मुहम्मद के बाद सुन्नी समुदाय के लोगों का कहना था कि मुहम्मद साहब की जगह उनके मित्र और ससुर अबू बक़र लेंगे, वे ही पहले ख़लीफ़ा बनाए गए। पर दूसरे धड़े यानी शिया मुसलमानों का कहना था कि पैगंबर के बाद उनकी जगह उनके दामाद अली लेंगे। 

शिया-सुन्नी की असली लड़ाई की जड़ यहीं है। शिया अली को जो स्थान देते हैं, वह सुन्नी नहीं देते। मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख़ को शिया पैगंबर के नाती हुसैन की शहादत का जश्न मनाते हैं। शिया और सुन्नी दोनों ही क़ुरान मानते हैं, दोनों ही पैगंबर मुहम्मद को मानते हैं।  

मुहर्रम और शियाओं पर हमले

मुहर्रम के मौक़े पर शिया-सुन्नी विवाद पहले भी होते रहे, पर 1983 में बड़ी वारदात हुई। पहले कराची, उसके बाद लाहौर और बलोचिस्तान के कुछ इलाक़ों में शिया आबादी पर ज़ोरदार हमले हुए। साल 1986 में पाराचिनार के शिया-बहुल बस्तियों पर हमले हुए। गिलगिट में 1988 में शिया मुसलमानों ने बग़ावत की तो पाकिस्तान सरकार ने वहाँ सेना भेज दी।
बड़ी तादाद में स्थानीय शिया मुसलमानों के मारे जाने की ख़बरें तो आईं ही, शिया महिलाओं के साथ बलात्कार तक के आरोप सैनिकों पर लगे। मानवाधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना की, पर ज़्यादा कुछ नहीं हुआ।

तालिबान, अल क़ायदा के राज में

साल 2000 और उसके बाद जब पाकिस्तान में तालिबान और अल-क़ायदा का उदय हुआ, शिया मुसलमानों पर हमले तेज़ हुए। क़्वेटा ही नहीं, गिलगिट, बलटिस्तान, पाराचिनार और चेलास में शियाओं पर हमले हुए। क़्वेटा में 2002 में 12 शिया हज़ारा पुलिस कैडेट मारे गए, 2003 में शियाओं की ज़ुमा मसजिद पर हमले हुए, जिनमें एक दिन में 53 शिया नमाज़ी मारे गए।

क़्वेटा के ही लियाक़त बाज़ार में 2 मार्च 2004 को शियाओं के जुलूस पर हमले हुए, जिनमें 42 लोग मारे गए, 100 से ज़्यादा घायल हो गए। साल 2006 में इस तरह की वारदात में 300 से अधिक लोग मारे गए। कराची में मुहर्रम के समय 28 दिसंबर, 2009 को शियाओं के जुलूस पर हमले हुए, जिनमें 40 लोग मारे गए। 

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में बग़ावत!

साल 2010 के सितंबर महीने में शियाओं पर तीन अलग-अलग हमले हुए। लाहौर में 1 सितंबर को हुए हमले में 35 शिया मुसलमान मारे गए, 160 घायल हुए। 2 सितंबर को मरदन में अहमदिया समुदाय पर हमला हुआ। 3 सितंबर, 2010 को कराची में हुए हमले में 55 शिया मुसलमान मारे गए।  ख़ैबर-पख़्तूनख्वाह के हांगू में शिया मुसलमानों पर मोर्टार हमला हुआ, 9 लोग मारे गए, जिनमें एक बच्चा भी शामिल था। 

साल 2012 में कोहिस्तान में शिया क़त्लेआम हुआ, पंजाब से गिलगिट जा रही बस पर हमला हुआ, जिसमें 18 शिया मुसलमान मारे गए। गिलगिट में ही 16 अगस्त, 2012 को ईद के मौक़े पर शियाओं को निशाना बनाया गया। 

16 फरवरी, 2013 को क़्वेटा में शिया बस्तियों में बम धमाके हुए, जिनमें 90 लोग मारे गए, 180 लोग ज़ख़्मी हो गए। 3 मार्च, 2013 को कराची के अब्बास टाउन में हमले हुए, जिनमें 45 शिया मुसलमान मारे गए।
26 जुलाई, 2013 को खुर्रम ट्राइबल एजेन्सी के पाराचिनार में दो बम धमाके हुए, जिनमें 60 शिया मुसलमान मारे गए और 187 लोग घायल हो गए। इसके बाद भी शियाओं पर हमले होते रहे हैं और इस तरह की वारदात जारी हैं।

अहमदिया मुसलमान नहीं?

पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों पर हमले शुरू से ही होते रहे हैं। वे सुन्नी मुसलमानों के निशाने पर बँटवारे के बाद से ही हैं। 1953 में पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में दंगे हुए, जिनके निशाने पर अहमदिया समुदाय के लोग थे। लाहौर में भीषणतम दंगे हुए। इन दंगों में बड़ी तादाद में अहमदिया मारे गए। 
सुन्नी मुसलमानों के दवाब में आकर जुल्फ़िकार अली भुट्टो ने 1974 में दूसरा संविधान संशोधन विधेयक पारित करवाया, जिसके तहत अहमदिया को ग़ैर-मुसलमान घोषित कर दिया गया। अहमदिया समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा उस साल यानी 1974 में भी हुई। उसमें भी बड़ी तादाद में लोग मारे गए।
लाहौर की अहमदी मसजिद पर 2010 में हमले हुए। लाहौर हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की मून ने कहा :

पाकिस्तान में इस धार्मिक समुदाय के लोगों को धमकियाँ दी गईं, उनके साथ भेदभाव हुआ और उन पर हिंसक हमले हुए। जब तक धार्मिक नफ़रत को रोका नहीं जाता, इस तरह के भेदभाव, हिंसा और हमले होने की आशंका बनी रहेगी। सरकार को चाहिए कि वह पाकिस्तान के हर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की हिफ़ाजत करे ताकि इस तरह की वारदात रोकी जा सके।


बान की मून, पूर्व महासचिव, संयुक्त राष्ट्र

ऑर्डिनेंस 20

जनरल ज़िया-उल-हक़ ने 1984 में एक ऑर्डिनेंस जारी कर आदेश दिया कि अहमदिया समुदाय किसी तरह की ग़ैर-इसलामी गतिविधि न करें। इस अध्यादेश 20 में कहा गया कि अहमदिया ख़ुद को मुसलमान कहना बंद करें, वे सार्वजनिक तौर पर इसलाम का पालन न करें, वे अपने अराधना-स्थल को मसजिद न कहें।
अहमदियों को दूसरे मुसलमानों की मसजिद में घुसने से क़ानूनी तौर पर रोक दिया गया, व्यावहारिक रूप से उन्हें पहले भी मसजिदों में नहीं घुसने दिया जाता था। इसके बाद से सरकारी कामकाज में इन लोगों को क़ादियानी और मिरज़ई कहा जाने लगा।
पाकिस्तान में 2010 से 2014 के बीच अलग-अलग हमलों में 137 अहमदिया मारे गए।

कौन हैं अहमदिया?

अहमदिया ख़ुद को मुसलमान मानते हैं, वे इसलाम की तमाम शिक्षाओं को मानते हैं और वैसा ही आचरण करते हैं। पर वे दूसरे मुसलमानों की तरह पैगंबर मुहम्मद को अंतिम पैंगबर नहीं मानते। भारत में पंजाब के क़ादियान में 1835 में जन्मे मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद को वे अपना  पैगंबर मानते हैं। मिर्ज़ा साहब ने कहा था कि वे इसलाम में सुधार के लिए आए हैं और उन्हें स्वयं ख़ुदा ने भेजा है। हालाँकि अहमदिया समुदाय के लोगों का कहना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने कोई नया पंथ नहीं चलाया, वे तो पैगंबर मुहम्मद के पंथ की शिक्षा देने ही आए थे, पर दूसरे मुसलमान इसे नहीं मानते। उन्हें इस पर आपत्ति है कि मुहम्मद साहब के बाद कोई पैगंबर हो सकता है। 

भारत के बँटवारे के बाद 1947 में ही वे अपना मुख्यालय क़ादियान से पाकिस्तान के रबवाह ले गए। लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों ने 1953 में अहमदिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ आन्दोलन छेड़ दिया और उन्हें ग़ैर-मुसलमान क़रार दिया। 

इसमाइली समुदाय पर हमले

पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के अंदर एक और छोटा समुदाय है इसमाइली मुसलमानों का। ये इसमाइली मुसलमान हमेशा ही सुन्नियों के निशाने पर रहते हैं। बीच-बीच में उन पर हमले होते रहते हैं। सबसे बड़ हमला 2015 में कराची में हुआ था। सफ़ूरा गोट में बस पर हुए हमले में 55 इसमाइली मुसलमान मारे गए थे। 

कौन हैं इसमाइली मुसलमान?

शिया समुदाय का ही एक धड़ा है इसमाइली समुदाय। ये मुख्यधारा के शियाओं की तरह ही सभी धार्मिक बातें मानते हैं, पर वे अपना धर्म गुरु इमाम इसमाइल को मानते हैं। इसमाइल की मौत 765 में हुई। इसमाइली क़ुरान को ईश्वर की कही बात नहीं मानते, वे इसे सांकेतिक मानते हैं। 

इसमाइली मुसलमानों के धर्म गुरु करीम आगा खाँ हैं, जो 49वें इमाम हैं। माना जाता है कि ये पैगंबर मुहम्मेद के वंशज हैं। उनका आगा खाँ फ़ाउंडेशन पूरी दुनिया में दान देने और लोगों की मदद करने के लिए जाना जाता है।
ये तो सिर्फ़ कुछ उदाहरण हैं, जिससे यह साफ़ होता है कि पाकिस्तान में मुसलमान भी धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होते हैं। वहाँ सबसे बड़ी तादाद में सुन्नी मुसलमान हैं। उनके निशाने पर शिया, अहमदिया, इसमाइली भी रहे हैं। लेकिन भारत के गृह मंत्री नहीं मानते कि पाकिस्तान में मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न होता है। उन्होंने संसद में कहा, 'यह कोई नहीं मान सकता कि इन मुसलिम-बहुल देशों में मुसलमानों का धार्मिक उत्पीड़न होता है।' 

प्रमोद मल्लिक

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