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भारत ही नहीं, ब्रिटेन में भी कट्टरपंथी ताक़तें बढ़ रही हैं आगे, चुनाव में वामपंथी हारे

ब्रिटेन के संसदीय में चुनाव कंज़रवेटिव पार्टी की ज़बरदस्त जीत की तुलना भारत में बीजेपी को मिले पूर्ण बहुमत से की जा सकती है। ब्रिटिश चुनाव के नतीजों ने एक बार साफ़ कर दिया कि पूरी दुनिया में अनुदारवादी कट्टरपंथी ताकतें तेज़ी से उभर रही हैं और लिबरल-वामपंथी ताक़तों को जगह-जगह शिकस्त दे रही हैं।
अब तक मिले रुझानों के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स की 650 सीटों में से 363 पर कंजर्वेटिव पार्टी जीत सकती है। यह बहुमत से 75 सीटें अधिक होंगी, यानी, कंजर्वेटिव पार्टी बड़ी आसानी से अपनी सभी बातें मनवा सकेगी। मशहूर और बहुत बड़ी नेता मार्गरेट थैचर के नेतृत्व में 1987 में मिली जीत के बाद कंजर्वेटिव पार्टी की यह दूसरी सबसे बड़ी जीत होगी। दूसरी ओर, लेबर पार्टी को 203 सीटें मिलने का अनुमान है। उसे पहले की तुलना में 60 सीटें कम मिलेंगी। यह 1983 के बाद उनकी सबसे बड़ी हार होगी। 
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अस्तित्व के लिए जूझ रही है लेबर पार्टी?

जेरेमी कोर्बिन के नेतृत्व में चुनाव लड़ने वाली लेबर पार्टी के लिए यह ज़्यादा चिंता की बात इसलिए भी है कि वह अपने गढ़ में भी हारी है। उत्तरी इंगलैंड और मिडलैंड्स जैसे औद्योगिक इलाक़े, जहाँ मध्यम, निम्नवर्गीय समाज और मजदूर वर्ग के लोग अधिक हैं, वहाँ भी कंजर्वेटिव पार्टी ने लेबर पार्टी को हराया है।  
इतनी बड़ी जीत ख़ुद प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन के लिए अप्रत्याशित है। पिछले संसद में उनकी पार्टी को बार-बार हार का सामना करना पड़ा था, एक के बाद एक कई बार सरकारी प्रस्ताव गिर गए थे, यूरोपीय संघ छोड़ने यानी ब्रेग्ज़िट के मुद्दे पर सरकार के तमाम प्रस्ताव बुरी तरह गिरे थे और टेरीज़ा मे ने हार थक कर और कुछ हद तक ऊब कर इस्तीफ़ा दे दिया था। उनका मानना था कि वे ब्रेग्ज़िट से जुड़े प्रस्ताव पारित नहीं करवा पा रही हैं, लोगों ने जनमत संग्रह में जिस ब्रेग्ज़िट के पक्ष में वोट दिया था, उस दिशा में देश को लेकर नहीं चल पा रही हैं, लिहाज़ा उन्हें पद से हट जाना चाहिए। उनकी जगह वह आदमी आए जो यह काम करवा सके।
बोरिस जॉन्सन प्रधानमंत्री बने तो उन्हें कांटों से भरा ताज ही मिला था। लेबर तो दूर की बात है, ख़ुद उनकी अपनी पार्टी के लोग उनसे सहयोग नहीं कर रहे थे। वे यूरोपीय संघ के नेताओं से ब्रसेल्स में मिल कर बात तो कर आए, पर उनके प्रस्तावों को उनके संसद में ही मंज़ूरी नहीं मिली।

बड़ा दाँव खेला था जॉन्सन ने

जॉन्सन ने क्वीन विक्टोरिया से मिल कर हाउस ऑफ़ कॉमन्स भंग करने और नए चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। कहां तो यह अनुमान लगाया जा रहा था कि उन्होंने ख़तरनाक जुआ खेला है और अब उन्हें पद से हटना होगा, कहाँ उन्हें इतनी बड़ी जीत मिली है कि वह अब बड़ी आसानी से देश को लेकर यूरोपीय संघ से बाहर निकल सकते हैं। 
चुनाव नतीजों पर वाणिज्य जगत की खुशी का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि ज्यों ही नतीजे आने शुरू हुए और लगा कि कंजर्वेटिव पार्टी जीत रही है, ब्रिटिश करंसी पौंड की कीमत तेज़ी से उछली।

ब्रेग्ज़िट के पक्ष में जनादेश

चुनाव नतीजों से साफ़ है कि ब्रिटिश मतदाताओं का बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में है। चुनाव के पहले ही लेबर पार्टी ने कहा था कि वह जीती तो यूरोपीय संघ छोड़ने के मुद्दे पर एक बार फिर जनमत संग्रह करवाएगी, यानी पहले का जनमत संग्रह बेकार जाएगा। पर चुनाव नतीजों से साफ़ हो गया कि लोगों ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने का रास्ता तो चुना ही, संसद में राजनीतिक स्थिरता ला दी है और सत्ता का समीकरण इस तरह बदल दिया है कि सरकार ब्रेग्ज़िट से जुड़े फ़ैसले आसानी से ले। 
लेकिन जब वोट शेयर की ओर देखते हैं तो लगता है कि कंजर्वेटिव पार्टी को मतदाताओं ने संकेत दिया है ब्रेग्ज़िट के मुद्दे पर ब्रिटेन अभी भी बँटा हुआ है और नतीजे को एकतरफा न माना जाए। कंजर्वेटिव पार्टी को महज 43 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो आधे से काफ़ी कम है, यानी देश की आधी से अधिक जनता ने उसे वोट नहीं दिया है।

स्कॉटलैंड की आज़ादी पर मुहर?

चुनाव के नतीजों ने यूरोपीय संघ छोड़ने के मुद्दे पर ही नहीं, स्कॉटलैंड के अलग होने के मुद्दे पर भी गंभीर चेतावनी दी है। स्कॉटिश नेशनल पार्टी को स्कॉटलैंड की 59 में से 49 सीटों पर जीत हासिल हो सकती है। बता दें कि स्कॉटलैंड ब्रिटेन में रहते हुए भी स्वायत्त है, वह ब्रिटेन से आज़ाद होना चाहता है और इसके लिए जनमत संग्रह की माँग पर अड़ा हुआ है। वह यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में है। एसएनपी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जॉन्सन और कंजर्वेटिव पार्टी का ज़ोरदार विरोध किया और ज़ोर दिया कि वह यूरोपीय संघ छोड़ने के ख़िलाफ़ है। सवाल यह है कि क्या नई सरकार स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह कराने पर राजी होगी? 
मजदूरों के इलाक़े मिडलैंड्स में कंजर्वेटिव पार्टी की जीत के दूसरे संकेत भी हैं। यहाँ के मतदाता यह चाहेंगे कि सरकार मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करे, घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दे और आयात को रोकने की कोशिश करे। पर यह तो यूरोपीय संघ की मूल अवधारणा के ही ख़िलाफ़ है।  

कब होगा ब्रेग्ज़िट?

भारतीय मूल की नेता और मौजूदा गृह मंत्री प्रीति पटेल ने कहा है कि नई सरकार क्रिसमस के पहले ही ब्रेग्ज़िट से जुड़ी तैयारियाँ पूरी कर लेगी। यूरोपीय संघ से जो बातचीत हुई है, उसके मुताबिक ब्रिटेन को 31 जनवरी तक का समय मिला हुआ है। 
यह चुनाव इस मामले में भी अलग है कि इसमें ब्रिटेन किसी मुद्दे पर एक साथ खड़ा है और उसने उस पर स्पष्ट जनादेश दिया है। यूरोपीय संघ छोड़ने के मुद्दे पर 2016 में हुए जनमत संग्रह में ब्रेग्ज़िट यानी संघ छोड़ने के पक्ष में 52 प्रतिशत वोट पड़े थे, यानी बहुमत से थोड़ा ही ज़्यादा, 2017 में हुए चुनाव के नतीजे कंजर्वेटिव पार्टी के पक्ष में थे, पर उसे थोड़े से अंतर से ही बहुमत मिला था। सरकार ब्रेग्ज़िट के मुद्दे पर संसद में बार-बार पीछे हट रही थी।  
बोरिस जॉन्सन की अगुआई में मिली इस जीत ने ब्रेग्ज़िट पर बहस पर पूर्ण विराम लगा दिया। जो लोग इस उम्मीद में थे कि एक बार फिर जनमत संग्रह होगा और पहले का फ़ैसला पलट दिया जाएगा, उन्हें घनघोर निराशा होगी। अब ऐसा नहीं होने जा रहा है।

बदलना होगा लेबर पार्टी को?

लेबर पार्टी को अपनी रणनीति पर एक बार फिर विचार करना होगा। पूरे चुनाव प्रचार में वह यूरोपीय संघ छोड़ने के मुद्दे पर ही उलझी रही। वह स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने जैसे अपने पुराने और प्रिय मुद्दे पर अधिक ध्यान नहीं दे सकी। पार्टी के नेता जॉन मैक्डॉनल ने इसे मानते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि पार्टी ब्रेग्ज़िट पर ही उलझी रही और इस पर भी वह हमेशा रक्षात्मक रवैया ही अपनाती रही। पार्टी ने कहा था कि वह इस मुद्दे पर फिर से विचार करेगी और अपनी अलग नीति बनाएगी। 
लेबर पार्टी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर भी बहुत मुखर नहीं हो पाई, धनी वर्ग के लोगों पर अधिक कर लगाने की उसकी योजना भी धरी ही रह गई। 
बोरिस जॉन्सन को सबसे पहले अपनी पार्टी के सभी लोगों को लेकर बैठना होगा और यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के लिए अधिकतम फ़ायदा खोजना होगा। ब्रिटेन को 31 जनवरी, 2020 तक यूरोपीय संघ छोड़ देना है। इसमें ब्रिटेन को कितना क्या मिलेगा, यह तो अब देखने को मिलेगा।
प्रमोद मल्लिक

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