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दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफ़ा बनना चाहते हैं तुर्की के राष्ट्रपति अर्दवान?

अमेरिका के बढ़ते प्रभाव, मुसलिम बहुल देशों पर उसका दबदबा, उन देशों में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी और पश्चिमी प्रभावों ने मुसलमानों के मन में एक तरह की अनश्चितता को बढ़ावा दिया। आतंकवाद को कुचलने के नाम पर जो ज़्यादतियाँ की गईं, उससे मुसलमानों के मन की बेचैनी बढ़ती गई। इसका नतीजा यह हुआ कि इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर खलीफ़ा की अवधारणा को स्थापित करने की कोशिशें हुईं। 

प्रमोद मल्लिक

तुर्की के राष्ट्रपति रचप तैयप अर्दवान ख़ुद को पूरी दुनिया के मुसलमानों के ख़लीफ़ा के रूप में स्थापित करना चाहते हैं ताकि दुनिया भर के मुसलमानों पर उनका ही सिक्का चले और मुसलमानों के सामाजिक-धार्मिक मामलों में उनकी ओर से जारी निर्देश या मार्गदर्शन को पूरी दुनिया के मुसलमान मानें। उनकी रणनीति है मुसलिम बहुल देशों का एक संगठन यानी कॉनफ़ेडरेट बनाना, जिसके वह सर्वेसर्वा हों। इस कॉनफ़ेडरेट की राजधानी या मुख्यालय तुर्की का शहर इस्तांबुल हो। बीते सौ सालों में मुसलमानों के बीच ख़िलाफ़त की स्थापना की यह तीसरी कोशिश है।

ख़िलाफ़त की स्थापना

'द हिन्दू' में छपे एक लेख के अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति ने अपने सलाहकार अदनान तनिर्वदी को इस काम में लगाया था। हालाँकि वह हाल में ही राष्ट्रपति के सलाहकार के पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं। उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह अभी साफ़ नहीं है, लेकिन वह पिछले काफ़ी समय से अर्दवान के ख़लीफ़ा बनने की आकांक्षा को परवान चढ़ाने में लगे थे। उन्होंने और उनके आसपास के लोगों ने गुपचुप यह बात फैलानी शुरू कर दी थी कि अर्दवान ही मुसलमानों के अगले खलीफ़ा हैं और वह ख़िलाफ़त की स्थापना करेंगे। 
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मुसलिम देशों का कॉनफ़ेडरेट

इसी सिलसिले में नवंबर, 2017 में मुसलिम बहुल 61 देशों का एक सम्मेलन इस्ताम्बुल में बुलाया भी गया था। इसमें एक राजनीतिक समूह 'एसरिका' यानी एशिया-अफ्रीका का गठन का प्रस्ताव रखा गया। परिकल्पना यह है कि एसरिका के देश अपनी-अपनी सीमा में अपने-अपने ढंग से रहें, लेकिन वह शरीआ को मान कर चलें और अपने देश में शरीआ स्थापित करें।
एसरिका का एक राष्ट्रपति होगा, जो कुरान और सुन्नत के प्रति वफ़ादार रहेगा और वह पूरी दुनिया में इसलामिक एकता कायम करेगा। एसरिका के सारे देश राष्ट्रपति को मानेंगे और उसके कहे मुताबिक़ काम करेंगे।

लेकिन वे अपने देश में सार्वभौम होंगे और उसमें एसरिका का राष्ट्रपति कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। एसरिका का राष्ट्रपति एक सलाहकार मंडल या कार्यकारी परिषद की मदद से काम करेगा।

अया सोफ़िया

माना जा रहा है कि अया सोफ़िया (जिसे कुछ लोग ग़लती से हागिया सोफ़िया भी लिखते हैं।) संग्रहालय को मसजिद में तब्दील करना अर्दवान को ख़लीफ़ा बनाने की मुहिम का ही हिस्सा है। समझा जाता है कि अर्दवान ने इस संग्रहालय को मसजिद में बदलने का काम बहुत ही सोच समझ कर किया और उसके पीछे सोच मुसलमानों को यह संदेश देने की थी कि उनका अतीत का गौरव वापस लाया जा रहा है और अतीत की 'ग़लतियों' को ठीक किया जा रहा है।
दरअसल अया सोफ़िया पहले गिरजाघर था, जिसे एक लड़ाई में जीत के बाद मुसलमानों ने मसजिद में बदल दिया था। लेकिन जब दौलत-ए-उसमानिया यानी उसमानिया साम्राज्य यानी तुर्की-अंग्रेजी उच्चारण में ओटोमन साम्राज्य का विघटन हुआ और कमाल अता तुर्क की अगुआई में तुर्की एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना तो उस मसजिद को संग्रहालय बना दिया गया।

तुर्की में बढ़ता इसलामी मूल्य

बीते 20 साल में तुर्की में बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव हुए, इसलाम का दबदबा बढ़ा। जिस हेडगेयर यानी महिलाओं के सिर ढकने के कपड़े को अतातुर्क ने प्रतिबंधित कर दिया था, अर्दवान ने उसकी वापसी की। अभी भी तुर्की में ज़्यादातर महिलाएं इस हेडगेयर का इस्तेमाल नहीं करती हैं, पर तुर्की समाज में इसलामी मूल्य बढ़ रहे हैं।
ऐसे में अर्दवान ने इस बदलते समाज के कंधे पर चढ़ कर ख़ुद को मुसलमानों के नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। यही वजह है कि उन्होंने इस संग्रहालय को मसजिद में बदलने का फ़ैसला किया। इसके लिए बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें मुसलिम देशों के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था।

अर्दवान की चाल

लेकिन अया सोफ़िया का मसजिद बनना सिर्फ सांकेतिक है। अर्दवान का मक़सद खुद को ख़लीफ़ा की तरह पेश करना है। वह ओटोमन यानी उस्मानिया साम्राज्य के गौरव को फिर से हासिल करना चाहते हैं। इस मामले में वे बहुत कुछ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरह हैं, जो सोवियत संघ के पुराने गौरव को हासिल करना चाहते हैं।
अर्दोवान का मक़सद बड़ा है, वह इसलामी ख़िलाफ़त की स्थापना करना चाहते हैं। ख़िलाफ़त यानी इसलामिक क़ानून यानी शरीआ से चलने वाला राज्य।

खलीफ़ा

दरअसल मुसलिम इतिहास में ख़लीफ़ा पद की अवधारणा नई नही है, यह शुरू से ही चली आ रही है। ख़लीफ़ा दरअसल धर्मगुरु तो होता ही है, उसके पास राजनीतिक ताक़त भी होती है। वह सभी मुसलमानों का प्रमुख होता है। दुनिया के सारे मुसलमान अपनी स्थितियों के मुताबिक अपना काम करते रहें, अपनी राजनीतिक स्थिति को देखते रहें, पर खलीफ़ा को सर्वोपरि मान लें और शरीआ के नियमों के मुताबिक़ काम करें, इतना ही काफ़ी होता है।  

ख़िलाफ़त की पहली कोशिश

उन्नीसवीं सदी के अंत में तुर्की के उस्मानिया साम्राज्य के सुलतान अब्दुल हमीद द्वितीय ने अपने साम्राज्य को टुकड़े-टुकड़े होने से बचाने के लिए ख़िलाफ़त की बात की। उनका मक़सद लोकतांत्रिक आन्दोलन को कुचल कर अपनी सत्ता बनाए रखना था, पर उन्होंने इसके लिए धार्मिक कारण चुना। उन्होंने ख़िलाफ़त को बचाए रखने की अपील मुसलमानों से की। इसकी गूंज भारत में भी सुनाई पड़ी। 
ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़े लिखे पत्रकार मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने भारत में इसे मुसलमानों की अस्मिता से जोड़ा। उन्होंने अपने भाई मौलाना शौकत अली के साथ मिल कर ऑल इंडिया ख़िलाफ़त कमिटी की स्थापना की। बाद में हसरत मोहानी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और हक़ीम अज़मल ख़ान जैसे नेता भी इससे जुड़े। महात्मा गांधी ने इसे हिन्दू-मुसलमान एकता को स्थापित करने के लिए एक सुनहरा मौका माना और इसे भरपूर समर्थन दिया।
ख़ैर, तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने 1920 में ओटोमन साम्राज्य को उखाड़ फेंका और एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की। ख़िलाफ़त आन्दोलन इसके साथ ही ख़त्म हो गया। खलीफा व्यवस्था को बनाए रखने की  दिशा में यह पहला प्रयास था, जो नाकाम रहा। 

ख़िलाफ़त की दूसरी कोशिश

समझा जाता है कि अमेरिका के बढ़ते प्रभाव, मुसलिम बहुल देशों पर उसका दबदबा, उन देशों में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी और पश्चिमी प्रभावों ने मुसलमानों के मन में एक तरह की अनश्चितता को बढ़ावा दिया। आतंकवाद को कुचलने के नाम पर जो ज़्यादतियाँ की गईं, उससे मुसलमानों के मन की बेचैनी बढ़ती गई। इसका नतीजा यह हुआ कि इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर खलीफ़ा की अवधारणा को स्थापित करने की कोशिशें हुईं। 

सीरिया और ईराक़ में इसलामिक स्टेट ऑफ़ सीरिया एंड लेवांत (आईएसआईएल) की स्थापना इसका ही नतीजा था। इसके प्रमुख अबू बक़र अल बग़दादी ने सीरिया और इराक़ के बड़े हिस्से पर कब्जा करने के बाद ख़िलाफ़त का एलान कर दिया और ख़ुद की खली़फ़ा घोषित कर दिया।
इसलामिक स्टेट का भी मूल मक़सद शरीअत से चलने वाले राज्य और ख़िलाफ़त की स्थापना करना ही था। लेकिन शुरू से ही उसके साथ दिक्क़त यह थी कि वह इसलाम के बहुत ही संकीर्ण और कट्टरपंथी व्याख्या पर आधारित था, जो खुद मुसलमानों को स्वीकार नहीं था। यह कोशिश भी नाकाम रही।

ख़िलाफ़त की तीसरी कोशिश

अर्दवान इस कोशिश को आगे बढ़ाना चाहते हैं, पर शांतिपूर्ण तरीके से। वह एक बार फिर ख़िलाफ़त की स्थापना करना चाहते हैं और ख़ुद को खलीफा के रूप में पेश करना चाहते हैं। उनकी मंशा मुसलमानों की बेचैनी को भुना कर इसलामी पुनरुत्थानवाद को आगे बढ़ाना है। उनके साथ खूबी यह है कि उनका तरीका न हिंसक है न ही इसलाम की उनकी व्याख्या आईएस की तरह संकीर्ण है। वे मुसलमानों की बेचैनी को मूर्त रूप देना चाहते हैं।

अर्दवान को महदी की अवधारणा का फ़ायदा

इस प्रक्रिया में उन्हें इसलाम के 'महदी' की अवधारणा से भी बल मिलता है। महदी की अवधारणा यह है कि क़यामत के पहले धर्मगुरु महदी आएंगे जो मुसलमानों को एकजुट करेंगे, पूरी दुनिया पर 5, 7, 9, या 99 साल तक राज करेंगे और उसके बाद क़यामत आएगी। क़यामत मतलब वह दिन जब यह दुनिया ख़त्म हो जाएगी और ख़ुदा सभी मुसलमानों के किए का फ़ैसला करेगा।
कुरान में महदी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन हदीस में इसका उल्लेख है। इसलाम की शिया शाखा में बारहवें इमाम महदी की अवधारणा है जो कयामत के पहले आएँगे। लेकिन सुन्नी इसलाम में भी महदी की अवधारणा को माना जाता है।

अल अक्सा को आज़ाद कराएंगे अर्दवान?

अर्दवान ने इज़रायल की अल अक्सा मसजिद को आज़ाद कराने की बात जब कही थी तो इसरायल ही नहीं अमेरिका में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। अल अक्सा मसजिद यहूदियों के माउंट टेंपल के पास है और 'वेलिंग वॉल' से बिल्कुल सटा हुआ है। वेलिंग वॉल यानी ध्वस्त मंदिर का भग्नावशेष, जो यहूदियों के लिए बहुत ही पवित्र हैं। वे वहां जाकर उस दीवाल से सट कर प्रार्थना करते हैं। माउंट टेंपल यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल है और कहा जाता है कि इसी जगह पर डेविड के समय बनाया हुआ यहूदी मंदिर था, जिसे रोमन साम्राज्य ने पहली सदी में ही ध्वस्त कर दिया था। इसका कारण राजनीतिक था क्योंकि यहूदियों ने रोमन साम्राज्य के आधिपत्य को चुनौती दी थी।
यहूदियों में भी यह अवधारणा है कि एक मसीहा आएगा जो उस ध्वस्त मंदिर की जगह नया मंदिर बनाएगा। माउंट टेंपल वही जगह है। लेकिन अल अक्सा मसजिद मक्का और मदीना के बाद मुसलमानों के लिए तीसरा सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्थान है।
जब अर्दवान अल अक्सा मसजिद को आज़ाद कराने की बात करते हैं तो वे पूरी दुनिया के मुसलमानों को यह संकेत देने की कोशिश करते हैं कि वह उनके भविष्य के नेता हैं, वह उनका उद्धार करने वाले हैं, वह उन्हें एकजुट कर मुसलमानों के साम्राज्य की स्थापना करने वाले हैं।

कश्मीर पर मुखर अर्दवान

यही कारण है कि अर्दवान कश्मीर के मुद्दे पर मुखर हो उठते हैं। वे कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनकूल चाहते हैं। वह सीधे भारत को धमकाते नहीं हैं, पाकिस्तान से भारत के दोतरफा बातचीत के जरिए ही इस समस्या के समाधान की बात करते हैं, पर वह चुप नहीं रहते हैं। वह चुप नहीं रह सकते, उन्हें यह साबित करना है कि वे पूरी दुनिया के मुसलमानों के रहनुमा हैं। 
अर्दवान यदि खुद को मुसलमानों का रहनुमा साबित कर देते हैं तो 61 देशों के कॉनफ़ेडरेट बनाने का रास्ता साफ़ हो जाएगा। यदि वे इसमें कामयाब हो जाते हैं तो वह इसके राष्ट्रपति भी बन सकते हैं। इस पद को ख़लीफ़ा भले न कहें, पर यह पद मुसलमानों के सर्वश्रेष्ठ नेता का है, तुर्की के राष्ट्रपति यही चाहते हैं।
लेकिन यह आसान काम नहीं है। मुसलिम देशों के अपने समीकरण हैं, अंतरकलह हैं, गुटबंदी हैं, अपने-अपने हित हैं, मजबूरियां हैं। यहां तक कि सीमा विवाद तक हैं।

मुसलिम जगत के दो ध्रुव

मुसलिम जगत की राजनीति में दो ध्रुव बिल्कुल साफ़ है-सऊदी अरब और ईरान। सऊदी अरब सुन्नी इसलाम का प्रतिनिधित्व करता है तो ईरान शिया इसलाम का। मक्का मदीना के धर्मस्थानों पर सऊदी अरब का ही कब्जा है और उसे ही इन जगहों का अभिभावक माना जाता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक कारणों से सऊदी अरब को अब चुनौती मिल रही है। उसके ख़िलाफ़ एक गुट बन रहा है। पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देश सऊदी अरब के ख़िलाफ़ तुर्की का साथ देना चाहते हैं। ईरान भी इसी कारण तुर्की की ओर बढ़ रहा है।
मुसलिम देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इसलामिक स्टेट में दो गुट साफ हैं। हालांकि 57 देशों के इस संगठन के अधिक देश अभी भी सऊदी अरब के साथ हैं, पर रियाद को चुनौती मिल रही है।
अर्दोवान इस स्थिति को भी भुनाना चाहते हैं। वह मुसलिम देशों का नेतृत्व सऊदी के शाह हाथ से छीनने की जुगत में हैं। लेकिन काम आसान नहीं है।

मुसलिम जगत की दिक्क़तें

दूसरी ओर, 61 मुसलिम-बहुल देश एक झंडे के नीचे कैसे आएंगे, एक आदमी को अपना नेता कैसे मानेंगे, यह अहम सवाल है। ओटोमन साम्राज्य अतीत की चीज है, उसका गौरवशाली अतीत अब नहीं लौट सकता, ख़ुद मुसलमान अपने आप को उससे जोड़ कर नहीं देखते। यहां तक कि शरीआ भी हर मुसलमान को बहुत अपील नहीं करता है। आम मुसलमान खुद को ख़िलाफ़त से जोड़ कर नहीं देखता है।
अर्दोवान का रास्ता कठिन है। वे अपने देश के सर्वशक्तिमान नेता बन सकते हैं, पर दुनिया के सभी मुसलमान उन्हें स्वीकारकर लें, यह मुश्किल है।
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