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बिहार चुनाव: बिना लालू यादव कैसा होगा विधानसभा चुनाव!

यह चुनाव राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ वोटरों के लिए भी एक चुनौती माना जा रहा है। एक ओर बाढ़ से मची तबाही है तो दूसरी ओर कोरोना के बाद बिहार में प्रभावित आबादी का प्रदेश लौटना भी एक गंभीर बात है। लेकिन सबसे अहम बात है कि दशकों बाद बिहार में विधानसभा चुनाव बिना लालू यादव के होने जा रहा है। लालू की अनुपस्थिति में कैसा होगा यह चुनाव....
समी अहमद

भारत निर्वाचन आयोग की प्रेस काॅन्फ्रेंस में बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा कर दी गई। बिहार में मौजूदा विधानसभा की अवधि 29 नवंबर तक है। बिहार के चुनावी दंगल में दोनों गठबंधनों की छोटी पार्टियों में कौन किधर जाएगी, इस पर अटकलें जारी हैं।

2015 में हुए विधानसभा चुनावों के प्रथम विजेता गठबंधन के दलों के लिए स्टार प्रचारक लालू प्रसाद इस समय राँची में कैद अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं और इसकी उम्मीद कम ही है कि चुनावी राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका निभा सकें। बिहार में लालू की अनुपस्थिति में हो रहे इस पहले चुनाव में सबसे अधिक दबाव उनके राष्ट्रीय जनता दल पर ही दिख रहा है। 

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सबसे पहले नीतीश कुमार के अलग होने से सरकार में राजद की हिस्सेदारी गयी, अब चुनाव में उनके दूसरे सबसे बड़े सहयोगी जनता दल की कमी से होने वाले नुक़सान का उन्हें अंदाज़ा लग रहा होगा। 2015 में आरजेडी ने 80 और जदयू ने 71 सीटें लाकर धूम मचा दी थी। तब बीजेपी को महज 53 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। दस साल बाद नीतीश कुमार बीजेपी के बिना सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बने मगर यह गठबंधन दो साल बाद ही बिखर गया।

लोकसभा चुनाव 2019 आते-आते बिहार में गठबंधन का रूप एकदम बदल गया और भारतीय जनता पार्टी ने धमाकेदार वापसी की। साथ ही दोबारा एनडीए में शामिल जदयू को भी लोकसभा में अपनी सीटें बढ़ाने में जबर्दस्त कामयाबी मिली। हालत यह हो गयी कि बिहार के 40 संसदीय सीटों में से लालू प्रसाद के महागठबंधन को महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा। यह सीट भी कांग्रेस को मिली और राजद लोकसभा में जीरो पर आउट हो गया।

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले एनडीए का एक महत्वपूर्ण चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने पलटी मारी और वह महागठबंधन का हिस्सा बने लेकिन विधानसभा चुनाव 2020 आते-आते उन्होंने वाया जदयू वापस एनडीए में जाने का एलान कर दिया। 

इधर, एनडीए से अलग हुए एक और दल उपेन्द्र कुशवाहा मंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर आम चुनाव से पहले अपनी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को महागबंधन में ले आए लेकिन उनकी क़िस्मत रूठी रही। वह ख़ुद भी हारे और उनके सभी उम्मीदवार हार गये।

विधानसभा चुनाव आते-आते पहले जीतन राम मांझी ने महागठबंधन को अलविदा कह दिया और ठीक चुनाव की तारीख़ों की घोषणा के आसपास उपेन्द्र कुशवाहा को भी महागठबंधन आईसीयू में नज़र आने लगा।

कुशवाहा की बात बीजेपी से होने की सूचना है और कुशवाहा के द्वारा किसी भी समय एनडीए में शामिल होने का एलान हो सकता है।

उधर, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, जो अब उनके बेटे चिराग पासवान की पार्टी बन चुकी है, के बारे में भी यह अटकलें लग रही हैं कि वे किधर का रुख करेंगे। कई बार चिराग की बात और राजद के तेजस्वी यादव की बात एक जैसी लगी है। कई बार उनकी पार्टी की तरफ़ से 100 या उससे अधिक सीट पर अकेले लड़ने की घोषणा की जाती रही है। 

इस समय रामविलास पासवान दिल्ली में अपना इलाज करा रहे हैं और उन्होंने पार्टी की कमान पूरी तरह से अपने बेटे को दे रखी है। ऐसे में कई युवा नेता चिराग को मुख्यमंत्री के रूप में भी पेश करने में लगे हैं। हालाँकि राजनीतिक प्रेक्षक यह मानते हैं कि यह नीतीश कुमार पर दबाव बनाने का एक तरीक़ा है और सीट बँटवारे के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा।

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दूसरी तरफ़ कांग्रेस और राजद के लिए एक अलग सिरदर्द बिहार चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के व्यापक पैमाने पर चुनाव लड़ने की घोषणा को भी माना जा रहा है। ओवैसी ने देवेन्द्र यादव के साथ चुनावी गठबंधन किया है और ऐसे में जिस जगह 500-1000 से जीत-हार का फ़ैसला होगा, वहाँ ऐसा माना जा रहा है कि यह गठबंधन महागठबंधन के वोट ही ले जाएगा।

यह चुनाव राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ वोटरों के लिए भी एक चुनौती माना जा रहा है। एक ओर बाढ़ से मची तबाही है तो दूसरी ओर कोरोना के बाद बिहार में प्रभावित आबादी का प्रदेश लौटना भी एक गंभीर बात है। 

कुल मिलाकर कोराना के दौर में और लालू की अनुपस्थिति में होने वाले इस चुनाव के नीरस होने की आशंका है।

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