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'आप' ने क्यों जताई आशंका, क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव टाले जाएँगे?

क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव टाले जा सकते हैं? क्या सरकार चुनाव आयोग पर इसका दवाब डाल सकती है कि मौजूदा स्थिति में चुनाव नहीं कराए जाएँ और इसे निकट भविष्य पर छोड़ दिया जाए?
ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने चुनाव टाले जाने की आशंका जताई है। उन्होंने गुरुवार को कहा कि केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और गृह मंत्री अमित शाह चुनाव टालने की साजिश रच रहे हैं। 
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मामला क्या है?

संजय सिंह ने गुरुवार को कहा, 'गृह मंत्री दिल्ली का माहौल ख़राब करना चाहते हैं। पहले उनके नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए। बीजेपी दिल्ली में अपनी हार होती देख रही है। उस डर से ही यह साजिश रची गई थी। गृह मंत्री चुनाव टालने का षडयंत्र रच रहे हैं।'
बता दें कि गुरुवार को दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इसलामिया के बाहर एक शख़्स ने सैकड़ों लोगों की भीड़ पर गोली चला दी। वहाँ उस समय नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ एक शांति मार्च निकाला जा रहा था। आयोजक वह मार्च जामिया से राजघाट स्थित गाँधी समाधि तक ले जाना चाहते थे, इसलिए वहाँ भीड़ मौजूद थी। उस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वहाँ पुलिस के 300 जवान और 12 थाना प्रभारी स्तर के अफ़सर मौजूद थे। भीड़ को नियंत्रित करने पँहुची पुलिस एक आदमी को गोली चलाने से नहीं रोक पाई। 

संजय सिंह ने इसके बाद ही यह आरोप लगाया। गृह मंत्री अमित शाह ने इसके बाद ट्वीट कर कहा कि उन्होंने दिल्ली पुलिस के प्रमुख से बात की है, दोषी को बख़्शा नहीं जाएगा और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
इस घटनाक्रम में चुनाव आयोग ने गुरुवार को कहा कि उसके अधिकारी शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के अफ़सरों से मिलेंगे। पर आयोग ने दिल्ली चुनाव टालने की संभावना से इनकार कर दिया है।

चुनाव टालने के प्रावधान

संविधान की व्यवस्था के मुताबिक़, युद्ध या आंतरिक विद्रोह या बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की स्थिति में आम चुनाव टाले जा सकते हैं। यह तभी हो सकता है जब इमर्जेंसी का एलान कर दिया जाए।

  • संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत युद्ध या विद्रोह की स्थिति में इमर्जेंसी का एलान किया जा सकता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को अधिकार है कि यदि उसे लगता है कि किसी जगह निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं कराए जा सकते, तो वह चुनाव टाल सकता है।
  • लेकिन इसके साथ ही चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि यदि उसे लगता है कि क़ानून व्यवस्था की स्थिति ऐसी नहीं है कि चुनाव कराए जा सकें तो वह चुनाव टाल सकता है।
  • चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत पार्टी के उम्मीदवार की मौत होने पर चुनाव टाला जा सकता है। 
  • यदि आयोग को लगे किसी क्षेत्र में निष्पक्ष चुनाव कराने में दिक्कत है तो वह वहाँ चुनाव टाल सकता है।

पहले भी टाले जा चुके हैं चुनाव

इसके कई उदाहरण मिलते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव यानी 2019 में हुए आम चुनाव के समय त्रिपुरा पूर्व पर मतदान 23 अप्रैल को होना था। लेकिन चुनाव आयोग ने उसे टाल दिया और वहाँ मतदान 18 अप्रैल को कराए गए। आयोग के रिटर्निंग अफ़सर ने कहा था कि असामाजिक तत्व चुनाव प्रक्रिया में रुकावट डाल सकते हैं। उन्होंने यह बात ख़ुफ़िया एजेन्सियों की रिपोर्ट के आधार पर कही थी। 

पूरे राज्य विधानसभा के चुनाव टालने के उदाहरण भी हैं। जम्मू-कश्मीर में पिछला विधानसभा चुनाव समय पर नहीं कराया गया था। इसे 2019 में ही कराया जाना था।
लेकिन केंद्र सरकार ने चुनाव नहीं कराए और राज्य में राष्ट्रपति शासन ही जारी रखा। केंद्र सरकार ने बाद में उसे दो केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया। 

उस समय जम्मू-कश्मीर के सभी विपक्षी दलों ने एक सुर में सरकार पर चुनावी फ़ायदे के लिए चुनाव टालने का आरोप लगाया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि केंद्र का सत्तारूढ़ दल वहाँ ज़्यादा सीटें  नहीं जीत सकता, इसलिए चुनाव टाल दिए गए। उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा था कि 2014 में स्थिति अधिक बुरी थी, पर चुनाव कराए गए थे।
सवाल यह है कि दिल्ली चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कुछ समय से हो रही है। केंद्र सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर और बीजेपी के एक दूसरे नेता कपिल मिश्रा ने भड़काऊ बयान दिए हैं। बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने भी लोगों को डराने वाले बयान दिए हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी क़रार दिया गया है। गृह मंत्री तक ने दिल्ली चुनाव को शाहीन बाग़ और राष्ट्रवाद से जोड़ने बयान दिए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में गुरुवार को गोलीबारी हुई। ऐसे में यदि चुनाव टाले जाते हैं तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल एक बार फिर उठेंगे।
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