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त्रिपुरा पुलिस का यह दावा कितना सच कि पानीसागर में मसजिद नहीं जलाई गई?

त्रिपुरा में हिंसा की ख़बरें हैं। मुसलिम समुदाय को निशाना बनाकर सांप्रदायिक हमले किए गए। इसकी रिपोर्टिंग भी हुई। उस रिपोर्टिंग को लेकर अब त्रिपुरा की पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट लिखने वाले कुछ यूज़रों और कुछ पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है कि वे हिंसा भड़काने का काम कर रहे हैं। त्रिपुरा पुलिस ने 'फर्जी जानकारी' ऑनलाइन साझा करने के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत 102 सोशल मीडिया अकाउंट पर कार्रवाई की है। एचडब्लू न्यूज़ नेटवर्क के लिए काम कर रही समृद्धि सकुनिया और स्वर्णा झा पर भी एफ़आईआर दर्ज की गई है।

इसी को लेकर वहाँ की हिंसा ज़्यादा चर्चा में भी है। पुलिस का दावा है कि ऐसे लोगों ने ग़लत ख़बरें चलाईं और ग़लत दावे किए कि मुसलिम संपत्तियों, दुकानों और मसजिदों में तोड़फोड़ की गई और आगजनी की गई। तो पुलिस का यह दावा कितना सही है और क्या पत्रकारों ने जो रिपोर्टिंग की वह ग़लत है?

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सबसे पहले ऐसी ख़बरें तब आई थीं जब 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने रिपोर्ट दी कि अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में कथित हिंसा और आगजनी ने मुसलिम संपत्तियों, दुकानों और मसजिदों को नुक़सान पहुँचाया। हिंसा के बीच, विश्व हिंदू परिषद ने बड़ी रैलियाँ निकालीं, जिसके कारण त्रिपुरा पुलिस के साथ झड़पें हुईं।

इसी के साथ ऑनलाइन कई तसवीरें और वीडियो सामने आए जिसमें कहा गया कि वे तसवीरें पानीसागर, उत्तरी त्रिपुरा में हुई हिंसा से जुड़ी हैं। जब सोशल मीडिया पर ये दावे वायरल हुए तो पुलिस ने समृद्धि सकुनिया के ट्वीट को रिप्लाई करते हुए बयान जारी कर कहा, 'कोई मसजिद नहीं जलाई गई और मसजिद को जलाने या क्षतिग्रस्त करने या लाठी इकट्ठा करने की जो तसवीरें साझा की जा रही हैं वे सभी नकली हैं और त्रिपुरा की नहीं हैं।'

इसके बाद, एसडीपीओ कंचनपुर और एसडीपीओ धर्मनगर ने मसजिद में तोड़फोड़ और आगजनी की ख़बरों का खंडन किया और कहा कि फर्जी खबर फैलाने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी।

एसडीपीओ कंचनपुर ने एक वीडियो में कहा, 'मैं, एसडीपीओ कंचनपुर, यह बताना चाहूँगा कि कंचनपुर डिवीजन पूरी तरह से शांतिपूर्ण है। मैं त्रिपुरा के नागरिकों से फेसबुक और ट्विटर पर फर्जी खबरों और अफवाहों के झांसे में नहीं आने का आग्रह करता हूं। कृपया इस तरह की फेक न्यूज और अफवाहों को शेयर न करें। ऐसा करने वाले एकाउंट के ख़िलाफ़ त्रिपुरा पुलिस उचित कार्रवाई करेगी। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि पानीसागर की मसजिद में कोई गड़बड़ी नहीं हुई।'

इसको लेकर 28 अक्टूबर को त्रिपुरा पुलिस ने पानीसागर में एक मसजिद की चार तसवीरें ट्वीट कीं और लिखा, 'यह स्पष्ट है कि मसजिद सुरक्षित है।'

त्रिपुरा पुलिस के आईजीपी लॉ एंड ऑर्डर सौरभ त्रिपाठी ने भी पानीसागर में एक मसजिद को आग लगाए जाने की किसी भी घटना से इनकार किया। इस बयान को मीडिया में प्रमुखता से छापा गया। तो क्या वहां मसजिद में न तो तोड़फोड़ हुई और न ही आगजनी?

इसकी पड़ताल ऑल्ट न्यूज़ ने की है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि त्रिपुरा पुलिस ने रोवा जामे मसजिद की तसवीरें साझा करते हुए दावा किया था कि पनीसागर में कोई मसजिद नहीं जलाई गई। 

ऑल्ट न्यूज़ ने स्थानीय पत्रकारों सहित उससे जुड़े कई लोगों से बात करने के बाद अपनी पड़ताल में पाया कि पनीसागर में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ का एक पहले कैंप था, उसी की एक मसजिद में तोड़फोड़ की गई और आग लगाई गई। यह रोवा जामे मसजिद से 3 किमी से अधिक दूर है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2 नवंबर को @SultanTripura नाम के यूज़र ने मसजिदों के चार वीडियो ट्वीट किए। वीडियो में वह मसजिद आग से क्षतिग्रस्त हुई लगती है। उसमें से एक सीआरपीएफ़ के पूर्व कैंप की मसजिद का एक वीडियो भी शामिल है। यूजर ने दावा किया कि 20 अक्टूबर के बाद मसजिदों में आग लगा दी गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वीडियो रिकॉर्ड करने वाले शख्स के मुताबिक़, सीआरपीएफ़ मसजिद रीजनल कॉलेज ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन से कुछ सौ मीटर की दूरी पर है, जो रोवा जामे मसजिद से क़रीब 3 से 4 किमी दूर है।

ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, 5 नवंबर को अल जज़ीरा ने सांप्रदायिक हिंसा के बाद की जमीनी रिपोर्ट प्रकाशित की है। लेख में पनीसागर स्थित उसी मसजिद की तसवीर शामिल है। एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने के अनुरोध पर अल जज़ीरा को बताया कि 26 अक्टूबर की हिंसा से चार दिन पहले पूर्व अर्धसैनिक कैंप की मसजिद पर हमला किया गया था।

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9 नवंबर को 'आर्टिकल14' ने भी इसकी सूचना दी और इसमें सीआरपीएफ़ की जली हुई मसजिद की एक और तस्वीर शामिल थी। त्रिपुरा पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) वीएस यादव ने आर्टिकल 14 को बताया कि पुलिस जांच कर रही है कि आगजनी के पीछे कौन है और कहा कि बदमाश 'किसी भी समुदाय के हो सकते हैं'।

असम के नुरुल इसलाम मजारभुइया ने हिंसा के बाद नुकसान के स्तर का जायजा लेने के लिए त्रिपुरा का दौरा किया। वह नई दिल्ली स्थित एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) के सलाहकार और असम दक्षिण क्षेत्र जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष हैं। टेलीफोन पर बातचीत में उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि वह सीआरपीएफ़ मसजिद गए थे और पाया कि उसको आग के हवाले किया गया था। 

ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, डीजीपी यादव ने कहा, 'यह मसजिद (सीआरपीएफ मसजिद) एक दशक से अधिक समय से काम में नहीं ली जा रही है। फरवरी 2017 में मसजिद पर एक पेड़ गिर गया और भारी नुकसान हुआ। इसकी मरम्मत किसी ने नहीं की। तो कोई इसे मसजिद कैसे मानता है? इतने सारे धार्मिक स्थल छोड़े जाते हैं, हम उनकी गिनती नहीं करते हैं। तो आप इसे मसजिद के रूप में क्यों गिन रहे हैं? यह सरकारी ज़मीन पर है और एक दशक पहले तक सिर्फ़ सीआरपीएफ़ ही इसका इस्तेमाल कर रही थी। किसी भी सार्वजनिक प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इसलिए हमने साफ़ तौर पर कहा कि कोई मसजिद नहीं जलाई गई। इसके अलावा, इस मसजिद में आगजनी के संबंध में पुलिस स्टेशन में कोई संकटपूर्ण स्थिति को लेकर कॉल नहीं की गई थी।'

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ऑल्ट न्यूज़ ने लिखा है, हमारे पास सीआरपीएफ़ मसजिद के पूर्व प्रमुख के निधन के बाद एक नई मसजिद समिति के गठन को लेकर 2020 का एक पत्र है। इस दस्तावेज़ में उनके फ़ोन नंबरों के साथ उपाध्यक्ष, अध्यक्ष, कैशियर, उप कैशियर और सचिव के नाम दर्ज हैं।

मसजिद समिति के सदस्यों में से एक ने नाम न छापने की शर्त पर ऑल्ट न्यूज़ से बात की। सदस्य ने डीजीपी यादव के इस दावे की पुष्टि की कि एक पेड़ ने मसजिद को नुक़सान पहुँचाया था। सदस्य ने बताया कि यह घटना पिछले साल नई मसजिद कमेटी के गठन से पहले की है। तब पेड़ गिरने से मसजिद का एक हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हो गया था। सदस्य ने यह भी बताया कि मसजिद में लोगों की भीड़ कम रहती थी, लेकिन सप्ताह में कम से कम एक बार शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाती थी।

रिपोर्ट के अनुसार ऑल्ट न्यूज़ को सीआरपीएफ़ मसजिद की प्रबंध समिति द्वारा सब डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) पानीसागर को भेजा गया एक जनवरी 2021 का पत्र मिला जिसमें मसजिद को स्थानांतरित नहीं करने का अनुरोध किया गया था। इस मसजिद का निर्माण सीआरपीएफ़ के जवानों ने 1982 में एक मंदिर के साथ-साथ करवाया था।

यह पत्र पानीसागर एसडीएम द्वारा 18 जनवरी, 2021 को 'अनधिकृत धार्मिक संरचनाओं' के हटाने के लिए जारी एक ज्ञापन के जवाब में था। उस ज्ञापन में आरसीपीई कॉलेज के पास मसजिद और हिंदू मंदिर, देबोस्थान मंदिर का ज़िक्र था।

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