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जानिए, कोरोना से जुड़े मौत के किन मामलों में 'सर्टिफिकेट' देगी सरकार

सुप्रीम कोर्ट की लगातार सख़्ती के बाद सरकार ने अब यह कहा है कि कोरोना से जुड़े मौत के किन मामले में वह आधिकारिक दस्तावेज़ जारी करेगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दिया है। इसने बताया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर कोरोना से संबंधित मौतों के लिए एक 'आधिकारिक दस्तावेज' जारी करने के लिए दिशानिर्देश लेकर आए हैं। इसमें यह साफ़ किया गया है कि सरकार किन लोगों की मौत को कोरोना से जुड़ी मौत मानेगी।

दिशानिर्देशों में कहा गया है कि इसके लिए केवल उन कोरोना मामलों पर विचार किया जाएगा जिनका आरटी-पीसीआर टेस्ट, मॉलिक्यूलर टेस्ट, रैपिड-एंटीजन टेस्ट किया गया है या किसी अस्पताल में जाँच के माध्यम से या उपचार करने वाले चिकित्सक द्वारा रोगी में इसकी पुष्टि की गई हो। दिशानिर्देशों में आगे कहा गया है कि ज़हर से मौत, आत्महत्या, हत्या और दुर्घटना के कारण होने वाली मौतों को कोरोना मौतों के रूप में नहीं माना जाएगा, भले ही ऐसे लोग तब संक्रमित रहे हों।

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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा तब पेश किया है जब क़रीब दस दिन पहले शीर्ष अदालत ने कोरोना मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए दिशानिर्देश जारी करने में देरी पर केंद्र सरकार की फटकार लगाई थी। इससे पहले जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि कोरोना से होने वाली मौतों के मामले में सर्टिफ़िकेट पर यह स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यदि कोरोना के कारण स्वास्थ्य में कोई गड़बड़ी होती है और उससे रोगी की मौत हो जाती है, तो भी कोरोना को ही मौत का कारण माना जाए और इसे मृत्यु प्रमाण पत्र पर लिखना होगा।

अदालत ने यह भी कहा था कि कोरोना पॉजिटिव टेस्ट होने के दो-तीन महीने के अंदर मौत होने पर भी उसे कोरोना से मौत ही माना जाना चाहिए। 

अब सरकार ने ताज़ा हलफनामा में कहा है कि जिन कोरोना मरीजों की मौत अस्पताल में या घर पर हो गई है, और जहाँ जन्म मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 की धारा 10 के तहत मौत के कारण का मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किया गया है, उसको कोरोना से मौत माना जाएगा। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस संदर्भ में आईसीएमआर के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है। 

हलफनामे में कहा गया है कि आईसीएमआर के एक अध्ययन के अनुसार, 95 प्रतिशत मौतें किसी व्यक्ति की पॉजिटिव रिपोर्ट आने के 25 दिनों के भीतर होती हैं।

उसमें यह भी कहा गया है कि इस दायरे को व्यापक और अधिक समावेशी बनाया गया है। जाँच की तारीख़ या कोरोना मामले की पुष्टि होने की तारीख़ से 30 दिनों के भीतर होने वाली मौतों को कोरोना के कारण होने वाली मौतों के रूप में माना जाएगा, भले ही मौत अस्पताल के बाहर भी हुई हो।

इसके साथ यह भी जोड़ा गया है कि हालाँकि कोरोना रोगी के अस्पताल में भर्ती कराने के 30 दिनों के बाद भी मरीज़ के भर्ती रहने और बाद में उसकी मौत होने पर उसे कोरोना से मौत होना माना जाएगा।

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दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में जहाँ मौत के कारण वाला मेडिकल प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है, या मृत व्यक्ति का परिवार उस प्रमाण पत्र में दिए गए मौत के कारण से संतुष्ट नहीं है तो इसके लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ज़िला स्तर पर एक कमेटी बनाएँगे। 

समिति परिवार की शिकायतों की जाँच करेगी और तथ्यों की पुष्टि के बाद संशोधन के लिए आधिकारिक दस्तावेज जारी करने जैसे उपायों का प्रस्ताव भी देगी। दस्तावेज़ जारी करने और शिकायतों का आवेदन जमा करने के 30 दिनों के भीतर इसका निपटारा किया जाएगा।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट जून महीने में एक फ़ैसले में कहा था कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएमए कोरोना से हताहत हुए लोगों के परिवार वालों को मुआवजा देने के नियम और राशि तय करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह तब कहा था जब सरकार ने उससे 10 दिन पहले एक हलफनामा देकर अदालत से कहा था कि वह कोरोना से मारे गए सभी लोगों के लिए 4-4 लाख रुपये का मुआवजा नहीं दे सकती है क्योंकि इससे पूरी आपात राहत निधि खाली हो जाएगी। सरकार का वह हलफनामा उस एक याचिका के जवाब में था जिसमें न्यूनतम राहत और कोरोना से मारे गए लोगों को मुआवजा या अनुग्रह राशि देने की माँग की गई थी।
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