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वोडाफ़ोन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ क्यों कर रही हैं भारत छोड़ने की बात?

ऐसे समय जब केंद्र सरकार ज़ोर देकर दावा करती है कि देश में व्यापार करना पहले से आसान हो गया है और उद्योगपतियों के अनुकूल वातावरण बना है, जिससे बड़ी तादाद में विदेशी भारत आ रहे हैं, एक बुरी ख़बर है। जो विदेशी कंपनियाँ यहाँ पहले से कामकाज कर रही हैं, उनमें से कुछ नाराज़ हैं और भारत से निकलने की तैयारी कर रही हैं।
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वोडाफ़ोन के मुख्य कार्यकारी निक रीड ने मंगलवार को कहा कि यदि भारत सरकार ने लाइसेंस फ़ीस, टैक्स और दूसरे शुल्कों में कटौती नहीं की तो उनकी कंपनी जल्द ही भारत से बोरिया बिस्तर समेट कर बाहर निकल लेगी। रीड ने मंगलवार को कहा : 

हमारे ऊपर बहुत बड़ा आर्थिक बोझ लाद दिया गया है, यहाँ की नियामक संस्थाएँ मददगार नहीं हैं, करों की दरें बहुत ही ऊँची हैं और सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बहुत ही नकारात्मक असर डालेगा।


निक रीड, मुख्य कार्यकारी, वोडाफ़ोन

क्या है मामला?

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे एक मामले में अपना फै़सला सुनाते हुए कहा कि दूरसंचार कंपनियाँ स्पेक्ट्रम फ़ीस, लाइसेंस फ़ीस और दूसरी फ़ीस चुकाएँ और उन पर ब्याज भी भरें। यह रकम 92 हज़ार करोड़ रुपए का है। ब्याज़ जोड़ देने पर यह  रकम 1.33 लाख करोड़ रुपये बैठता है। 
वोडाफ़ोन को इस मद में 39 हज़ार करोड़ रुपये का भुगतान करना है।  लेकिन कंपनी ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का फ़ैसला किया है। यह हाल उस कंपनी का है, जिसने बाज़ार के 30 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर रखा है।
वोडाफ़ोन ने भारत में बने रहने के लिए केंद्र सरकार से एक राहत पैकेज की माँग की है। उसने कहा है कि अगले दो साल तक स्पेक्ट्रम फ़ीस से छूट दी जाए, टैक्स और लाइसेंस फ़ीस कम की जाए, सुप्रीम कोर्ट ने जो पैसे देने को कहा है, उस पर ब्याज और जुर्माना माफ़ कर दिया जाए।
वोडाफ़ोन पहले से ही ऊंची लाइसेंस फ़ीस और स्पेक्ट्रम फ़ीस के मुद्दे उठाती रही है। उसका कहना है कि इससे भारत में व्यापार करना आसास नहीं है। वोडाफ़ोन ने 2007 में हचिसन एस्सार 11 अरब डॉलर में खरीद कर भारत में दूरसंचार कारोबार शुरू किया था। 
वोडाफ़ोन के लगभग 30 करोड़ ग्राहक हैं जो पूरे देश के बाज़ार का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है। 

लाखों कंपनियां बंद

कारोबार समेटने की बात करने वाली अकेली कंपनी वोडाफ़ोन नहीं है। देश जिस तरह आर्थिक रूप से लगातार पिछड़ रहा है और धीरे-धीरे आर्थिक मंदी का शिकार होता जा रहा है, उसे समझने के लिए हम उन कंपनियों की ओर रुख कर सकते हैं, जिन्होंने बीते 5 साल में कामकाज समेट लिया है। 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 जुलाई, 2019 को लोकसभा में कहा कि अब तक 6.8 लाख कंपनियाँ बंद हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि इनमें लगभग 3.50 लाख शेल कंपनी यानी बेनामी कंपनियाँ थीं। तो सरकार यह मानती है कि लगभग 3 लाख कंपनियाँ तो वास्तविक थीं, जिन्होंने बोरिया-बिस्तर समेट लिया।
वित्त मंत्री ने रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ के हवाले यह जानकारी दी। रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ के मुताबिक़, 18,94,146 कंपनियां पंजीकृत हैं। इनमें से 6,83,317 कंपनियाँ बंद हो चुकी हैं। बंद हुई कंपनियों में 1.42 लाख महाराष्ट्र, 1.25 लाख दिल्ली और 67,000 कंपनियां पश्चिम बंगाल में थीं। 

कम विदेशी निवेश

सरकारी दावे के उलट भारत में व्यापार करना बहुत आसान नहीं है, इसे इससे भी समझा जा सकता है कि यहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई में कमी आई है। वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान भारत में कुल 44.40 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ, जबकि यह बीते साल 44.80 अरब डॉलर था। 

आयात-निर्यात में कमी

कारोबार की स्थिति समझने का एक और इन्डीकेटर है आयात और निर्यात। इसमें देश लगातार फ़िसल रहा है। ताज़ा आँकड़ों पर ध्यान दें तो इस साल सितंबर में आयात में लगभग 14 प्रतिशत की कमी आई है। भारत के लिए यह अधिक चिंता की बात इसलिए है कि आयात कम होने का मतलब है निवेश में कमी और दूसरे कई उद्योगों में मंदी। 

भारत का आयात सितंबर में 13.9 प्रतिशत गिर कर 36.9 अरब डॉलर पर पहुँच गया। इस दौरान स्टील उद्योग में इस्तेमाल होने वाले रसायन, कोयला, गाड़ियों के कल पुर्जे, सोना और धातु का कम आयात किया गया है। इस दौरान निर्यात भी 6.6 प्रतिशत गिर कर 26 अरब डॉलर पर पहुँच गया।

कॉम्पीटिशन इनडेक्स

विश्व आर्थिक फ़ोरम द्वारा तैयार अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा इन्डेक्स में भारत 10 स्थान फिसल कर 68वें स्थान पर आ गया। इस सूची में 141 देश हैं। हालांकि भारत 10 स्थान नीचे गिरा, इस इनडेक्स में भारत के स्कोर में सिर्फ़ 0.7 प्रतिशत की कमी आई है। 
चिंता की बात यह है कि इस रिपोर्ट के मुताबिक़, भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन जी-20, ब्रिक्स और दक्षिण एशिया के देशों की तुलना में ख़राब रहा है। जी-20 देशों में भारत काफ़ी नीचे है।
यह सिर्फ़ ब्राजील और अर्जेंटीना के ऊपर हैं, जो सूची में क्रमश: 71वें और 83वें स्थान पर हैं। इसी तरह ब्रिक्स देशों में भारत सिर्फ़ ब्राजील के ऊपर है। 
लेकिन सरकार तमाम बातों को सिरे से खारिज करने में लगी है। वह यह मानने को ही तैयार नहीं है कि आर्थिक स्थिति खराब है। वोडाफ़ोन तो एक उदाहरण है, लेकिन उसके अलावा जो बड़ी कंपनियाँ भारत छोड़ कर जा रही हैं या जाने की सोच रही हैं, उससे भारत सरकार के नीति निर्धारकों को क्या कुछ सीखना चाहिए, यह अहम बात है। 
केंद्र सरकार लगातार यह कह रही है कि आर्थिक स्थिति बिल्कुल ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं है। वह 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की बात कर ही है। वह इस पर सवाल उठाने वालोंको पेशेवर निराशावदी भी क़रार देती है। ऐसे में वोडाफ़ोन के मुख्य कार्यकारी निक रीड को क्या कहा जाए? 
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प्रमोद मल्लिक

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