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जीएसटी विवाद और गहराया, केंद्र को चुनौती देने की तैयारी में ग़ैर-बीजेपी शासित राज्य

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भले ही यह कहें कि 'जीएसटी के मुद्दे पर केंद्र और राज्यों के बीच कोई विवाद नहीं, सिर्फ विचारों की भिन्नता है', सच तो यह है कि विवाद है जो दिनोंदिन गहराता ही जा रहा है। यह विवाद सिर्फ आर्थिक मुद्दे पर नहीं है, यह राज्य-केंद्र रिश्ते और संविधान के संघीय ढाँचे की अवधारणा से मेल नहीं खाने के कारण भी है। मामला राजनीतिक भी है। बीजेपी और ग़ैर-बीजेपी राज्य जीएसटी के मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपना रहे हैं। ग़ैर बीजेपी राज्य केंद्र को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार अपने पहले के स्टैंड से टस से मस नहीं हो रही है।
सोमवार को हुई जीएसटी परिषद की बैठक में ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों ने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया कि वे जीएसटी मुआवज़ा की रकम के बदले बाज़ार से क़र्ज़ लें। इन राज्यों ने ज़ोर देकर कहा कि यह केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह जीएसटी की वजह से होने वाले नुक़सान की भरपाई करे। ऐसा नहीं करना जीएसटी क़ानूनों का उल्लंघन है।
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केंद्र के सुझाव खारिज

बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार, निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर राज्यों को दो विकल्प दिए। एक, वे 97,000 करोड़ रुपए की रकम, जो उन्हें जीएसटी मुआवजे के रूप में इस साल मिलनी चाहिए थी, बाज़ार से ले लें। दूसरा विकल्प यह है कि वे चाहें तो जीएसटी में कमी की पूरी रकम 2.35 ट्रिलियन रुपए बाज़ार से उगाह लें। इसमें जीएसटी के अलावा कोरोना महामारी और दूसरी केंद्रीय योजनाओं के मद में मिलने वाले पैसे भी हैं।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि पहला विकल्प चुनने पर 'कंपेनसेशन सेस' से पैसे दिए जाएंगे जो 30 जून, 2022 के बाद भी बरक़रार रहेंगे। लेकिन इसमें सिर्फ मूल रकम दी जाएगी, केंद्र ब्याज नहीं देगा।

ब्याज़ कौन देगा?

लेकिन सवाल है कि ब्याज कौन देगा। राज्यों ने ब्याज़ देने से इनकार कर दिया है। केरल के वित्त मंत्री ने सवाल उठाया कि केंद्र सरकार बाज़ार से क़र्ज़ क्यों नहीं ले सकती। राज्यों को पैसे देना उसका दायित्व है, लिहाज़ा, वह बाज़ार से पैसे लेकर राज्यों को दे। वह चाहे तो बॉन्ड जारी करे।
पंजाब समेत तमाम ग़ैर-बीजेपी राज्य इन सुझावों का विरोध कर रहे हैं। लेकिन बिज़नेस स्टैंडर्ड का कहना है कि 21 राज्य इन सुझावों में से एक मानने पर राज़ी हैं। यदि जीएसटी परिषद में इस मुद्दे पर मतदान हुआ तो केंद्र को अपनी बात मनवाने के लिए कम से कम 20 राज्यों के समर्थन की ज़रूरत होगी।

राज्यों का विरोध

पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल बेहद मुखर रहे। 'द ट्रिब्यून' के अनुसार, उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पंजाब के 9,000 करोड़ रुपए बतौर जीएसटी मुआवजा केंद्र के पास हैं और उसे वह पूरी रकम चाहिए।
 उन्होंने 'द ट्रिब्यून' से कहा, 

'जीएसटी धारा 10 के मुताबिक़, राज्यों को कंपेनसेशन फंड से पैसे मिलने चाहिए। इसके लिए क़र्ज़ नहीं लिया जा सकता है। स्वयं एटॉर्नी जनरल ने कहा है कि पाँच साल के संक्रमण काल में राज्यों को मुआवजा मिलना ही चाहिए।'


मनप्रीत सिंह बादल, वित्त मंत्री, पंजाब

अर्थव्यवस्था सुधारने पर ज़ोर

जीएसटी परिषद की बैठक में वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था सुधारने पर ज़ोर दिया और बताया कि किस तरह केंद्र सरकार इसके लिए मांग व खपत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने सोमवार को ही एलान की गई केंद्रीय स्कीमों का हवाला दिया और कहा कि इससे जीएसटी राजस्व भी बढ़ेगा।
 याद दिला दें कि पिछले महीने एक बैठक में 8 राज्यों ने केंद्र की इस सलाह को खारिज कर दिया था कि वे क़र्ज़ ले लें। इस बैठक में पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल, दिल्ली, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, राजस्थान, पुद्दुचेरी के प्रतिनिधि मौजूद थे।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल, तमिलनाडु के ई. के. पलानीस्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को चिट्ठी लिख कर दो टूक कहा था कि उन्हें हर हाल में पैसे चाहिए।
मोदी को लिखी चिट्ठी में के चंद्रशेखर राव ने कहा था कि कोरोना महामारी की वजह से उनके राज्य को अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, कम राजस्व उगाही हुई है और राजस्व का कई दूसरा बड़ा स्रोत भी नहीं है।
उन्होंने कहा था कि केंद्र के पास तो फिर भी आयकर, कॉरपोरेट टैक्स और कस्टम्स ड्यूटी के पैसे आते हैं, राज्यों के पास तो वह साधन भी नहीं है।
केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, 'केंद्र के लिए उधार लेना बहुत ही आसान है, वह सीधे बाज़ार से क़र्ज़ उगाह सकता है, यदि उसे ब्याज बढ़ने का डर है तो उस क़र्ज़ को मोनेटाइज कर दे, जो आसान है, सारे देश यही करते हैं।'
बता दें कि जीएसटी कम्पेनसेशन टू स्टेट्स एक्ट, 2017 के तहत राज्यों को यह गारंटी दी गई है कि जीएसटी लागू करने की वजह से उन्हें जो राजस्व का नुक़सान होगा, अगले पाँच साल तक केंद्र उसकी भरपाई करता रहेगा। लेकिन इस साल तो राज्यों को अप्रैल से ही इस मद में पैसे नहीं मिले है।
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