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इतिहास के नायकों की जाति पर राजनीति

सम्राट मिहिर भोज पर गुर्जर व राजपूत समाज के लोगों के बीच और सुहेल देव को लेकर राजभर और राजपूत समाज के लोगों के बीच विवाद क्यों है? पहले तो इस तरह का विवाद सामने नहीं था तो आख़िर अब ऐसा क्या हो गया है?
शैलेश

मौर्य सम्राट अशोक की जाति क्या थी? बिहार विधानसभा चुनावों के पहले इस मुद्दे पर ख़ूब चर्चा हुई। अब जब उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव क़रीब आ रहा है तो इतिहास के दो नायकों की जाति पर विवाद छिड़ गया है। ये हैं सम्राट मिहिर भोज और सुहेल देव। मिहिर भोज पर गुर्जर और राजपूत दोनों जातियों के नेता दावा ठोक रहे हैं, जबकि सुहेल देव को पिछड़ी जाति राजभर और राजपूत दोनों अपना बता रहे हैं।

ख़ास बात ये है कि सुहेल देव कोई राजा हुए भी या नहीं, यह तय नहीं है। इतिहास की किताबों में उनका ज़िक्र नहीं मिलता है। रानी पद्मावती या पद्मिनी की तरह साहित्य की कुछ किताबों में सुहेल देव का ज़िक्र ज़रूर मिलता है। पद्मावती और अनार कली की तरह सुहेल देव काल्पनिक चरित्र हैं या सचमुच इस नाम के राजा हुए भी इसे पता लगाने के लिए इतिहास की गहरी छानबीन की ज़रूरत है। बहरहाल पिछले कुछ वर्षों में सुहेल देव पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक पिछड़ी जाति राजभर की अस्मिता के प्रतीक बन गए हैं। लेकिन इस इलाक़े के राजपूत सुहेल देव को अपना बताने के लिए अभियान चला रहे हैं। 

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कौन थे मिहिर भोज?

इतिहास के मुताबिक़ मिहिर भोज ने 836 ईसवी से लेकर 885 ईसवी के बीच 49 वर्षों तक भारत पर शासन किया। उनकी राजधानी कन्नौज में थी। उनके राज वंश को गुर्जर -प्रतिहार राजवंश और उनके शासन में आने वाले क्षेत्र को गुर्जर देश कहा जाता था। उनका शासन आधुनिक कश्मीर से कर्नाटक और मुलतान से बंगाल तक फैला हुआ था। लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गुर्जर जाति के लोग मिहिर भोज को अपना नायक मानते आ रहे हैं। लेकिन अब राजपूतों ने उनपर दावा शुरू कर दिया है। राजपूत उन्हें गुर्जर लिखने का विरोध कर रहे हैं। राजपूतों का कहना है कि प्रतिहार राजवंश राजपूतों का था इसलिए मिहिर भोज को गुर्जर कहना ग़लत है।

गुर्जर शब्द पर काला रंग क्यों पोता?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 सितंबर को ग़ाज़ियाबाद के निकट दादरी में मिहिर भोज की एक मूर्ति का अनावरण किया तो नाम पट्ट पर अंकित गुर्जर शब्द को काले रंग से पोत कर छिपाने की कोशिश की गयी। जब नाम पट्ट बनने को दिया गया तब विवाद सतह पर नहीं था इसलिए अधिकारियों ने नाम पट्ट पर गुर्जर सम्राट मिहिर भोज लिखवा दिया। अनावरण के लिए मुख्यमंत्री का कार्यक्रम तय होने के बाद राजपूतों ने विरोध शुरू कर दिया। आख़िरी क्षण में दूसरा नाम पट्ट बन नहीं सकता था इसलिए काला रंग पोत कर उसे छिपाने की कोशिश की गयी। स्थानीय गुर्जर नेता इस बात से भड़क गए। गुर्जर इसके विरोध में एक महापंचायत कर चुके हैं और विधानसभा चुनावों में बीजेपी को वोट नहीं देने की धमकी दे रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती गुर्जरों के समर्थन में आ गए हैं।

gurjar and rajput claimed samrat mihir bhoj legacy amid up polls - Satya Hindi

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गुर्जर वोट

चर्चा इस बात की नहीं हो रही है कि मिहिर भोज ने किस तरह इतना बड़ा साम्राज्य क़ायम किया। क्यों वह एक लोकप्रिय शासक बने। पूरी तैयारी चुनावों में मिहिर भोज को भुनाने की चल रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में गुर्जरों की अच्छी ख़ासी आबादी है। इस इलाक़े में जाटों के बाद गुर्जर का दबदबा है। इसलिए इनके वोट पर हर पार्टी की नज़र रहती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर आबादी 10 से 12 प्रतिशत है। इस इलाक़े में जाटों की आबादी 12 से 14 प्रतिशत बतायी जाती है। मुसलिम आबादी क़रीब 25 फ़ीसदी है। इस हिसाब से गुर्जर और जाट दोनों ही बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। 

किसान आंदोलन के चलते जाट, बीजेपी से नाराज़ दिखाई दे रहे हैं। इसलिए बीजेपी गुर्जरों को नाराज़ नहीं करना चाहती है। दूसरी तरफ़ राजपूत पूरे प्रदेश में क़रीब 6 प्रतिशत आबादी के साथ बीजेपी के सबसे मज़बूत सहयोगी हैं।

सुहेल देव इतिहास के नायक या साहित्यिक पात्र

इतिहास में राजा सुहेल देव का ज़िक्र नहीं मिलता है। पहली बार उनका ज़िक्र 14वीं सदी के लेखक अमीर खुसरो की किताब "एजाज़ ए खुसरवी" और फिर 17वीं सदी में लिखी गयी किताब "मिरात ए मसूदी" में मिलता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुछ लोक कथाओं और लोक गीतों में भी उनका ज़िक्र आता है। इसके मुताबिक़ 11वीं सदी में आधुनिक बहराइच और श्रावस्ती ज़िलों में उनका राज्य था। महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के समय सालार मसूद ग़ाज़ी ने सुहेल देव के राज्य पर आक्रमण किया। सुहेल देव ने ग़ाज़ी को पराजित कर दिया। 

गजनवी के समकालीन इतिहासकारों ने सुहेल देव और सालार मसूद ग़ाज़ी दोनों का ज़िक्र नहीं किया है। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के पासी, राजभर, भर और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों के लोग सुहेल देव को अपना नायक मानते हैं। इस इलाक़े के राजपूतों ने ट्विटर पर अभियान चला कर सुहेल देव को राजपूत बताया और उन्हें पासी या राजभर कहने का विरोध किया।

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वोट की राजनीति और राजभर 

इस इलाक़े के एक प्रमुख नेता ओम प्रकाश राजभर ने 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन किया। इसके पहले वह मायावती के बहुजन समाज पार्टी में थे। नब्बे के दशक में मायावती ने ही दलित संतों और नेताओं की मूर्ति स्थापित कर उन्हें विशेष सम्मान देना शुरू किया। इसके प्रभाव से इतिहास के भूले बिसरे अनेक पात्र दलित और पिछड़ी जातियों के सम्मान के रूप में उभरे। सुहेल देव उनमें से एक हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के 15 ज़िलों की 60 विधानसभा सीटों पर राजभर और इस जैसी जातियों की आबादी है। अनुमान है कि क़रीब 18 प्रतिशत आबादी इनकी है। इसलिए राजनीति में आज कल इनकी काफ़ी पूछ है। राजभर की पार्टी 2017 में विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ लड़ी। इनके चार विधायक चुने गए। राजभर को मंत्री भी बनाया गया। 2019 के लोकसभा चुनावों में सीटों के बँटवारे पर उनका बीजेपी से विवाद हो गया। राजभर अब नए समीकरण की तलाश में हैं। 

नायकों से क्या हासिल?

हाल के वर्षों में सबसे ज़्यादा चर्चा पद्मावती या पद्मिनी की हुई। मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य "पद्मावत" में सबसे पहले पद्मावती का ज़िक्र आता है। यह रचना 1540 ईसवी की है। किताब के मुताबिक़ पद्मावती 13वीं 14वीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक रतन सिंह की रानी थीं। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने रतन सिंह को पराजित करके रानी पद्मावती को पाने की कोशिश की तो सम्मान बचाने के लिए पद्मावती ने जौहर किया।

समकालीन इतिहास में इस घटना का ज़िक्र नहीं है। पद्मावती जैसी किसी रानी का उल्लेख भी नहीं है। लेकिन कुछ सालों पहले इस कहानी पर फ़िल्म बनी तो राजपूतों के एक गुट ने बवाल खड़ा कर दिया। उनके दबाव पर फ़िल्म का नाम बदलना पड़ा। ये पूरा विवाद राजनीतिक फ़ायदे के लिए था। 

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ऐसे और पात्र भी हैं जिनका ज़िक्र इतिहास में नहीं मिलता लेकिन साहित्य या अन्य माध्यम से वो इतना लोकप्रिय हो गए कि उन्हें इतिहास का पात्र मान लिया गया। ऐसी ही एक पात्र अनारकली है। मुग़ल इतिहास में अनारकली का ज़िक्र कहीं नहीं मिलता लेकिन फ़िल्म "मुग़ल ए आज़म" में अकबर के पुत्र सलीम की प्रेमिका के रूप में सशक्त प्रदर्शन के बाद उसे इतिहास का पात्र माना जाने लगा।

आज जब राजनीति अपने युग के नायकों को गढ़ नहीं पा रही है तब इतिहास के कुछ असली और कुछ काल्पनिक नायकों को आगे करके वोट को साधने की कला में अनेक नेता महारत हासिल कर चुके हैं।

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