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भगवान राम के नाम पर राजस्थान बीजेपी के नेताओं में ही घमासान क्यों?

जिन भगवान राम के नाम का बीजेपी इस्तेमाल करती रही है उन्हीं के नाम पर बीजेपी के ही दो नेता आपस में तलवारें ताने हुए हैं। मामला राजस्थान बीजेपी का है। बीजेपी के वरिष्ठ विधायक कैलाश मेघवाल ने तो बीजेपी नेता गुलाबचंद कटारिया के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर ली थी। कटारिया मौजूदा विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं और पूर्व में राजस्थान में बीजेपी सरकार में गृहमंत्री रहे थे। इस निंदा प्रस्ताव को लाने के लिए जिन कारणों को मेघवाल ने गिनाया था उसमें से प्रमुख यह भी था कि कटारिया ने भगवान राम का अपमान किया है। 

भगवान राम के नाम पर राजस्थान बीजेपी में क़लह खुलकर सामने आ गई है। पार्टी में इस मुद्दे पर अंदरुनी कलह किस कदर है यह इससे समझा जा सकता है कि वसुंधरा राजे गुट के समर्थक माने जाने वाले मेघवाल ने कटारिया के ख़िलाफ़ कई आरोपों को लेकर राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष सतीश पूनिया को 4 सितंबर को एक ख़त लिखा था। उसमें उन्होंने उस 10 पेज के एक ख़त का हवाला दिया था जिसे उन्होंने नड्डा को संबोधित करते हुए लिखा था। उसमें कटारिया का भगवान राम को लेकर दिया गया विवादास्पद बयान भी शामिल था।

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कटारिया ने भगवान राम को लेकर क़रीब एक महीने पहले एक कार्यक्रम में कह दिया था कि 'अगर बीजेपी नहीं होती तो भगवान राम आज समुद्र में होते। ...सड़क नालियाँ तो और भी बन जाएगी। देश नहीं बचा तो भगवान आपको कोसेंगे।' तब कटारिया के बयान की तीखी आलोचना हुई थी। सोशल मीडिया पर सवाल उठाए गए कि जो बीजेपी राम को उपासक मानती रही है, जिसने राम मंदिर का आंदोलन चलाया और जो वोट के लिए राम का इस्तेमाल करती रही है, उसके नेता ऐसे बयान देते हैं। ऐसी तीखी आलोचनाओं के बाद कटारिया ने बाद में माफ़ी मांगी थी और कहा था, 'भगवान राम का अपमान करने के बारे में, मैं और मेरी पार्टी कभी सोच भी नहीं सकते हैं।'

राज्य विधानसभा के गुरुवार को मानसून सत्र से एक दिन पहले बुधवार को बीजेपी के वरिष्ठ विधायक कैलाश मेघवाल ने गुलाबचंद कटारिया के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव लाने की बात कही थी, लेकिन बाद में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाक़ात के बाद उन्होंने अपना रुख वापस ले लिया। उन्होंने निंदा प्रस्ताव लाने के पीछे का कारण कटारिया द्वारा भगवान राम के कथित अपमान के अलावा महाराणा प्रताप पर उनकी टिप्पणी को भी बताया था। उन्होंने कुछ महीने पहले राजसमंद में उपचुनाव को लेकर एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था, 'हमारे पूर्वज 1000 साल तक लड़े हैं। यह महाराणा प्रताप अभी गया ना। उसे क्या पागल कुत्ते ने काटा था जो अपनी राजधानी और अपना घर छोड़कर डूंगर-डूंगर रोता फिरा।'

तब महाराणा प्रताप पर कटारिया के उस बयान पर जबरदस्त विवाद हुआ था। बीजेपी महाराणा प्रताप को भी आदर्श रूप से पेश करती रही है। बीजेपी महाराणा प्रताप को देश का गौरव बताती रही है और इस वजह से बीजेपी समर्थकों ने ही जबरदस्त प्रतिक्रिया दी थी।

राजपूत समाज ने उनके उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन आलोचनाओं के बाद कटारिया को माफी मांगनी पड़ी थी और तब उन्होंने कहा था कि महाराणा प्रताप को लेकर उनके द्वारा दिए गए बयान को काट छांट कर पेश किया गया। 

बीजेपी विधायक मेघवाल ने कटारिया पर दूसरी जिस वजह से आपत्ति जताई वह है कटारिया और बीजेपी नेता किरण माहेश्वरी में रही अंतर्कलह। पिछले साल ही किरण माहेश्वरी का निधन हुआ था और इसके बाद खाली हुई सीट के लिए इस साल उपचुनाव हुए। 

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मेघवाल ने चिट्ठी में कहा है, 'किरणजी की बेटी दीप्ति राजसमंद की टिकट की दौड़ में थीं और कटारिया जी ने उनका हर तरह से विरोध किया, लेकिन इसके बावजूद दीप्ति को टिकट दिया गया। कटारियाजी ने दीप्ति को हराने की साज़िश रची और उसका एक हिस्सा उनके भाषण में महाराणा प्रताप के ख़िलाफ़ अपमानजनक वाक्य था।' उन्होंने आरोप लगाया कि हालाँकि दीप्ति जीत गईं, लेकिन कटारिया की वजह से जीत का अंतर कम हो गया। 

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मेघवाल ने कटारिया पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए। उन्होंने अपने पत्र में आरोप लगाया, 'उनके संरक्षण में पार्टी पदों और टिकटों के वितरण में लाखों-करोड़ों रुपये की हेराफेरी की जाती है। राजनीतिक गलियारों में और जनता में इस बात की चर्चा हो रही है कि विधानसभा में जनता की समस्याओं और उनके कल्याण के मामलों से संबंधित मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में विपक्ष कैसे असफल हो रहा है।'

इन आरोपों और निंदा प्रस्ताव पर गुलाब चंद कटारिया ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा। उन्होंने इतना ही कहा है कि पार्टी नेतृत्व जो तय करेगा वह उसे स्वीकार करेंगे।

इन्हीं घटनाक्रमों के बीच मेघवाल से बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्य में पार्टी के इंचार्ज अरुण सिंह बुधवार को मिले। इसके बाद मेघवाल ने निंदा प्रस्ताव का अपना फ़ैसला वापस ले लिया। अरुण सिंह ने कहा है कि कोई भी इस तरह का बयान पार्टी को नुक़सान पहुँचाएगा और पार्टी सर्वोपरि है। वैसे, फ़िलहाल तो यह मामला शांत हो गया लगता है, लेकिन पार्टी में अंदरुनी क़लह तो सामने आ ही गई है। ऐसी क़लह वसुंधरा राजे गुट को लेकर पहले भी सामने आती रही है। मेघवाल वसुंधरा गुट की ही मानी जाती हैं। सवाल है कि क्या यह क़लह इतना आसानी से ख़त्म हो जाएगा?
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