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भाई, ये लोकल-वोकल क्या है?

आज तोताराम अपनी नारायण दत्त तिवारी की तरह 'उम्र की सीमा' को भुलाकर नितांत अप्रत्याशित रूप से युवा हुआ जा रहा था। फटी हुई जींस, छज्जा पीछे की तरफ़ रखते हुए उलटी करके लगाई गई टोपी, धूप का चश्मा, 'क्रुद्ध हनुमाना' छपी टी- शर्ट, बिना मोजों के पहने रंग-बिरंगे जूते।आते ही सीढ़ियों की बजाय सामने से उछलकर बरामदे पर चढ़ा और कमर मटकाकर जोर-जोर से गाने लगा - ईलू-ईलू क्या है?

पहले तो हम ध्यान से देखते रहे कि यह प्राणी तोताराम ही है या कोई और? जब कन्फ़र्म हो गया तो उसके प्रश्न का विस्तृत उत्तर दिया। हे बुढ़ापे में युवावस्था की बीमारी से ग्रसित प्राणी, यह 'ईलू-ईलू' एक ऐसी बीमारी है जो प्रायः युवावस्था में होती है किन्तु घर-परिवार वालों का कोई नियंत्रण न हो तो बड़ी उम्र में भी हो सकती है। वैसे तो इसका इलाज़ तभी हो जाता है जब माँ-बाप जेब ख़र्च देना बंद कर देते हैं और सिर पर दो रोटी जुटाने का भार आ पड़ता है। वैसे, यह 1991 में बनी, सुभाष घई द्वारा निर्देशित  'सौदागर' नाम की एक फ़िल्म का गीत है जिसे आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में कविता कृष्णामूर्ति, पंकज उदास नहीं उधास, और सुखविंदर सिंह ने गाया है। भारत में आर्थिक सुधार और उदारीकरण के प्रारंभिक समय में आया यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसमें जो मुख्य ध्वनि  'ईलू' है वह 'आई लव यू' का संक्षिप्त रूप है जैसे आजकल बच्चे पूरा शब्द लिखने की बजाय 'आर' माने 'हैं' को केवल 'R' या 'बॉय फ्रेंड' को केवल 'BF' से काम चला लेते हैं। समय और शक्ति की बचत।

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चश्मा ऊँचा करके माथे पर चढ़ाते हुए बोला - याह, जैसे 'प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना' को रोमन में लिखते हुए 'PRADHAN MANTRI JAN AROGY YOJANA' के सभी प्रथमाक्षरों को ले कर एक संक्षिप्त शब्द 'PM-JAY' बना।

हमने भी टी वी सीरियल 'भाभी जी घर पर हैं' की भोली भाली नायिका की तरह कहा  - ‘सही पकड़े हैं’।

बोला - पहले तो यह समझ ले कि मैंने तुझसे इसका मतलब नहीं पूछा है। दूसरे ऐसे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता। ये शब्द एक कान से सुनकर दूसरे से निकालने के लिए होते हैं। ये शब्द किसी आत्ममुग्ध व्यक्ति के प्रलाप की तरह होते हैं। मेरा इस समस्या से कोई संबंध नहीं है। मैं तो बस, एक नए गीत की धुन बना रहा था और तूने उसका आनंद लेने की बजाय, फ़िल्मों के विश्वकोष जयप्रकाश जी चौकसे जी की तरह पूरा इतिहास ही सुना दिया। आजकल आम खाने के बारे में इंटरव्यू में आम का इतिहास, उसकी फ़सल उगाने और विक्रय-व्यवस्था के बारे में पूछने-बताने का समय नहीं होता।

हमने पीछा छुड़ाने के अंदाज़ में कहा - लेकिन आज तेरी कमर को क्या हो गया जो भारत की विदेश नीति की तरह लचक-मचक हो रही है? कहीं योग-दिवस के उपलक्ष्य में कोई नया 'कमरतोड़ आसन' तो नहीं ईजाद किया है।

बोला - मुझे दुनिया-जहान से क्या लेना? इसके लिए मोदी जी अकेले ही पर्याप्त हैं। मैं तो एक गाने की धुन बनाने की प्रक्रिया में खोया हुआ था।

हमने पूछा - किस फ़िल्मवाले का दिनमान उल्टा आ गया जो तुझसे गाने की धुन बनवा रहा है। तुझसे राष्ट्रगान तो ढंग से गया नहीं जाता और चला है गाने की धुन बनाने! वैसे गीत लिखा किसने है?

बोला - हैं,  मोदी जी के कुछ शब्द।

हमने कहा - उनका तो एक शब्द ही बहुत है। हज़ारों व्यंजनाएँ निकलती हैं उनके एक-एक शब्द से। वे तो बोलते क्या हैं, बस मन्त्र रचते हैं। एक-एक शब्द हज़ारों व्याख्याओं की माँग करता है। देखा नहीं, एक नारा दिया - 'स्वच्छ भारत : स्वस्थ भारत'। और दुनिया बावळी हुई डोल रही है। प्रसून जोशी 'स्वच्छता का त्यौहार लिख रहे हैं, हिमेश रेशमिया निर्गुण-निर्गुण अनहद हुए जा रहे हैं। देश के महानायक द्वारा गाया गया गीत 'दरवाज़ा बंद' सुनते-सुनते देश तालाबंदी, घरबंदी और विधायकों की बाड़ाबंदी तक पहुँच गया। वैसे, 'बाई द वे' आज किस ऋचा पर कमर मटका रहा है?

बोला - आज तो देश को 'आत्मनिर्भर' बनाने के लिए दिए गए अनुप्रासात्मक शब्द द्वय 'लोकल-वोकल' की धुन बना रहा हूँ। 

हमने कहा- लेकिन हमें फिर 'ईलू-ईलू क्या है' क्यों सुनाई दे रहा है? कोरोना में स्वाद शक्ति नष्ट हो जाती है, लगता है हमारी श्रवण शक्ति नष्ट हो गई है। दूसरे मोदी जी के मन्त्रों के प्रसंग-सन्दर्भ में यह 'ईलू-ईलू' हमें बहुत विचित्र, काबिल-ए-ऐतराज़ और दंडनीय लग रहा है। वे तो फकीर हैं, उनका इस ईलू-ईलू से क्या संबंध हो सकता है? 

ऐसा उल्टा सीधा संदर्भ बैठाएगा तो SCROLL.IN की पत्रकार सुप्रिया शर्मा की तरह तुझ पर भी देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज हो जाएगा जिसने लॉकडाउन में प्रधानमंत्री द्वारा गोद लिए गाँव डोमरी में भूख से प्रभावित लोगों की रिपोर्टिंग की थी।

बोला - मोदी जी को इन छोटे-मोटे कामों के लिए कहाँ फुर्सत है? यह तो वहाँ की माला देवी ने केस किया है जिनसे सुप्रिया ने इंटरव्यू किया था। यह केस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा डालने के लिए थोड़े ही है। इस समय अपने देश में लोकतंत्र, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हैं। रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया है कि लॉकडाउन के दौरान संक्रमण फैलाने के लिए ग़ैर ज़िम्मेदार तरीक़े से इंटरव्यू लिया गया। अब देखो, देश-समाज के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी क्या अपराध हो गया?

वैसे, हम भी इस शालीन और अनुशासित देश भारत के बुज़ुर्ग और सभ्य नागरिक हैं और फिर हिंदी के अध्यापक भी। हम कैसे ऐसा अशोभनीय काम कर सकते हैं? मैं तो मोदी जी के मन्त्र 'लोकल-वोकल' और 'ईलू-ईलू' के मात्रा साम्य के आधार पर 'ईलू-ईलू' गाने की थोड़ी-सी कॉपी मारकर धुन सेट कर रहा था। सभी महान संगीतकार और नेता ऐसा ही करते हैं। देख नहीं रहे, लोग नेहरू को गाली निकालते हैं लेकिन दिल में वही नेहरू जी बनने की लालसा पाले हुए हैं।

हमने बात सीमित करने के उद्देश्य से कहा- चल, अब पहले 'ईलू-ईलू' और 'लोकल-वोकल' की समानता के बारे में बता।

बोला - जैसे 'ईलू-ईलू' बहुत सार्थक शब्द हैं वैसे ही 'लोकल-वोकल' भी बहुत सार्थक और व्यंजक शब्द हैं। कुछ अल्पमति लोग इसे 'चाय-शाय', 'काम-धाम', 'रोटी-शोटी' की तरह निरर्थक ध्वन्यात्मकता समझ लेते हैं। यह ऐसा नहीं है। लोकल का मतलब है स्थानीय और वोकल का मतलब है - मुखर होना। मतलब स्थानीय उत्पादों की बात करें, चर्चा करें जिससे उनका प्रचार हो और देश आत्मनिर्भर बने।

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हमने कहा- तोताराम, हमने तो इस देश में यही देखा है कि लोग केवल 'वोकल' होकर ही काम चलाना चाहते हैं। वास्तव में 'फोकल' नहीं होते। न बात पर कायम रहते हैं, न विचार पर और न ही काम पर। करना-धरना कुछ नहीं बस, बातें बनाते हैं। जब 'मन की बात'  चली तो छुटभैय्ये नेता टीवी या रेडियो पर मोदी जी के 'मन की बात' सुनते हुए अपना फ़ोटो अख़बारों में छपवाने लगे। पहले चीनी मंझे से पक्षियों और लोगों को घायल होने के सामाजिक सरोकार का नाटक करते हुए मंझे की दो-चार चरखियाँ बरामद करके समाचार छपवाते थे। अब वे ही दुकानदार मोदी जी के 'लोकल के लिए वोकल 'और चीन के ख़िलाफ़ देशभक्ति दिखाने के लिए, अगले चुनाव में पार्टी का टिकट कबाड़ने की आशा में पुराना टीवी और बेकार हो चुके कोई मोबाइल सड़क पर तोड़ते हुए फ़ोटो खिंचवा रहे हैं। सफ़ाई वाले गली-गली - स्वच्छता का देश में त्यौहार करना है, वाले केसेट बजाकर इतिश्री समझ लेते हैं। सफ़ाई की वही दुर्गति और बेढंगी चाल कायम है जो तीन लाख करोड़ का बजट घोषित होने से पहले थी। फिर भी चल, गाने की धुन की बात कर।

बोला - जब तू बोलने देगा तभी तो बताऊँगा। तुझे तो अपनी वैचारिक गैस मुझ पर लीक करनी है। और वह भी अप्रासंगिक। धुन की बात यह है कि 'लोकल-वोकल' में चार-चार मात्राएँ हैं। वैसे ही 'ईलू - ईलू' में भी चार-चार मात्राएँ हैं। अगर गीत को आगे बढ़ाएँ-

'ये लोकल-वोकल क्या है' 

'ये ईलू-ईलू क्या क्या है?

इसी तरह 'आई लव यू' में भी 'लोकल-वोकल' की तरह फिर आठ-आठ मात्राएँ हैं।

हमने कहा - वाह, तोताराम हमने तो ध्यान ही नहीं दिया।

बोला - तेरी तालियाँ तो अब उठेंगी जब तुझे पता चलेगा कि 'आई लव यू' का लोकल-वोकल' से भी घनिष्ठ संबंध है। शायद इसी के आधार पर मोदी जी ने ट्रंप का दिल जीत लिया था।  

'आई लव यू' गीत 1982 में आई खुद्दार फ़िल्म का है जिसमें राजेश रोशन के संगीत में मज़रूह सुल्तानपुरी के गीत को लता और किशोर ने गाया था। इस गीत में नायक जो इस सदी ही क्या, सहस्राब्दी का भी महानायक हैं, नायिका की सुविधा के लिए 'आई लव यू' का भारत की कई भाषाओं में अनुवाद करता है जैसे मोदी जी ने ह्यूस्टन में भारत मूल के लोगों के ख़र्चे पर किए गए आयोजन 'हाउडी मोडी' में ट्रंप को अंग्रेज़ी सहित गुजराती, हिंदी, बांग्ला आदि दस भारतीय भाषाओं में समझाया था कि 'आल इज वेल', 'मज़ा छे'।

हो सकता है अब कोई प्रसून जोशी 'लोकल वोकल' का भी दस बीस भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते हुए कोई शाश्वत और कालजयी गीत लिख दे। 

हमने कहा- तो फिर तोताराम, किसी और को बताने से पहले तू इस धुन और आइडिया का अपने नाम से रजिस्ट्रेशन ज़रूर करवा ले। आजकल बड़े लोगों के आइडियों की बहुत चोरी हो रही है। 

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रमेश जोशी

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