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क्या वाक़ई मोदी की ‘गुडबुक’ से बाहर हो गई हैं सुमित्रा महाजन!

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘गुडबुक’ से लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष और इंदौर की आठ बार की सांसद सुमित्रा महाजन ‘ताई’ पूरी तरह से बाहर हो गई हैं? यह सवाल ताई के समर्थक कर रहे हैं। हालाँकि ऑन रिकॉर्ड कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है- लेकिन ऑफ़ द रिकॉर्ड वह ‘मान’ रहे हैं कि ताई के पॉलीटिकल करियर पर पूरी तरह से ब्रेक ‘लग’ गया है। ताई के राजनीतिक करियर के ‘ख़त्म’ संबंधी खुसर-पुसर लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी चयन के आख़िर दौर में टिकट कटने के साथ ही शुरू हो गई थी। ऐसा माना जा रहा था कि टिकट काटे जाने की ‘भरपाई’- ताई के लंबे राजनीतिक जीवन और सक्रियता के मद्देनज़र बीजेपी ज़रूर करेगी। यानी उन्हें कोई पद दिए जाने के कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन अब तक ऐसा नहीं होता दिख रहा है। 

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दरअसल, शनिवार को आयी राज्यपालों की सूची में ताई का नाम नहीं था। यह उनके समर्थकों और अनुयायियों को साल रहा है। पहले यह ख़बरें थीं कि ताई को महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया जा सकता है। पहले कहा जा रहा था कि मौजूदा राज्यपाल सी.वी. राव को अन्य राज्य में स्थानांतरित कर दिया जायेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। हालाँकि, अभी कई सूबों के राज्यपालों की नियुक्तियाँ और होनी हैं क्योंकि कई महामहिम जल्दी रिटायर होने वाले हैं। इसके चलते समर्थकों और ख़ुद ताई ने भी उम्मीद नहीं छोड़ी है।

अलबत्ता, कई समर्थक और अनुयायी इन संभावनाओं को लेकर चिंतित और भयभीत हो रहे हैं कि अगली सूची में भी कहीं ताई के साथ ‘गेम’ ना हो जाए। इनकी चिंताओं के कई महत्वपूर्ण ‘कारण’ भी हैं। वे इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने की संभावनाओं के ठीक पहले ताई द्वारा चुनाव नहीं लड़ने को लेकर लिखा गया ‘खुला ख़त’ तो आड़े नहीं आ रहा है? बता दें कि यह ख़त किसी को भी संबोधित नहीं था। इस ख़त में पार्टी के कथित ढुलमुल रवैये पर ताई जमकर बरसीं थीं। ताई के इस ख़त पर बीजेपी के रणनीतिकारों की जमकर थू-थू हुई थी।

समर्थकों की चिंता 

समर्थकों की एक चिंता यह भी है कि दिल्ली में बैठे ‘भाई’ (बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और इंदौर की राजनीति के ‘मास्टर-ब्लास्टर’ कैलाश विजयवर्गीय) तो पेंचबाज़ी नहीं कर रहे हैं? विजयवर्गीय, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बेहद विश्वासपात्रों में गिने जाते हैं। शाह देश के गृह मंत्री भी हैं। राज्यपालों की नियुक्तियों में इसी महकमे का सबसे अहम रोल होता है।

ताई के समर्थकों को संदेह इसलिए भी है क्योंकि दूसरे दलों से आए लोगों को भी राज्यपाल बनाया गया है। राज्यपालों की नियुक्ति की पहली सूची में फागू सिंह चौहान को बिहार का राज्यपाल बनाया गया है। बीजेपी में आने के पहले वे बहुजन समाज पार्टी में हुआ करते थे। इसी तरह जगदीप धनकड़ भी बीजेपी में आने के पूर्व जनता दल और कांग्रेस में रहे हैं। धनकड़ को पश्चिम बंगाल का गवर्नर बनाया गया है।

प्लस 75 फ़ॉर्मूला आड़े नहीं आता

ताई का टिकट बीजेपी के कथित 75 प्लस ‘फ़ॉर्मूले’ के तहत कटा था। राज्यपाल के लिए ‘आयु सीमा’ आड़े आने की स्थिति ताई को लेकर अभी नहीं है। वह अभी 76 वर्ष की हैं। मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश स्थानांतरित की गईं राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की आयु 77 साल है, जबकि बिहार से मध्य प्रदेश स्थानांतरित किए गए लालजी टंडन 84 बरस के हैं।

दिलचस्प यह है कि राम नाईक उत्तर प्रदेश में गवर्नर पद से 85 साल की आयु में रिटायर हुए हैं, जबकि पद्मनाथ आचार्य 87, केसरी नाथ त्रिपाठी 84 और कप्तान सिंह सोलंकी (मध्य प्रदेश से ही आते हैं) 80 साल की उम्र में राज्यपाल पदों से सेवानिवृत्त हुए हैं। ताई समर्थक और अनुयायी ऐसा मानते हैं कि इस लिहाज़ से ताई भी राज्यपाल बनने की ‘पूर्ण अहर्ता’ रखती हैं।

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आठ बार सांसद रहीं

ताई महाराष्ट्र से आती हैं। मध्य प्रदेश में उन्होंने अपना राजनीतिक करियर बनाया। वे इंदौर में बहू बनकर आयीं और यहाँ बेटी के मानिंद लोगों के दिलों में स्थान बनाया। वरिष्ठ होते ही- वे सभी की ताई हो गईं। पार्षद से लेकर उपमहापौर और विधायक एवं सांसद वे रहीं। सांसद भी एक बार नहीं, लगातार आठ बार।

5 राज्यपालों के रिटायर होने का इंतज़ार

अगले दो महीनों में पाँच राज्यपाल रिटायर होने वाले हैं। जो राज्यपाल अपना कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं, उनमें मृदुला सिन्हा (गोवा), वजुभाई (कनार्टक), कल्याण सिंह (राजस्थान), पी. सदाशिवम (केरल) और सी.वी. राव (महाराष्ट्र) शामिल हैं। तो क्या इस बार ताई का नंबर आएगा?

उम्मीद बाक़ी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ताई के राजनीतिक रिश्ते मधुर रहे हैं। अनेक अवसरों पर मोदी ने ताई की खुले मन से सार्वजनिक मंचों पर प्रशंसा की है। लोकसभा अध्यक्ष के पद से विदाई के वक़्त भी नरेंद्र मोदी ने ताई के शान में ख़ूब कसीदे काढ़े थे। इन समीकरणों के मान से स्वयं ताई, और उनके समर्थक आशाओं से भरे रहे। आज भी इन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है।

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संजीव श्रीवास्तव

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