loader

कोर्ट के दिशा-निर्देश, तोड़फोड़ करने वालों से हो संपत्ति को हुए नुक़सान की भरपाई

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आन्दोलन में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया जा रहा है। उच्चतम न्यायालय ने अप्रैल, 2009 में अपने एक फ़ैसले में कहा था कि सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति को क़ैद की सजा के साथ ही अदालत को घटना के दिन क्षतिग्रस्त हुई संपत्ति के बाज़ार मूल्य के बराबर की राशि का जुर्माना भी दोषी पर लगाना चाहिए। जुर्माना अदा नहीं करने पर ऐसे व्यक्ति को अतिरिक्त क़ैद की सजा दी जानी चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पुलिस और प्रशासन तमाम घटनाओं की वीडियोग्राफ़ी के आधार पर ही आरोपियों की पहचान करते हैं। आन्दोलन, हड़ताल और बंद आदि के दौरान तोड़फोड़ और आगजनी आदि की गतिविधियों में लिप्त तत्वों की पहचान कर यदि उन्हें सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हुए नुक़सान की भरपाई के लिए बाध्य किया जाता है तो निश्चित ही इससे न सिर्फ सार्वजनिक और निजी संपत्ति को समुचित संरक्षण प्राप्त होगा बल्कि लोकतांत्रिक तरीक़े से होने वाले विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की घटनाओं पर भी अंकुश लगाने में सफलता मिलेगी। 

ताज़ा ख़बरें

इस मामले में अदालत के दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं। साफ़ कहा गया है कि आन्दोलन की वजह से बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान होने की स्थिति में संबंधित उच्च न्यायालय स्वतः ही इनका संज्ञान लेते हुए नुक़सान की जांच कराने और मुआवजा दिलाने की दिशा में कार्रवाई करें। परंतु, अगर इस तरह की घटनाएं एक से अधिक राज्यों में होती हैं तो उच्चतम न्यायालय इसमें कार्रवाई कर सकता है।

दिशा-निर्देशों में यह भी कहा गया है कि उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय क्षतिग्रस्त हुई संपत्ति का अनुमान लगाने तथा इसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए उच्च न्यायालय के पीठासीन या सेवानिवृत्त न्यायाधीश या पीठासीन अथवा सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश को क्लेम कमिश्नर नियुक्त करेगा।

क्लेम कमिश्नर और उनकी मदद के लिए नियुक्त आकलनकर्ता जनता से नुक़सान से संबंधित वीडियो या दूसरी तरह की रिकार्डिंग हासिल करेंगे ताकि नुक़सान और नुक़सान करने वालों के बीच संबंध साबित किया जा सके। एक बार इस तरह का संबंध साबित होने के बाद इस अपराध को करने वाले तथा आन्दोलन या हड़ताल के आयोजकों को नुक़सान की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी जो वास्तविक नुक़सान की कीमत से दुगुनी भी हो सकती है।

न्यायालय ने आन्दोलन, बंद  और हड़ताल आदि के दौरान बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाये जाने की घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेते हुए 12 साल पहले जून, 2007 में इस पर कार्यवाही शुरू की थी। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन न्याय मित्र की भूमिका में थे। 

इसी तरह, न्यायालय ने ऐसे मामलों से जुड़े क़ानून के प्रावधानों पर विचार कर इसमें सुधार के बारे में सुझाव देने के लिए शीर्ष अदालत के ही पूर्व न्यायाधीश के.टी. थॉमस की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। जबकि ऐसे आन्दोलनों के दौरान हिंसा और मीडिया की भूमिका के बारे में न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता एफ़.एस. नरीमन की अध्यक्षता में एक अन्य समिति गठित की थी।  

इन दोनों ही समितियों ने रिपोर्ट न्यायालय को दी थी। न्यायमूर्ति थॉमस समिति ने क़ानून में संशोधन करके इसमें आन्दोलन के दौरान सीधी कार्रवाई का आह्वान करने वाले संगठन के नेताओं को अपराध के लिए उकसाने का दोषी ठहराने का प्रावधान करने की भी सिफारिश की थी।

संभव है कि समाज का एक वर्ग इस तरह की सख़्त कार्रवाई से सहमत नहीं हो। हो सकता है कि इस तरह की कार्रवाई से असहमति व्यक्त करते हुए वर्तमान आन्दोलन की तुलना मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद छात्र आन्दोलन के दौरान हुई हिंसक घटनाओं से करने का प्रयास करें। 

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल के दौरान हुए आन्दोलन के बाद देश में राम मंदिर मुद्दे के साथ-साथ गुर्जर, जाट, मराठा और पटेल समुदाय को आरक्षण का लाभ देने के लिए भी आन्दोलन हुए जिनमें खूब तोड़फोड़ हुई। इन्हीं घटनाओं की वजह से न्यायालय को सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने वाले तत्वों की पहचान कर उनसे और उनके आयोजकों से इसकी क्षतिपूर्ति कराने का आदेश देना पड़ा था।

विचार से और ख़बरें

नवंबर, 2017 में न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित की पीठ के समक्ष अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने स्वीकार किया था कि आन्दोलन और हड़ताल आदि के बारे में दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाती है जिससे शांतिपूर्ण आन्दोलन हिंसक हो जाता है और इसमें जान-माल का नुक़सान होता है। कई बार पुलिस की मदद के लिए केन्द्रीय सुरक्षा बलों को भी तैनात किया जाता है। 

अटार्नी जनरल ने स्वीकार किया था कि ऐसी स्थितियों से निबटने के लिए एहतियाती क़दम उठाने में विफल रहने वाले प्राधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के साथ ही दोषी को दंडित करने और पीड़ित को मुआवजा दिलाने के लिए समुचित मशीनरी की ज़रूरत है। 

सत्य हिन्दी ऐप डाउनलोड करें

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
अनूप भटनागर

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें