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जो सरकार बार बार पीड़ा देती है, उसे हटा देना चाहिए! 

परपीड़ा की राजनीति फल देती है। वह निष्क्रिय पीड़कों के समाज का निर्माण करती है। वह पीड़ा की वैधता भी स्थापित करती है। एक हिस्से को पीड़ित होते रहना होगा जिससे एक बड़े समुदाय को आनंद मिल सके। एक छोटी अवधि तक पीड़ित होना होगा, जिससे चिरकाल का सुख मिल सके। जो पीड़ा की शिकायत करता है, उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है।
अपूर्वानंद

कल रात से एक वीडियो तेज़ी से घूम रहा है। त्रिपुरा के एक विवाह समारोह का है। एक उत्साही प्रशासनिक अधिकारी विवाह स्थल पर पहुँच कर रुखाई से सबको विवाह स्थल से हाँक कर बाहर निकाल रहा है। त्रिपुरा में कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए बड़े जमावड़े पर पाबंदी है। अधिकारी सरकार के आदेश का पालन कर रहा है। स्वर में अनुरोध नहीं है, आदेश है। भारत के किसी भी प्रकार के शक्तियुक्त अभिजन का सहजगुण! तरीके की आलोचना करें लेकिन वह बेचारा तो संक्रमण रोकने के लिए जारी सरकारी आदेश को लागू कर रहा था।

वीडियो जारी होते ही भीषण प्रतिक्रिया हुई। विवाह जैसे पवित्र संस्कार को इस प्रकार भंग करने की धृष्टता करने की हिम्मत इस अधिकारी की हुई कैसे? ख़बर मिली कि उसे निलम्बित कर दिया गया। इतना ही नहीं एक दूसरे वीडियो में वह माफी माँगता हुआ भी दिख रहा है।

विवाह जैसे संस्कार के अनुष्ठान को भंग करना भारत में, कम से कम हिंदुओं के प्रसंग में, पाप से कम नहीं।

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विवाह में विघ्न!

यह देख कर मुझे साढ़े चार साल पुराना एक वीडियो याद आ गया। भारत का नहीं, जापान के एक आयोजन का। प्रसंग विवाह का ही है। 'घर में शादी है, पैसे नहीं...' अंगूठा नचाते हुए वक्ता कहता है। ठीक शादी के वक़्त परिवार के हाथ से पैसा खींचकर उसे भौंचक्का देखकर जो खल-उल्लास इस मुद्रा में है, उसका जोड़ मुश्किल है। श्रोता ठहाका लगाते हैं। 

विवाह में विघ्न पैदा करके आनंद लेनेवाला व्यक्ति भारत का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी है। भारत का प्रधान मंत्री। वह अपने श्रोताओं के सामने अपने कारनामे की डींग हांक रहा है। नोटबंदी करके उसने सबके हाथ से पैसा खींच लिया। शादी का शामियाना लगा है और अचानक परिवार पाता है कि उसके हाथ में नकदी है ही नहीं। इसे देखकर एक ताली पीट रहा है, अंगूठा दिखा रहा है। बाकी ठहाका मार रहे हैं।

छोटे अधिकारी ने विवाह में विघ्न उपस्थित किया, सबने भर्त्सना की। वह निलंबित हुआ। सबसे बड़े अधिकारी ने वही किया, उसकी जनता ने करतल ध्वनि से उसका अनुमोदन किया और दुबारा सरकार बनाने का जनादेश देकर पुरस्कृत किया।

परपीड़ा से सुख

पाठक कह सकते हैं कि दोनों एक जैसी घटनाएं नहीं हैं। दोनों अधिकारियों का कद भी एक नहीं है। लेकिन इस तुलना का उद्देश्य ही है यह समझना कि एक विघ्न ने क्यों जनमन में वितृष्णा उत्पन्न की, दूसरे ने आनंद। वह कौन सा मन है जो वृहद् स्तर पर परपीड़ा से सुखी होता है? क्या इसी मनोविज्ञान को समझकर वह बड़ा अधिकारी निरंतर बड़ी आबादी को पीड़ित कर रहा है जिससे शेष जन उससे आनंद उठा सकें?

परपीड़ा से बढ़कर पाप नही। यह तो राम कथा के सबसे बड़े गायक तुलसीदास ने लिखा था, परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई।” परपीड़ा देना ही अधम कार्य है। फिर उसमें आनंद लेना? वह किस किस्म का आदमी होगा जो यह कहे कि पैसा हाथ में नहीं रहने दिया। लोगों ने भले गंगाजी में डाल दिया, कुछ पुण्य तो होगा, लेकिन हाथ में पैसा रखने की हिम्मत नहीं किसी को। फिर ठहाका लगता है।

यह सब कुछ भारत से दूर देश जापान में किया जा रहा है

भारत के लोगों को नोटबंदी से जो भीषण कष्ट हुआ उसे अपने श्रोताओं के लिए मज़े का सामान बना देनेवाले को किस श्रेणी में डालेंगे? तुलसी दास के अनुसार? और जो भारतवासियों को पीड़ा में देख मुदित हो रहे थे, वे किस दर्जे के लोग थे?

परपीड़ा की राजनीति

परपीड़ा की राजनीति फल देती है। वह निष्क्रिय पीड़कों के समाज का निर्माण करती है। वह पीड़ा की वैधता भी स्थापित करती है। एक हिस्से को पीड़ित होते रहना होगा जिससे एक बड़े समुदाय को आनंद मिल सके। एक छोटी अवधि तक पीड़ित होना होगा, जिससे चिरकाल का सुख मिल सके। जो पीड़ा की शिकायत करता है, उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है।

पीड़ा धारावाहिक होनी चाहिए, जिससे वह स्वाभाविक हो जाए। तो नवंबर, 2016 की नोटबंदी के साथ देशव्यापी समरूपी कर विधान, जीएसटी से छोटे व्यापारियों को हुई पीड़ा से बाकी समुदाय को अपार आनंद मिला। व्यापारियों को ठिकाने लगाया जा रहा था। उनसे अधिक बेईमान कौन हो सकता है? नेता से जनता सहमत हुई: करचोरों को निशानदेही हो रही थी। दर्शक जनता ताली बजा रही थी।

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डिटेंशन कैंप

सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में असम में पूरे असमिया समाज को ही नागरिकता के रजिस्टर में नाम दाखिल कराने के प्रक्रिया में डाल दिया गया। सैकड़ों लोग अनागरिक घोषित होकर डिटेंशन कैम्पों में डाल दिए गए। अपने कागज़ लेकर खुद को नागरिक घोषित करवाने धक्के खाते, सड़क दुर्घटना में घायल होते, मारे जाते, विक्षिप्त होते एक आबादी को देखकर तालियाँ बजती रहीं।

तकलीफों का सिलसिला। हर तकलीफ़जदा एक दूसरे से जुदा। लेकिन पीड़ा, परपीड़ा किस तरह हमारे सामाजिक मन को प्रभावित करती है, या बदल देती है, यह मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केंद्र में समझ में आया। एक संभ्रांत बुजुर्ग दवा लेने के लिए कतार में थे। उनके करीब एक छात्रा भी थी। केंद्र सरकार ने नागरिकता का नया कानून पारित करवाया था।

पूरे देश में मुसलमान इसका विरोध कर रहे थे। क्योंकि इसमें नागरिकता की योग्यता से मुसलमान पहचान को वंचित आकर दिया गया था। छात्र अलग-अलग जगह इस क़ानून के ख़िलाफ़ आन्दोलन में शामिल थे। बुजुर्गवार को छात्रों की इस आंदोलन में शिरकत नागवार गुजर रही थी, यह उनकी छात्रा से हो रही बातचीत को अनचाहे सुनते मैंने महसूस किया। वे आंदोलनकारी छात्रों को मूर्ख या गुमराह बता रहे थे। जामिया और अलीगढ मुसलिम विश्विद्यालय के छात्रों पर पुलिस जुल्म राष्ट्रीय समाचार था।

मैंने जब उनसे जानना चाहा कि वे क्यों छात्रों को बेवकूफ समझते हैं तो यकायक उनका तेवर बदल गया। 'जो कश्मीर के साथ किया गया, इस पूरे देश के साथ करने पर ही यह दुरुस्त होगा।' शब्द ठीक ये नहीं थे, लकिन मतलब यही था। मैं अवाक रह गया। वे पूरे देश को वैसे ही सबक सिखलाना चाहते थे, जैसे कश्मीर को सिखलाया गया! पूरे देश की छाती पर फौजी बूट!

पीड़ा का अभ्यास समाज को कराना पड़ता है। कोरोना वायरस ने इस पीड़ा के धारावाहिक को जारी रखने का एक बहाना दिया। कोई चार घंटे की नोटिस पर देश की तालाबंदी की घोषणा का अर्थ क्या है, यह तब मालूम हुआ जब झुण्ड के झुण्ड श्रमिक सडकों पर निकल आए।

पीड़ा का महोत्सव

पैदल चलते, पुलिस के डंडे खाते, रास्ते पर गिर कर दम तोड़ते और रेलवे की पटरी पर थककर नींद में डूबे ट्रेन के नीचे कटते हुए लोगों के दृश्य। यह पीड़ा का महोत्सव था। यह पीड़ा भी क्षणिक थी, आवश्यक थी। कुछ की बलि बाकी को बचाने के लिए उचित थी। क्या हुआ कि कुछ हजार ज़िंदगियां तबाह हो गईं, देश तो बच गया था! 

लेकिन अगर पीड़ा देना उचित है, तो उसी तर्क से पीड़ा सहना भी अनिवार्य हो जाता है। जिसने आपको परपीड़ा की क्रीड़ा में शामिल किया है, दीक्षित किया है, वह आपसे कहता है कि क्या तुम खुद इस पीड़ा की परीक्षा न दोगे? और हम हक्का बक्का रह जाते हैं।

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सार्वभौम यंत्रणा

जो पीड़ा पहले मुसलमानों की थी, व्यापारियों की थी, ‘भ्रष्टाचारियों’, श्रमिकों की थी वह अब सार्वभौम यंत्रणा में बदल गई है। लेकिन नेता के चेहरे पर इस पीड़ा से अगर शिकन नहीं, तो उसकी जनता क्या इसकी शिकायत करके स्वयं को उसके अयोग्य साबित करेगी? कोई तो बड़ा कारण है कि वह इस पीड़ा से दुखी नहीं! वह कहता है हमारे धैर्य की परीक्षा हो रही है। जनता को यंत्रणा, पीड़ा की इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही होगा, वरना उसका शिक्षक अपमानित होगा। क्या जनता खुद को फेल करेगी?

यह सब कहने का मतलब यह नहीं कि अब जो हो रहा है, वह ठीक है। जिसने दूसरे की पीड़ा में आनंद लिया वह अब उसका मज़ा चखे, यह कहना मनुष्यता से एक दर्जा गिर जाना होगा। अभी जो हो रहा है, उससे यही समझा जा सकता है कि पीड़ा उचित नहीं है। किसी को दर्द सहने का उपदेश नहीं देना चाहिए। किसी अनंत के लिए इस भंगुर क्षण की बलि नहीं देनी चाहिए।

समाज को एक के बाद दूसरी यंत्रणा से गुजरना कतई ज़रूरी नहीं। सरकार ज़िंदगी को पेचीदा बनाने के लिए नहीं, उसे आसान बनाने के लिए बनाई जाती है। जो सरकार हमारी ज़िंदगी को एक के बाद एक पीड़ा देती है, उसे तुरत हटा दिया जाना चाहिए वरना पीड़ा का यह अभ्यास धीरे धीरे हमसे हमारी मनुष्यता का अभिमान छीन लेगा।

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