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दिल्ली चुनाव के नतीजे क्यों हैं अमित शाह के लिए ख़तरे की घंटी?

सबको पता है कि दिल्ली विधान सभा के इस चुनाव में बीजेपी के अभियान की कमान पूर्व अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह के हाथ में थी। चुनाव प्रचार के जितने भी तीर उनके पास थे सब चलाए गए। सत्तर सीटों वाली विधानसभा के लिए उन्होंने क़रीब पचास चुनावी सभाएँ कीं, रोड शो किया। घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया। चुनावी पर्चे बाँटे। तो आख़िर दिल्ली चुनाव के लिए उन्होंने इतनी कसरत क्यों की?
शेष नारायण सिंह

दिल्ली विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी ने भारी बहुमत से जीत लिया। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी, बीजेपी ने पूरी कोशिश की कि वह चुनाव में इस बार आम आदमी पार्टी को शिकस्त दे और सरकार बनाए लेकिन वह सपना अब कम से कम पाँच साल के लिए खिसक गया है। चुनाव में हुई बुरी हार की ज़िम्मेदारी दिल्ली प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने ले ली है। संभव है कि बलि के बकरे की तलाश अब यहीं रुक जाएगी।

मनोज तिवारी को अपनी कुर्बानी से दिल्ली की हार से लगी चोट पर मरहम लगाने की ड्यूटी तो दे दी गयी है लेकिन इस चुनाव में उनकी भूमिका बहुत ही मामूली थी। चुनाव अभियान का नेतृत्व हर स्तर पर गृह मंत्री अमित शाह कर रहे थे। अभियान के पूरे एक महीने के दौरान जब भी पार्टी के किसी नेता या प्रवक्ता से यह बात करने की कोशिश की गयी कि भाई, दिल्ली में ‘आप’ के जनहित के रिकॉर्ड के मद्देनज़र आपकी पार्टी चुनाव हार भी सकती है; ऐसी हालत में पार्टी के सबसे बड़े नेता को संभावित हार के कारण के रूप में पेश किए जाने का अवसर क्यों दे रहे हैं तो उनका जवाब एक ही होता था कि अव्वल तो हमारी जीत हो रही है और अगर एक प्रतिशत हार भी हुई तो हमारे यहाँ राष्ट्रीय नेतृत्व मज़बूत है और वह आगे से अभियान की अगुवाई करता है और उसका जो भी नतीजा हो स्वीकार करता है।

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सबको पता है कि दिल्ली विधान सभा के इस चुनाव में बीजेपी के अभियान की कमान पूर्व अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह के हाथ में थी। चुनाव प्रचार के जितने भी तीर उनके पास थे सब चलाए गए। पिछले छह वर्षों के राष्ट्रीय राजनीति के अपने दौर में अमित शाह ने कई महत्वपूर्ण बुलंदियाँ हासिल की हैं। 2014 के चुनाव में वह बीजेपी के महामंत्री थे और उत्तर प्रदेश के इंचार्ज थे। उनके चुनावी प्रबंधन को एक कुशल तकनीक के रूप में याद किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के उस चुनाव से भी ज़्यादा मेहनत से उन्होंने दिल्ली के चुनाव की अगुवाई की। सत्तर सीटों वाली विधानसभा के लिए उन्होंने क़रीब पचास चुनावी सभाएँ कीं, रोड शो किया। घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया। चुनावी पर्चे बाँटे। बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मोहल्लों में घूम-घूम कर प्रचार करने के लिए प्रेरित किया। पूर्व मुख्यमंत्रियों को प्रचार के काम में लगाया। केंद्रीय मंत्रियों को प्रचार में शामिल किया। 

पर हक़ीक़त यह है कि जो आठ विधायक जीते हैं उसमें पार्टी का कोई ख़ास योगदान नहीं है। विजेंद्र गुप्ता, ओम प्रकाश शर्मा, रामवीर विधूड़ी जैसे लोग निजी तौर पर भी बहुत ही प्रभावशाली लोग हैं। अमित शाह की नज़र से यह बात पता नहीं कैसे फिसल गयी और वे समझ नहीं पाए कि दिल्ली की जनता अपनी आर्थिक परेशानी, महँगाई, क़ानून-व्यवस्था की दुर्दशा, नगरपालिकाओं की ग़ैर-ज़िम्मेदारी आदि के लिए उनकी पार्टी के सांसदों और मंत्रियों को  ज़िम्मेदार मानती है और जब ये लोग रोज़ ही सामने दिखते थे तो उसका ग़ुस्सा और भी बढ़ जाता था। बीजेपी की नीतियों की असफलता और तज्जनित परेशानी के बरक्स आम आदमी पार्टी की  शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और यातायात की सुविधा वाले काम बहुत ही अच्छे लगने लगे थे।

केजरीवाल सरकार के काम के प्रति दिल्ली के लोगों के नज़रिये की यह सच्चाई दिल्ली की हवा में चारों तरफ़ थी लेकिन अमित शाह जैसे माहिर राजनेता की नज़र से कैसे बच गयी, इसपर अध्ययन किया जाना चाहिए।

दिल्ली विधानसभा में बीजेपी के चुनाव अभियान के तरीक़े में एक बदलाव भी देखा गया। 2013 से लेकर अब तक के सभी चुनावों में प्रधानमंत्री की मुख्य भूमिका हुआ करती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य प्रचारक रहा करते थे। पार्टी अध्यक्ष के रूप में अमित शाह की सहायक भूमिका होती थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। अमित शाह मुख्य प्रचारक, रणनीतिकार सब कुछ थे। उन्होंने ही चुनावी मुद्दे तय किये थे। शाहीन बाग़, अनुच्छेद 370, बिरयानी, पाकिस्तान, ‘हिन्दू ख़तरे में हैं’ आदि जैसे ही मुद्दे अब तक चुनावों में काम आते रहे थे। उनकी सफलता का कारण यह होता था कि कांग्रेस के प्रचार की अगुवाई कर रहे राहुल गाँधी और उनके शिष्य नेता बीजेपी के मुद्दों पर प्रतिक्रिया देकर उनको सफल बनाते थे। अरविन्द केजरीवाल ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी के अलावा किसी मुद्दे पर बात ही नहीं की। अपने मुद्दों से ध्यान भटकने नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी ने अपनी पिच पर ही खेल जारी रखा और बीजेपी के सारे मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया। यही कारण है कि दिल्ली की विधानसभा के लिए जो चुनाव लड़ा गया वह चुनावी राजनीति को समझने के लिए बहुत समय तक संदर्भ का काम करता रहेगा।

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दिल्ली की दिलचस्प लड़ाई

आम आदमी पार्टी के नेता देश में अपनी इकलौती सरकार बचाने के लिए चुनाव लड़ रह थे जबकि बीजेपी के नेता दिल्ली शहर और राज्य में बीजेपी की सत्ता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे। अपने देश में इतनी गहन चुनावी लड़ाई कभी नहीं लड़ी गयी है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी संसाधन चुनाव अभियान में झोंक दिए थे। आम आदमी पार्टी के पास भी चुनाव लड़ने की दिल्ली  शहर में एक ऐसी मशीनरी है जिसको अब तो अजेय ही माना जाएगा।   

इन सब से अलग कांग्रेसी ख़ुश हैं। पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने तो केजरीवाल को बधाई भी दे दी और अपनी ही पार्टी एक वर्ग से हो रही आलोचना को झेल रहे हैं। लगता है कि अपनी पार्टी की कमज़ोरी की चिंता उनको कम है, बीजेपी की हार की ख़ुशी ज़्यादा है। कांग्रेस की तरफ़ से अपना प्रचार कमज़ोर कर देना एक रणनीति भी हो सकती है। 

कांग्रेस की इस रणनीति से बीजेपी के चुनाव प्रबंधक चिंतित हैं। उनको मालूम है कि अन्य राज्यों में भी अगर चुनाव सीधे आमने-सामने का हो गया तो बीजेपी के लिए बहुत ही मुश्किल होगी।

केंद्र की सत्ताधारी और मज़बूत पार्टी को अगर कई राजनीतिक पार्टियों से चुनौती मिलती है तो उसके लिए चुनाव जीतना आसान होता है लेकिन अगर उसके ख़िलाफ़ राजनीतिक पार्टियाँ इकट्ठा हो जाएँ या मुक़ाबला आमने-सामने का हो जाए तो चुनाव जीतना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा।

इसी सोच के आधार पर तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस और उसके अजेय नेता जवाहरलाल नेहरू को चुनौती देने के लिए समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ग़ैर-कांग्रेसवाद की रणनीति का आविष्कार किया था। ग़ैर-कांग्रेसवाद के चलते ही उत्तर भारत के कई राज्यों में 1967 के चुनाव के बाद संविद सरकारें बन गयी थीं। अगर मौजूदा सत्ताधारी पार्टी के सामने भी सभी विपक्षी पार्टियाँ एकजुट होने की रिवाज़ को अपना लेंगी तो बीजेपी के लिए अभी और भी मुश्किल होने वाली है। और यह बीजेपी की मौजूदा मुश्किलों में सबसे गंभीर होगी।

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शेष नारायण सिंह

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