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कोरोना: ट्रंप जैसे नेता ख़तरनाक़ क्यों होते हैं?

किसी देश का नेता अगर समझदार और ज़िम्मेदार न हो तो उसे बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। वह उसे युद्ध में झोंक सकता है, आर्थिक संकट खड़ा कर सकता है और कई बार देशवासियों के लिए स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ भी खड़ी कर सकता है। इसका ताज़ा उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हैं। 

वैसे तो ट्रम्प के चारित्रिक गुणों से आप सब बखूबी वाकिफ़ हैं। वह एक नंबर के नस्लवादी हैं, अहंकारी हैं, बड़बोले हैं और उनकी बुद्धि-विवेक के बारे में कोई बात करना तो वक़्त ज़ाया करना ही है। पिछले तीन साल से वह अमेरिका को कैसे चला रहे हैं, यह पूरी दुनिया जानती है।

इन गुणों की वज़ह से ट्रम्प की अमेरिका और अमेरिका बाहर तीखी आलोचना होती रही है और खिल्ली भी उड़ाई जाती रही है। लेकिन वह फ़िलहाल नए सिरे से निशाने पर हैं और वज़ह है कोरोना वायरस से निपटने के मामले में उनका रवैया। उनके इस रवैये की वज़ह से अमेरिका कोरोना की चपेट में है। अब तक वहाँ साढ़े पाँच सौ से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं, जबकि 43 हज़ार से ज़्यादा कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। कोरोनो के ये रोगी लगभग सभी राज्यों में हैं, जिसका मतलब है कि कोरोना पूरे अमेरिका में फैल चुका है। 

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कोरोनो संकट के इस पैमाने पर बढ़ने के लिए अगर ट्रम्प को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है तो कोई ग़लत नहीं है। पिछले साल दिसंबर के अंत में ही पता चल गया था कि चीन के वुहान शहर में एक नया वायरस फैल रहा है और जनवरी के मध्य तक साफ़ हो गया था कि यह पूरी दुनिया में फैल सकता है। 

कई विशेषज्ञों ने इसकी चेतावनी दी मगर अमेरिकी प्रशासन ने उन पर ध्यान ही नहीं दिया। अमेरिकी अधिकारी ट्रम्प को इसकी इत्तला भी दे रहे थे, मगर उन्होंने उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया। उस समय कोरोना पर काबू पाने के लिए पर्याप्त समय था मगर ट्रम्प के अड़ियल रवैये ने वो मौक़ा गँवा दिया।

ट्रम्प जनवरी के अंत तक यही दोहराते रहे कि चिंता की कोई बात नहीं है। कुछेक मामले सामने आने के बाद भी उनका रवैया बदला नहीं। वह दावा करते रहे कि संक्रमित लोग ठीक हो रहे हैं और जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा। वह अपनी अकड़ में थे मानो उनके सामने कोरोना की भला क्या औकात!

विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ लगातार आँकड़े दे रहा था कि संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है और संक्रमित देशों और रोगियों की संख्या भी उसी रफ़्तार से बढ़ रही है। मगर ट्रम्प पुराने रवैये पर अड़े रहे। वह संकट को नकारते ही नहीं रहे, बल्कि उन्होंने उससे निपटने के लिए तैयारियों पर भी ध्यान नहीं दिया।

स्थिति यह हो गई कि टेस्टिंग किट्स का इंतज़ाम नहीं हुआ। जो थीं, पता चला कि वे टेस्ट करने में फ़ेल हो रही हैं। इसके विकल्प भी मौजूद थे मगर उसने उन पर काम ही नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि कोरोना से निपटने के मामले में अमेरिका चीन, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर से भी पिछड़ गया।

इस बीच ट्रम्प ने दो काम और किए। एक तो कोरोनो को नस्लवादी रूप दे दिया। उन्होंने कोरोना को चीनी वायरस कहना शुरू किया। अभी तक जितने भी वायरस आए हैं किसी को किसी देश का नाम किसी ने नहीं दिया। मगर ट्रम्प ने ऐसा करके चीन के प्रति अपनी नफ़रत का सरेआम इज़हार कर दिया। चीन ने इस पर आपत्ति भी की मगर ट्रम्प ने न माफ़ी माँगी और न ही अपने शब्द वापस लिए। 

फ़रवरी के दूसरे हफ़्ते में ट्रम्प ने यह कहना शुरू कर दिया कि कोरोना संकट चला गया है। उन्होंने दावा किया कि कुछेक मामले रह गए हैं वे भी कुछ दिनों में ख़त्म हो जाएँगे। इस तरह वह अमेरिकी लोगों से झूठ बोलने में लगे हुए थे। उन्होंने यह भी कहना शुरू कर दिया कि तापमान बढ़ने के साथ ही कोरोना वायरस भी ख़त्म हो जाएगा, जबकि इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण अभी तक नहीं आए हैं।

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अभी तक ऐसा दिख रहा था कि ट्रम्प को उन आँकड़ों में कोई दिलचस्पी ही नहीं है जो डब्ल्यूएचओ हर दिन दे रहा है। ये आँकड़े कोरोना के बढ़ते संक्रमण की ओर साफ़ इशारा कर रहे थे। मगर ट्रम्प यह मानने को तैयार ही नहीं थे। वह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर धँसाए सोच रहे थे कि तूफ़ान बिना कुछ किए गुज़र जाएगा।

लेकिन संकट तो बढ़ रहा था और अमेरिकी प्रशासन सुस्त दिख रहा था जिसकी वज़ह से उसकी चारों तरफ़ आलोचना भी हो रही थी। ऐसे में ट्रम्प ने एक और दाँव खेला। उन्होंने ओबामा प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया, जिसका कोई सिर-पैर नहीं था। इसके विपरीत वह दो दशक पहले जॉर्ज बुश के ज़माने में बनी नीति तक का पालन नहीं कर रहे थे। 

इस नीति में कहा गया है कि जनता को सच बताया जाए और उसे विश्वास में लिया जाए। मगर ट्रम्प तो एक नंबर के झूठे आदमी हैं, उन्हें सच से क्या मतलब। वह झूठ पर झूठ बोलते रहे। वह यहाँ तक कहते रहे कि कोरोना वायरस फ्लू के वायरस से भी कम गंभीर है, जबकि आँकड़े कुछ और कह रहे थे। 

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यही नहीं, उन्होंने डींगे हाँकने की अपनी आदत भी नहीं छोड़ी। एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अपनी पीठ ख़ुद ठोकते हुए उन्होंने कहा कि लोग मेरे ज्ञान पर चकित हैं कि मुझे इतनी जानकारी कैसे है। शायद मुझमें यह ख़ूबी कुदरती है। 

अब जाकर उन्हें कोरोना की गंभीरता का एहसास हो गया है। लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी है। उनकी मूर्खताओं की वजह से बहुत सारी क़ीमती जानें चली गई हैं और पूरा अमेरिका कोरोना की चपेट में है। यह नतीजा है घटिया नेतृत्व का। यह सबक है पूरी दुनिया के लिए।

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मुकेश कुमार

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