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राजनीति में भ्रष्टाचार की बड़ी उस्तादी योजना है चुनावी बाँड 

मोदी सरकार को इस बात के लिए हमेशा याद किया जाएगा कि उसने भ्रष्टाचार के राक्षस के मुंह को क़ानूनी बुर्के से ढांप दिया है। उसने इंदिरा-काल के भ्रष्टाचार की अराजकता को वैधता प्रदान कर दी और उसे ऐसा रूप दे दिया कि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया। इसका नाम है- चुनावी बाँड! 

डॉ. वेद प्रताप वैदिक

यह खुशी की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बाँड की व्यवस्था पर तुरंत विचार करने की घोषणा की है। अब 24 मार्च से ही इस मुद्दे पर अदालत में बहस शुरू हो जाएगी, क्योंकि देश के पांच राज्यों में चुनाव शुरू होने वाले हैं। चुनावी बाँड की शुरुआत मोदी सरकार ने 2007 में की थी। 

चुनावी बाँड राजनीति में भ्रष्टाचार की बड़ी उस्तादी योजना है। जिसने भी यह योजना बनाकर मोदी और अरुण जेटली को थमाई थी, उसका दिमाग किसी तस्कर या डाकू से भी अधिक तेज रहा होगा।

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मोदी सरकार को इस बात के लिए हमेशा याद किया जाएगा कि उसने भ्रष्टाचार के राक्षस के मुंह को क़ानूनी बुर्के से ढांप दिया है। उसने इंदिरा-काल के भ्रष्टाचार की अराजकता को वैधता प्रदान कर दी और उसे ऐसा रूप दे दिया कि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया। इसका नाम है- चुनावी बाँड! 

ये चुनावी बाँड पांच प्रकार के होते हैं। एक हजार, 10 हजार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ रुपये के! ये बाँड कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी राजनीतिक दल को दे सकते हैं। पहले वह इन्हें खरीदे और फिर जिसे चाहे उसे दे दे। खरीददार का नाम बिल्कुल गोपनीय रखा जाता है। इसीलिए ये बाँड सिर्फ सरकारी बैंक- स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया बेचता है। 

किसी राजनीतिक दल को कितने बाँड मिले हैं, उसे यह चुनाव आयोग को बताना होगा। इस बाँड-तिकड़म के पहले पार्टियों के लिए चुनाव आयोग को सिर्फ वे ही चंदे बताने होते थे, जो 20 हजार रुपये से ज्यादा के हों। सारी पार्टियां धांधली करती थीं और अपने 80-90 प्रतिशत चंदे 20 हजार से कम के ही बताती थीं। 

राजनीतिक दलों को इस झूठ से बचाने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़े झूठ का आविष्कार कर लिया। अब तक बैंक से 6000 करोड़ रुपये के बाँड खरीदे गए हैं, जिनमें से ज्यादातर बीजेपी को भेंट किए गए, उसके बाद कांग्रेस को और मुट्ठीभर अन्य दलों में बंट गए। 

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चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक ने इन बाँडों पर आपत्ति जाहिर की है। उनका कहना है कि कई फर्जी कंपनियां और पैसेवाले अपनी काली कमाई का यहां इस्तेमाल करते हैं और गोपनीयता की आड़ में पार्टियों को रिश्वत खिलाते हैं। नामी-गिरामी कंपनियां भी इन बाँडों पर फिदा हैं, क्योंकि इनके तहत दिया गया पैसा कर-मुक्त होता है। यानी सरकार ने भ्रष्टाचार की सड़क को सरपट बना दिया है। 

चुनाव के दिनों में इन बाँडों की बिक्री आसमान छूने लगती है, क्योंकि करोड़ों के बाँड खरीदने वालों के नाम बैंक तो छिपाए रखते हैं लेकिन वे खुद जाकर नेताओं को अपने नाम बता देते हैं।
आजकल चुनावी खर्च भी अनाप-शनाप बढ़ गया है। लोकसभा के लिए 70 लाख और विधानसभा के लिए 28 लाख रुपये की छूट तो ऊँट के मुँह में जीरा है। यह सीमा उम्मीदवारों के लिए है। पार्टियों की खर्च की कोई सीमा नहीं है। इसीलिए उनके भ्रष्टाचार की भी कोई सीमा नहीं है।

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)

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डॉ. वेद प्रताप वैदिक

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