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क्या लालू की पार्टी के साथ जाने की होड़ में हैं बीजेपी और जेडीयू?

रणनीतिक पैंतरेबाज़ी सभी पार्टियों की तरफ़ से चल रही है। नीतीश को एक बड़े सहयोगी की ज़रूरत है। आरजेडी को उन्होंने बीच रास्ते में छोड़ दिया था लेकिन तब भी उन्हें फिर से आरजेडी का साथ मिलना असंभव नहीं है। बीजेपी और आरजेडी के बीच रस्साकशी लोकसभा चुनावों के पहले भी हुई थी। लेकिन बीजेपी ने जेडीयू को बराबर सीटें देकर गठबंधन बचा लिया था। लेकिन अब बीजेपी नेता संजय पासवान ने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की तारीफ़ कर नये समीकरण की ओर भी इशारा कर दिया है।
शैलेश

बिहार में बीजेपी के नेता और एमएलसी संजय पासवान का ताज़ा बयान राज्य की राजनीति में सनसनी मचा रहा है। संजय पासवान का कहना है कि बिहार की जनता अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बीजेपी के किसी नेता को देखना चाहती है। इस बयान के ज़रिए पासवान ने मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू के नेता नीतीश कुमार को सीधी चुनौती दी है। संजय पासवान इस तरह का बयान पहले भी देते रहे हैं लेकिन इस बार वह एक क़दम और आगे बढ़े हैं। उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव को उभरता हुआ युवा नेता क़रार दिया है और कहा है कि आरजेडी को साथ लेकर चलने में बीजेपी को कोई परेशानी नहीं है। नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखने के मुद्दे पर बीजेपी के कई नेता पहले भी बयानबाज़ी करते रहते थे। लेकिन कुछ महीनों पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह ने साफ़ कर दिया कि बिहार विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इसके बाद बीजेपी की तरफ़ से बयानबाज़ी पर लगाम लग गया था। लेकिन झारखंड विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के बाद जेडीयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने बीजेपी को एक नयी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू के बीच सीटों का बँटवारा बराबरी के आधार पर नहीं होगा। जेडीयू ज़्यादा सीटों पर लड़ेगी। इसके बाद राजनीतिक तू-तू-मैं-मैं का नया दौर शुरू हुआ।

राजनीतिक पंडित यह भी मान रहे हैं कि झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद जेडीयू का हौसला बुलंद हुआ है। बीजेपी ने झारखंड में अपने सभी सहयोगी दलों को किनारे करके अकेले चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखायी थी। जेडीयू के नेता अब मान रहे हैं कि बीजेपी का ‘एकला चलो’ का रास्ता बंद हो चुका है और सहयोगी दलों के बिना बीजेपी की जीत मुश्किल है। 

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चर्चा यह भी है कि बिहार में नया राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश फिर शुरू हुई है, इसलिए सब सावधानी से क़दम रख रहे हैं। क्या कोई नया राजनीतिक समीकरण सचमुच बन पाएगा? इसे समझने के लिए बिहार में चल रही ताज़ा बयानबाज़ी पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। झारखंड के चुनाव नतीज़ों के बाद बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) में सरगर्मी बढ़ गई है। पार्टी के उपाध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अत्यंत क़रीबी नेता प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार विधानसभा के चुनावों में जेडीयू और बीजेपी के बीच सीटों का बँटवारा बराबरी के आधार पर नहीं होगा। इसके जवाब में उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील मोदी ने कहा कि सीटों के बँटवारे पर फ़ैसला दोनों पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व करेगा। मोदी ने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर शीर्ष नेतृत्व नहीं हैं। 

इसके पहले प्रशांत किशोर और एक अन्य वरिष्ठ नेता पवन वर्मा ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) को भी ग़लत बताया। किशोर ने कहा कि यह क़ानून लोगों से धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। हालाँकि जेडीयू ने लोकसभा में इस क़ानून का समर्थन किया था। प्रशांत किशोर और पवन वर्मा ने इसके ख़िलाफ़ बयान दिया तो लगा यह था कि नीतीश और उनके बीच मतभेद है। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि समर्थन और विरोध दोनों को एक साथ साध कर जेडीयू के नेता, बिहार में अपने मुसलिम आधार को बचाने की कवायद कर रहे हैं। 'कभी हाँ, कभी ना' की इस राजनीति का एक संकेत इससे भी मिलता है कि सीटों के बँटवारे के मुद्दे पर प्रशांत किशोर के बयान को पार्टी के एक अन्य प्रमुख नेता आरसीपी सिंह ने खारिज कर दिया। 

प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार हैं। बीजेपी के साथ बराबर सीटों के बँटवारे का उनका बयान इस साल अक्टूबर-नवंबर में तय विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बीजेपी अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह साफ़ तौर पर घोषणा कर चुके हैं कि विधानसभा चुनाव के अगुआ नीतीश कुमार ही होंगे। लेकिन जेडीयू के नेता यह भी चाहते हैं कि विधानसभा में उनकी पार्टी को ज़्यादा सीटें मिलें ताकि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने पर कोई सवाल खड़ा नहीं हो। 2010 और 2015 के विधानसभा चुनावों के विश्लेषण से पता चलता है कि जदयू की जीत का ग्राफ़ नीचे आया है। 2010 में जेडीयू 141 सीटों पर लड़कर 115 सीटें जीतने में कामयाब रहा था। लेकिन 2015 में 101 सीटों पर लड़ने के बाद उसे सिर्फ़ 71 सीटों पर जीत मिली। 2010 में जेडीयू और बीजेपी साथ थे और 2015 में जेडीयू और राष्ट्रीय जनता दल का नया मोर्चा बना था। 2014 के लोकसभा चुनावों में जेडीयू के अलग होने के बाद भी बीजेपी को शानदार सफलता मिली और 2019 में जेडीयू और बीजेपी का गठजोड़ भी कामयाब रहा। 

नीतीश का मुख्यमंत्री बने रहना क्या आसान?

विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के विश्लेषण से दो बातें साफ़ हैं। पहला तो यह कि बिहार के मतदाता लोकसभा के चुनाव में बीजेपी का समर्थन करते हैं लेकिन विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियाँ और मुद्दे हावी रहते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि बिहार में बीजेपी, जेडीयू और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का गठजोड़ जीत के लिए एक अच्छा कॉम्बिनेशन है। लेकिन इस गठबंधन की जीत के बाद भी नीतीश का मुख्यमंत्री बने रहना आसान नहीं होगा। 2015 में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को 80 और जेडीयू को 71 सीटें मिली थीं, फिर भी लालू यादव ने नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने रखने का फ़ैसला किया। क्या बीजेपी इस बात को स्वीकार करेगी। बीजेपी की अब तक की नीति यह रही है कि गठबंधन की बड़ी पार्टी का नेता ही मुख्यमंत्री बनेगा। इसी नीति के चलते बीजेपी ने महाराष्ट्र में सरकार को त्याग दिया। शिवसेना की माँग सिर्फ़ इतनी थी कि मुख्यमंत्री शिवसेना से बने, जो विधायकों की संख्या के हिसाब से दूसरे नंबर पर थी।
बीजेपी की ‘बड़ी पार्टी का नेता ही मुख्यमंत्री बनेगा’ नीति के कारण जेडीयू और नीतीश कुमार को चुनाव में जीत के साथ-साथ सबसे बड़ी पार्टी बने रहना पड़ेगा और इसलिए जेडीयू ज़्यादा सीटों पर लड़ना चाहती है।

बिहार की सीमाएँ झारखंड से लगी हुई हैं, बल्कि दोनों पहले एक राज्य थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन की जीत ने बिहार में बीजेपी विरोधी मोर्चा में नयी जान फूँकने का काम किया है जो लोकसभा चुनावों में क़रारी हार के बाद सुन्न पड़ गया था। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माँझी, मुकेश सहनी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियों का गठबंधन लोकसभा चुनावों से पहले बन गया था। लेकिन मोदी लहर में पूरा गठबंधन फुस्स पड़ गया। चुनाव नतीजों के बाद गठबंधन टूटने के संकेत भी मिलने लगे थे। माँझी, कुशवाहा और सहनी का मोहभंग दिखायी देने लगा था। लेकिन इनकी मुश्किल यह है कि बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन में इनको जगह मिलनी मुश्किल है। माँझी के सामने पासवान हैं तो कुशवाहा और सहनी को नीतीश कुमार पसंद नहीं करते। 

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बयानबाज़ी राजनीतिक पैंतरा!

एक चर्चा यह भी है कि जेडीयू एक बार फिर से आरजेडी के साथ आ सकता है। लेकिन अभी तक इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव इस तरह के गठबंधन को खारिज कर चुके हैं। जातीय समीकरण के हिसाब से बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी गठबंधन शक्ति संतुलन की स्थिति में है लेकिन जेडीयू की चुनौती इस बार मुसलिम मतदाता बन सकते हैं। नीतीश कुमार की छवि सेक्युलर नेता की है इसलिए मुसलमानों का समर्थन उन्हें भी मिलता रहा है। तीन तलाक़ क़ानून, राम जन्म भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, कश्मीर के विभाजन, नागरिकता क़ानून के बाद भी मुसलमान जेडीयू को समर्थन देंगे या नहीं, इस पर सवाल उठ रहा है। इसके बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का मुद्दा भी है। जिन राज्यों में बंगाली मुसलमान बड़ी तादाद में बसे हैं उनमें बिहार भी है। नीतीश के सामने उनको संभालने की चुनौती है। फ़िलहाल सभी दल विधानसभा के चुनावों की रणनीति बनाने में अभी से जुट गए हैं। बयानबाज़ी राजनीतिक पैंतरा का ही हिस्सा है।

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जेडीयू की चुनौती

जेडीयू की पहली कोशिश बीजेपी से ज़्यादा सीटों पर लड़कर विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बने रहने की है। बदलते राजनीतिक माहौल में यह चुनौती और बड़ी हो गयी है। 

नीतीश की जगह बीजेपी के मुख्यमंत्री की बात करके संजय पासवान ज़्यादा सीटों पर बीजेपी की दावेदारी को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं या फिर बीजेपी भी एक नए राजनीतिक सहयोगी की तलाश में है। क्या सचमुच बीजेपी और आरजेडी का मोर्चा संभव है? क्या लालू और तेजस्वी इसके लिए तैयार हो जाएँगे? जहाँ तक बीजेपी का सवाल है तो वह हरियाणा मॉडल पर काम कर सकती है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में बहुमत जुटा नहीं पाने की स्थिति में बीजेपी ने जननायक जनता पार्टी यानी जेजेपी का साथ पकड़ा। यह समझौता चुनाव नतीजों के बाद हुआ। जेजेपी के नेता दुष्यंत चौटाला के पिता अजय चौटाला भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं। बीजेपी और जेजेपी में समझौता के बाद अजय चौटाला को पैरोल पर बाहर आने का मौक़ा मिल गया। अब चर्चा है कि उन्हें जेल से मुक्त करने की तैयारी भी चल रही है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के पिता लालू यादव भी जेल में हैं। तेजस्वी के ख़िलाफ़ भी कई जाँच चल रही है। क्या इस पर सौदा हो सकता है। लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की मुश्किल यह है कि उसका अस्तित्व 'माई' फ़ैक्टर पर निर्भर है। 'माई' का 'एम' मुसलिम और 'वाई' यादव है। क्या आरजेडी और बीजेपी का गठबंधन होने पर मुसलमान आरजेडी को वोट देंगे? ताज़ा परिस्थितियों में असंभव लगता है। तो क्या संजय पासवान चुनाव के बाद की रणनीति बता रहे हैं? 

क्या संभव है कि चुनाव के बाद परिस्थिति बने तो बीजेपी अपने पुराने सहयोगी जेडीयू को छोड़ कर आरजेडी जैसे नये साथी का हाथ पकड़ सकती है? लेकिन चर्चा तो यह भी है कि नीतीश कुमार भी आरजेडी के साथ जा सकते हैं।

बहरहाल, रणनीतिक पैंतराबाज़ी सभी पार्टियों की तरफ़ से चल रही है। नीतीश कुमार 15 सालों से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन बिहार में उनकी लोकप्रियता उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बंगाल की ममता बनर्जी की तरह बरक़रार है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि नवीन और ममता अपने बूते पर जमे हुए हैं लेकिन नीतीश को एक बड़े सहयोगी की ज़रूरत है। आरजेडी को उन्होंने बीच रास्ते में छोड़ दिया तब भी आरजेडी का साथ मिलना असंभव नहीं है। बीजेपी और जेडीयू के बीच रस्साकशी लोकसभा चुनावों के पहले भी हुई थी। लेकिन बीजेपी ने जेडीयू को बराबर यानी 17 सीटें देकर गठबंधन बचा लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को सिर्फ़ 2 सीटों पर जीत मिली थी पर बीजेपी ने अपनी जीती हुई सीटें भी जेडीयू को देकर मोर्चा बरक़रार रखा। बीजेपी और जेडीयू गठबंधन के तीसरे सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी यानी एलजेपी भी पैंतरेबाज़ी में पीछे नहीं है। एलजेपी के नेता चिराग पासवान ने सभी 243 सीटों पर चुनावी तैयारी का एलान कर दिया है। बहरहाल, सबकी नज़र फ़रवरी में दिल्ली के चुनावों पर है। बीजेपी अगर दिल्ली में कोई चमत्कार नहीं कर पाती है तो उसके सहयोगियों का हौसला और बढ़ेगा।

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