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1962 के लिये नेहरू ज़िम्मेदार तो 20 सैनिकों की मौत की ज़िम्मेदारी लें नरेंद्र मोदी!

भारत एक बार फिर अपने सबसे बड़े और ताक़तवर पड़ोसी चीन के विस्तारवादी इरादों का सामना कर रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा पर ज़बर्दस्त तनाव के हालात बने हुए हैं। वैसे चीन के इरादों और उसकी हरकतों को लेकर पहले भी कई बार सीमा पर तनाव के हालात बनते रहे हैं लेकिन इस बार स्थिति गंभीर है। पिछले 45 वर्षों में यह पहला मौक़ा है जब दोनों देशों के बीच ख़ूनी झड़प हुई है, जिसमें दोनों तरफ़ के सैनिक हताहत हुए हैं।

भारत-चीन के तनाव की जब भी बात हो और 1962 के चीनी हमले का ज़िक्र न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ज़िक्र होना भी चाहिए, क्योंकि भारत और चीन का वह युद्ध हमारे देश की आज़ादी के बाद के इतिहास का एक बेहद दुखद अध्याय है। उस युद्ध में भारत की दारुण हार हुई थी और उसके डेढ़ साल बाद ही 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन से मिले धोखे और युद्ध में मिली हार का सदमा लिए इस संसार से विदा हो गए थे। 

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चीन से युद्ध और नेहरू की मृत्यु, दोनों ही घटनाओं को साढ़े पाँच दशक से ज़्यादा हो गए हैं लेकिन उस युद्ध में चीन से मिली हार के लिए तो देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू से मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी भी जब-तब सवाल करते रहते हैं। कर्कश से कर्कश भाषा में उनकी आलोचना करते हैं और यहाँ तक कि ऐसा करते वक़्त वह अपने पद की मर्यादा और शालीनता को भी भुला देते हैं।

फ़िलहाल चीन की सेना भारतीय सीमा में घुसपैठ कर क़रीब 60 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर चुकी है और उसकी सेना से हुई झड़प में भारत के क़रीब 20 जवान शहीद हो गए हैं। इस बारे में पूछे जा रहे सवालों पर प्रधानमंत्री की पार्टी और सरकार के अन्य नेता तथा मंत्री सवाल पूछने वालों को राजनीति करने से बाज आने की नसीहत दे रहे हैं। उन्हें देशद्रोही तक क़रार दिया जा रहा है।

सवाल है कि लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार से किसी मसले पर सवाल पूछना क्या अपराध है? 1962 में चीनी हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को भी विपक्षी दलों के चुभते हुए सवालों का सामना करना पड़ा था और जवाब में अपनी कमज़ोरी और ग़लती भी स्वीकार करना पड़ी थी। उस समय नेहरू से सवाल पूछने वालों में मौजूदा प्रधानमंत्री की पार्टी के आदिपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे। 

वाजपेयी ने सिर्फ़ सवाल ही नहीं पूछे थे बल्कि जब चीनी आक्रमण चरम पर था, तब अपनी पार्टी जनसंघ के एक प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई करते हुए नेहरू से मुलाक़ात कर संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग भी की थी।

लोकतांत्रिक मिज़ाज के नेहरू बिना किसी ना नुकूर के उनकी माँग से सहमत हो गए थे। वाजपेयी उस समय राज्यसभा के सदस्य हुआ करते थे। 9 नवंबर 1962 को आहूत संसद के विशेष सत्र में उन्होंने राज्यसभा में अपने लंबे भाषण के दौरान सरकार की विदेश और रक्षा नीति को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू पर तीखे हमले किए। कांग्रेस के पास उस समय दोनों सदनों में विशाल बहुमत था लेकिन बिना किसी टोका-टाकी के वाजपेयी और अन्य विपक्षी नेताओं को सुना गया। किसी ने भी उन्हें देशद्रोही क़रार नहीं दिया।

ग़लती हुई तो नेहरू ने स्वीकारी भी

बहस का जवाब देते हुए नेहरू ने कई मामलों में अपनी सरकार की ग़लतियों और कमज़ोरियों को स्वीकार किया। यह थी लोकतंत्र के प्रति नेहरू की प्रतिबद्धता और अपने विरोधियों के प्रति सहिष्णुता। यह अलग बात है कि 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच करगिल संघर्ष के समय जब कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने संसद का सत्र बुलाने की माँग की तो प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी ने उसे ठुकरा दिया।

1962 में नेहरू से सवाल युद्ध के दौरान भी किए गए और युद्ध के बाद भी। संसद में विपक्ष ने उनकी ख़ूब लानत-मलानत की। चीन ने भारत पर हमला कर नेफा यानी वर्तमान अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े भू-भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन की तरफ़ से मिले इस धोखे से बुरी तरह आहत थे। युद्ध के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में एक बार फिर चीनी हमले को लेकर बहस हो रही थी। 

बहस के दौरान नेफा पर चीन के क़ब्ज़े को लेकर नेहरू ने कह दिया कि वह तो बंजर इलाक़ा है, वहाँ घास का एक तिनका तक नहीं उगता। उनके इस कथन पर उन्हें टोकते हुए कांग्रेस के ही दिग्गज सांसद महावीर त्यागी ने जवाबी सवाल दागा, 'पंडित जी, मेरे सिर पर भी एक बाल नहीं उगता, तो क्या मैं भी इसे कटवा दूँ या किसी को दे दूँ?’

कह सकते हैं कि यह एक कुतर्क का जवाबी कुतर्क था। शायद नेहरू को भी तत्काल अहसास हो गया था कि उन्होंने कमज़ोर और ग़लत दलील पेश कर दी है लिहाज़ा उन्होंने अपने मूल स्वभाव के मुताबिक़ कुतर्क के उस सिलसिले को आगे बढ़ाए बगैर अपना भाषण पूरा किया। सदन में न तो नेहरू के कथन पर और न ही महावीर त्यागी के जवाबी कथन पर कोई हंगामा या नारेबाज़ी हुई। 

मौजूदा प्रधानमंत्री से उम्मीद क्या?

उपरोक्त वाकये को सामने रखते हुए क्या हम हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री से वैसी ही राजनीतिक शराफत या संसदीय शालीनता की उम्मीद कर सकते हैं, जैसी नेहरू ने दिखाई थी? सिर्फ़ नेहरू ही क्यों, उनके बाद लाल बहादुर शास्त्री से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक किसी भी प्रधानमंत्री के बाक़ी कामकाज का रिकॉर्ड चाहे जैसा रहा हो लेकिन किसी ने भी संसद में अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ कभी कोई छिछला कटाक्ष नहीं किया।

पिछले छह वर्षों के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कोई भी सवाल पूछे जाने पर प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी ने उसका तार्किक जवाब देने के बजाय अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिए 1962 के युद्ध की हार का उल्लेख किया है। 

यह सच है कि 1962 के युद्ध में चीन से मिली पराजय एक नासूर के समान है, जो आज भी हर भारतीय को दर्द देती है। लेकिन किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि 1962 के बाद चीन कभी सामरिक मामले में भारत पर हावी नहीं हो पाया है।

1962 के युद्ध के बाद जब भी चीन ने भारत के साथ किसी तरह छेड़खानी की है, भारत ने उसको क़रारा जवाब दिया है। इस सिलसिले में 1967 के सितंबर महीने में नाथू ला और अक्टूबर महीने में चाओ लो के संघर्ष को याद किया जा सकता है।

1967 के सितंबर में चीन ने 1962 की तरह धोखे से अचानक सिक्किम के नाथू ला क्षेत्र में हमला कर दिया था। लेकिन भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई से चीनी सेना भौंचक्की रह गई और तीसरे दिन ही उसने युद्ध विराम की पेशकश कर दी। चीनी आँकड़ों के मुताबिक़ ही इस सामरिक संघर्ष में उसके क़रीब 400 सैनिक मारे गए थे।

चूँकि उस दौर में सर्दी शुरू होते ही भारतीय फ़ौज ऊँची चोटियों से नीचे उतर आती थी और 15 दिन पहले ही युद्ध विराम हुआ था, ऐसे में भारतीय फ़ौज के न होने का अनुमान लगाकर चीन ने 1 अक्टूबर 1967 को दोबारा घुसपैठ की। इस बार उसने चाओ ला दर्रे को अपना निशाना बनाया था। लेकिन इस बार रणनीति के तहत भारतीय फ़ौज को सर्दी शुरू हो जाने के बावजूद वहाँ से नहीं हटाया गया, लिहाज़ा अचानक हुए चीनी हमले का जवाब कुछ इस तरह दिया गया कि केवल एक दिन में ही वह मुठभेड़ ख़त्म हो गई। चीनी सेना तगड़ा नुक़सान झेल कर अपनी सीमा में लौट गई। उसके क़रीब 350 सैनिक मारे गए।

चीन के साथ इन दोनों झड़पों में मिली कामयाबी से ही सिक्किम के भारत में विलय की आधार भूमि तैयार हुई और 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 1975 में सिक्किम को भारत में शामिल कर उसे पूर्ण भारतीय राज्य घोषित कर दिया।

हालाँकि चीन के साथ हुई इन दोनों झड़पों में भारतीय सेना के भी क़रीब 80 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद 1975 में अरुणाचल प्रदेश में भारत के चार सैनिक शहीद हुए थे जब चीन के सैनिकों ने घात लगाकर हमला किया था। लेकिन उसके बाद से लेकर 15 जून 2020 तक साढ़े चार दशक के दौरान दोनों देशों के बीच कभी गोलीबारी की नौबत नहीं आई। हालाँकि इस दौरान चीन की ओर से कई बार घुसपैठ की कोशिशें ज़रूर होती रहीं, जिसके चलते दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने डटीं।

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पूर्व प्रधानमंत्रियों को ज़िम्मेदार क्यों ठहराते हैं मोदी?

प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी सिर्फ़ चीन या राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अन्य समस्याओं के लिए ही नहीं बल्कि दूसरी कई समस्याओं के लिए भी नेहरू को और उनके बाद रहे प्रधानमंत्रियों ख़ासकर इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन ऐसा करते वक़्त वह यह भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी को जो कुछ विरासत में मिला, वह नेहरू को नहीं मिला था। नेहरू के समय भारत के पास आज की तरह सुसज्जित फ़ौज, अर्ध सैनिक बल और आज जैसी अत्याधुनिक साधनों से लैस नौ सेना तथा वायु सेना नहीं थी। उनके समय भारत के पास परमाणु बम और मिसाइलें भी नहीं थे। यह सब न होते हुए भी उन्होंने उस समय उपलब्ध संसाधनों और अपनी इच्छाशक्ति के बूते ही हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर, गोवा, सिक्किम, सियाचिन और सरक्रीक को भारतभूमि का अविभाज्य अंग बनाया था।

नेहरू को वैसी मज़बूत और समृद्ध अर्थव्यवस्था भी विरासत में नहीं मिली थी जैसी कि मोदी को मिली और जिसे वह अपने दिशाहीन फ़ैसलों से लगातार तबाह कर रहे हैं।

जिन नवरत्न कंपनियों को मोदी सरकार एक-एक करके निजी हाथों में बेच रही है, उन सबकी नींव नेहरू ने ही रखी थी और जिन्हें भव्य इमारत का रूप में देने में बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी योगदान दिया। उच्च शिक्षा के जिन संस्थानों की आज देश में और देश के बाहर भी प्रतिष्ठा है, वे सब भी मोदी सरकार के पुरुषार्थ से तैयार नहीं हुए बल्कि उसे विरासत में मिले हैं।

देश को नेहरू ने और उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने क्या दिया और क्या नहीं, यह जानने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और उनके सिपहसालारों को अपने ही दिवंगत नेता अटल बिहारी वाजपेयी और मार्गदर्शक बना दिए गए लालकृष्ण आडवाणी के संसदीय भाषणों को सुनना और उनका मनन करना चाहिए। बशर्ते कि विधायकों की खरीद-फरोख्त के ज़रिए विपक्षी दलों की सरकारें गिराने के काम से वे थोड़ी फुर्सत निकाल सकें।

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अनिल जैन

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