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‘हमारे सपनों का मर जाना’: कविताओं में पूरी तरह ज़िंदा हैं पाश!

लेखकों की मृत्यु उनके लेखन की मृत्यु से ही पहचानी जा सकती है। पाश अपनी कविता में पूरी तरह जीवित कवि हैं। इस अर्थ में भी कि उनकी तमाम कवितायें मृत्यु का निषेध करती हैं, मनुष्य को सपनों के मरने के ख़िलाफ़ चेतावनी देती रहती हैं और आज के भयावह फ़ासिस्ट सियासी माहौल में वे और भी अधिक प्रासंगिक बन गयी हैं।
मंगलेश डबराल

‘सबसे ख़तरनाक होता है 

मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना’

‘सबसे ख़तरनाक होता है’ एक ऐसी कविता है जिसे शायद पिछले तीन दशक में जागरूक पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़ा गया। उसके रचनाकार पाश अगर आज होते तो जीवन के सत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। लेकिन 22 मार्च 1988 को महज़ 38 वर्ष की उम्र में उनके गाँव तलवंडी सलेम में खालिस्तानी उग्रवादियों ने उनकी हत्या कर दी। वजह यह थी कि पाश खालिस्तानियों के विरोध और जनता की वास्तविक क्रांति के पक्ष में आवाज़ बुलंद करते थे। लेकिन इस शहादत के बाद पाश की कविता की उम्र बढ़ती गयी है, हिंदी सहित  अनेक भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए और उन्हें क्रांति के स्वप्न को जीवित रखने वाले सबसे बड़े आधुनिक कवि के रूप में प्रतिष्ठा मिली। ‘सबसे ख़तरनाक होता है’ के साथ उनकी एक और कविता भी संघर्ष के गीत की तरह प्रचलित हुई, जिसकी कुछ पंक्तियाँ हैं:

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हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए

हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए

हम लड़ेंगे जब तक

दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है

हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे

कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता

हम लड़ेंगे

कि अब तक लड़े क्यों नहीं

जन-आन्दोलन से उभरे थे पाश

सन 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में शुरू हुए किसान विद्रोह को ‘वसंत गर्जना’ कहा गया था, जिसने बांग्ला, ओडिया, तेलुगु, हिंदी और पंजाबी आदि बहुत-सी भाषाओं में कविता की नयी आग धधकाने का काम किया। पंजाब में नक्सलवाद के प्रभाव में भू-स्वामियों, व्यापारियों और उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा जमाने वाली ताक़तों के बरक्स जन-आन्दोलन हो रहे थे। उसके बीच से कवियों की एक जुझारू पीढ़ी उभर कर आयी, जिसमें अवतार सिंह संधू ‘पाश’ अमरजीत चंदन, लाल सिंह दिल, हरभजन हलवारवी, जगतार, सुखचैन मिस्त्री और दर्शन खटकड़ प्रमुख थे। उनमें कुछ कवियों को ‘नक्सलवादी कविता’ के कारण क़रीब जेल की सज़ा भी भुगतनी पड़ी। इन कवियों में से अब अमरजीत चंदन (जो पाश के सबसे अधिक घनिष्ठ थे और बाद में उन्होंने पाश की डायरियों का सम्पादन भी किया), दर्शन खटकड़ और मिस्त्री ही जीवित हैं हालाँकि नाक्साल्वादी कविता इतिहास की वास्तु बन चुकी है। इन कवियों ने पंजाबी कविता को एक तरफ़ तीखे स्वर की प्रतिबद्ध राजनीतिक चेतना से लैस किया और दूसरी तरफ़ उसे शिवकुमार बटालवी जैसे अत्यंत चहेते और सितारे जैसी हैसियत के कवि की व्यक्तिगत और भावुक रूमानियत से मुक्ति दिलाने का काम किया।

पाश ने सिख गुरुओं की वाणी को भी परिवर्तन की भावना से जोड़ा और पंजाब की मिट्टी में ऐतिहासिक रूप से मौजूद त्याग और बलिदान का जो जज्बा है, उसे क्रांतिकारी सन्दर्भ दिए।

उन दिनों खालिस्तानी आन्दोलन पूरे उफान पर था जिसके ख़िलाफ़ पाश काफ़ी मुखर थे और एक पत्रिका भी संपादित करते थे, इसलिए उन्हें उग्रवादियों से लगातार धमकियाँ मिल रही थीं। जब उनके वामपंथी राजनीतिक स्वर और कविता, दोनों के लिए काफ़ी मुश्किलें पैदा कर दी गयीं तो वे अमेरिका चले गए और वहाँ उन्होंने ‘एंटी-47 फ़्रंट’ का गठन किया जिसके ज़रिये वह खालिस्तान की गुमराह मुहिम की मुखालफत करते रहे। 1988 की शुरुआत में जब वे अपना वीजा बढ़वाने के लिए देश लौटे और 22 मार्च को जब अपने गाँव के कुएँ के पास थे तो खालिस्तानियों ने उन्हें और उनके एक साथी हंसराज को गोलियों से भून डाला। 

17 की उम्र में ही व्यवस्था-विरोधी स्वर

सत्रह वर्ष की उम्र से ही पाश की कविता में व्यवस्था-विरोधी, क्रांतिकारी स्वर उभरने लगा था और 1970 में जब उनका पहला कविता संग्रह ‘लौह-कथा’ प्रकाशित हुआ तो सरकार ने आरोप गढ़कर उन्हें दो वर्ष के लिए जेल में डाल दिया। उसके बाद आये  ‘उडदे  बाजां मगर’, ‘साढे समियां बिच’ और ‘हम लडांगे साथी’ आदि पाँच संग्रह उनके लगातार जनता के साथ चलने और अपने मोर्चे से न डिगने की गवाही हैं।

पाश ने बहुत अधिक कवितायें नहीं लिखीं। उन्हें ज़्यादा लिख पाने की उम्र ही नसीब नहीं हुई। आज उनकी अनोखी पीढ़ी में अमरजीत चंदन जैसे इक्का-दुक्का कवि ही बचे हैं और उनकी कविता के वे तेवर भी मंद हो चले हैं। लेकिन लेखकों की मृत्यु उनके लेखन की मृत्यु से ही पहचानी जा सकती है। पाश अपनी कविता में पूरी तरह जीवित कवि हैं। इस अर्थ में भी कि उनकी तमाम कवितायें मृत्यु का निषेध करती हैं, मनुष्य को सपनों के मरने के ख़िलाफ़ चेतावनी देती रहती हैं। और आज के भयावह फ़ासिस्ट सियासी माहौल में वे और भी अधिक प्रासंगिक बन गयी हैं।

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बीजेपी सरकार को पाश की कविता से ख़तरा!

उनकी कविता ‘सबसे ख़तरनाक होता है’ कुछ वर्ष पहले सीबीएसई की दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल की गयी थी जब विद्यार्थियों के पुराने और जड़ीभूत पाठ्य सामग्री को बदल कर नए समय के अनुरूप बनाने की कोशिश हुई। लेकिन पाँच वर्ष पहले संघ परिवार की बीजेपी सरकार को उससे कोई ख़तरा महसूस हुआ और उसे पढ़ाने पर एक अघोषित-सा प्रतिबन्ध लगा दिया। सरकार पाठ्यक्रम को पूरी तरह बदल नहीं सकी, लेकिन ज़्यादातर माध्यमिक विद्यालयों से कहा गया कि वे बच्चों को यह कविता न पढ़ाएँ और परीक्षा में उससे सम्बंधित प्रश्न भी नहीं पूछे जायेंगे। लेकिन ज़्यादातर शिक्षक इस कविता को पढ़ाना नहीं भूलते। पाश ने एक कविता में जैसे कविता की शक्ति को भी व्याख्यायित किया है:  

‘मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूँगा

मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा।’

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मंगलेश डबराल

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