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क्या हमें सिर्फ़ कश्मीर चाहिए, कश्मीरी नहीं?

पुलवामा हमले में सीआरपीएफ़ के जवानों की शहादत के बाद जो वास्तविक भावनात्मक ज्वार देश में चढ़ा था, वह स्वाभाविक तौर पर धीरे-धीरे उतार पर है। हालाँकि, कुछ सत्ताधारी लोग अपनी छद्म वाहिनियों और उग्र समर्थकों के साथ युद्ध का माहौल बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। यहाँ तक कि इस हमले में भारतीय ख़ुफ़िया-तंत्र की विफलता पर कोई सवाल न उठाकर, कश्मीरियों को इसका ज़िम्मेदार माना जा रहा है और उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों से मार-पीट कर खदेड़े जाने की घटनाएँ सामने आ रही हैं। पहले से ही अलगाववाद का शिकार बने कश्मीरी नौजवानों को चेतना के स्तर पर भारत में पूर्ण रूप से घुलने-मिलने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने से बेदख़ल किया जा रहा है। उन्हें वापस कश्मीर जाकर मुख्यधारा में शामिल होने की आख़िरी उम्मीद छोड़ने और आख़िरकार आतंकवादी गिरोहों की गिरफ़्त में फँसकर हथियार उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

सवाल यह है कि आम कश्मीरियों पर इतनी वीरता दिखाने की जगह ऐसे लोग या इनकी पसंदीदा सरकारें ऐसी स्थितियाँ क्यों नहीं पैदा कर पाईं कि भारत में घुस कर सैनिकों के प्राण लेने वाले मसूद अज़हर, उमर शेख और हाफ़िज़ सईद जैसे दुर्दांत आतंकियों को पाकिस्तान में घुस कर मार दिया जाता?
आज कश्मीरियों पर जो हमले हो रहे हैं, उन्हें जिस तरह शेष भारत के शिक्षा संस्थानों और निजी क्षेत्र की नौकरियों से निकाला जा रहा है, अविश्वास और अपरिचय के विंध्याचल खड़े किए जा रहे हैं, उसे देखते हुए मुझे मेघना गुलज़ार निर्देशित फ़िल्म 'राज़ी' की याद आ रही है।

देश के लिए जान भी न्यौछावर करते हैं कश्मीरी

‘राज़ी’ हरिंदर सिक्का के एक सत्य घटना पर लिखे गए उपन्यास ‘कॉलिंग सेहमत’ पर आधारित है। इसके मूल कथानक के केंद्र में कश्मीर की एक मुसलिम लड़की का जासूसी के लिए एक सैन्य परिवार की बहू बनकर पाकिस्तान जाना और वहाँ भारत के लिए युद्ध की तैयारियों की गोपनीय जानकारियाँ जुटाना शामिल है। एक फ़िल्म, वह भी बॉलीवुड की, देख कर एकबारगी विश्वास नहीं हुआ था कि ऐसा हुआ होगा, पर जब 'द ट्रिब्यून' में इसी वाक़ये को लेकर एक लेख पढ़ा, तो मानना पड़ा कि ऐसा हुआ होगा। फ़िल्म की पृष्ठभूमि सन्‌ 1971 के आस-पास की है, जब पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर्रहमान की गतिविधियों के कारण भारत-पाक संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए थे। तब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली सेहमत खान (आलिया भट्ट) को जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजा जाता है। सेहमत के पिता हिदायत खान (रजित कपूर) उसकी शादी पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी इक़बाल सईद (विक्की कौशल) से करा देते हैं, जिसके परिवार के अन्य लोग भी पाकिस्तानी सेना के उच्चाधिकारी हैं। शादी के पहले सेहमत को ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है कि मात्र ख़ून देख कर गश खा जाने वाली सेहमत वक़्त आने पर किसी इंसान को मारने से भी नहीं चूकती। 

  • सेहमत से जब एक भारतीय अधिकारी पूछता है कि वह यह सब करने के लिए क्यों राज़ी हुईं तो वह जवाब देती है कि अपने मुल्क़ और ख़ुद को वह अलग करके नहीं देखती। वह ख़ुद को ही मुल्क़ मानती है। यह संवाद सेहमत के किरदार को इतने ठोस तरीक़े से परिभाषित करता है कि दर्शकों को यक़ीन हो जाता है कि यह कश्मीरी लड़की देश के लिए कुछ भी कर सकती है।

घोर अविश्वास की वजह अदूरदर्शी नीतियाँ  

कश्मीरियों के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में हो रही ज़्यादतियाँ देख-सुन कर अचानक यह कहानी याद आ जाने की वजह पाठक समझ ही गए होंगे। उनके प्रति पैदा हुए घोर अविश्वास की वजह केंद्र सरकारों की अदूरदर्शी नीतियाँ तो हैं ही, बॉलीवुड की फंतासी फ़िल्में भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म में दाऊद इब्राहीम को पाकिस्तान से खींच कर मारने की कपोल-कल्पित कहानी दिखाई गई थी और कबीर ख़ान की फ़िल्म 'फैंटम' में 26/11 मुंबई हमले का पाकिस्तान में घुस कर बदला लेने का कारनामा दिखाया गया था। इस फ़िल्म की तो कैचलाइन ही थी- ‘काश! यह कहानी सच होती!’ 

बॉलीवुड की ऐसी मसाला फ़िल्में यही तथ्य रेखांकित करती हैं कि वास्तव में हमारे पास जेम्स बॉन्ड जैसे जासूस नहीं हैं, जो दुश्मन देश में जाकर तबाही मचा सकें।

ग़ौर करने की बात यह है कि इन फ़िल्मों को कश्मीर में न के बराबर देखा जाता है और मैदानी इलाक़ों के दर्शक इनसे यह प्रेरणा लेते हैं कि सीमा पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान के साथ-साथ कश्मीर के लोग भी दोषी हैं। कश्मीरियों पर हो रहे ताज़ा हमले इसी समझ और उकसावे का नतीजा हैं।

1971 जैसा ऑपरेशन आज क्यों नहीं

‘राज़ी’ देख कर मेरे मन में भी यह सवाल उठा था कि अगर 1971 में हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ, सेनाएँ और सरकार ऐसे ऑपरेशन को अंजाम दे सकती थीं, तो आज क्यों नहीं? उस समय एक कश्मीरी मुसलमान देश के लिए अपनी बेटी की जान को जोखिम में डाल सकता था, कॉलेज में पढ़ रही एक कश्मीरी लड़की अंजान और ख़तरनाक देश में शादी करके अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगा सकती थी, तो आज क्यों नहीं? हालाँकि पूरे देश में ही नहीं, कश्मीर में भी ऐसे लाखों लोग होंगे, और हैं, जो आज भी देश के लिए जान की बाज़ी लगा सकते हैं, पर शायद हमारी सरकार, सेनाएँ, ख़ुफ़िया एजेंसियाँ उनके पास जाने के लिए तैयार ही नहीं हैं। अविश्वास के चलते हम उनके अस्तित्व को ही स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उल्टे उन्हें यह संदेश दिया जा रहा है कि आपका शेष भारत में स्वागत नहीं है। हमें ख़ुद से यह सवाल भी पूछना होगा कि जब देश के बाक़ी हिस्सों में आतंकी घटनाएँ होती हैं, या हमारे सैनिक मारे जाते हैं, तो क्या हम उन हिस्सों की जनता से ऐसा ही बदला लेते हैं, जैसा कि कश्मीरियों से लिया जा रहा है? 

हमें यह भी याद करना चाहिए कि जब छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ़ के 76 जवान शहीद हुए थे, तो क्या हमने स्थानीय निवासियों को पूरे देश से मार कर भगाना शुरू किया था?

यह भी विचार करना होगा कि ख़ास तौर पर कश्मीरियों और मुसलमानों के प्रति हमारा ऐसा शत्रुता और पूर्वग्रहपूर्ण रवैया क्यों है और चिह्नित करना पड़ेगा कि इस घृणा को खाद-पानी कौन देता है?

कश्मीर के लोग हमें बर्दाश्त क्यों नहीं?

क्या हम कभी एकान्त में अथवा सामूहिक तौर पर गहराई से सोचते और चर्चा करते हैं कि कश्मीर में लगातार सैन्य उपस्थिति और आतंकवादी गतिविधियों के दो पाटों की चक्की में पिस रहे आम कश्मीरियों का जीवन कैसे बीतता होगा? कश्मीर हमारा है, यह कहते हम नहीं थकते, पर जैसे ही कोई सीमा पार से आतंकवादी हमला होता है, कश्मीरी दुश्मन नज़र आने लगते हैं, देश-भर के मुसलमान निशाने पर आ जाते हैं। स्पष्ट है कि हमें कश्मीर तो चाहिए, लेकिन कश्मीर के लोग बर्दाश्त नहीं हैं। हमें जितनी जल्दी हो सके यह दृष्टिकोण बदल लेना चाहिए, वरना मुसीबतें कम होने का नाम नहीं लेंगी और ‘राज़ी’ जैसी फ़िल्म की सेहमत जैसी लड़कियाँ कल्पना में भी नहीं मिलेंगी।

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विजयशंकर चतुर्वेदी

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