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तमिलनाडु: पुलिस हिरासत में मौत के आरोपी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं?

आश्चर्य की बात है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को केवल निलंबित किया गया है। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था जैसा कि अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड के हत्यारों को किया गया। इसके बाद जाँच और मुक़दमा तेज़ी से पूरा किया जाना चाहिए और अगर आरोपी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए...।
जस्टिस मार्कंडेय काटजू

तूतीकोरिन, तमिलनाडु में जो हुआ वो निर्भया मामले से भी बदतर है जिसके लिए हाल ही में 4 लोगों को फाँसी दी गई थी। 

तूतीकोरिन ज़िले के सथानकुलम शहर में मोबाइल एक्सेसरी की दुकान चलाने वाले एक पिता और पुत्र, पी. जयराज और फेलिक्स, को कुछ पुलिसकर्मियों ने बंद के दौरान दुकान खुली रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था। फिर उन्हें थाने ले जाया गया और बेरहमी से मारपीट की गई। ज़ाहिर है कि एक रॉड या लाठी, उनके निजी अंगों में जबरन डाले गए (उनके मलाशय से इतना ख़ून बह रहा था कि तीन बार कपड़े बदलने की ज़रूरत पड़ी)। बाद में उनकी मौत हो गई।

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निर्भया मामले में, एक रॉड को पीड़ित के निजी अंगों में जबरन डाला गया था। ये अपराधी आम नागरिक थे, पुलिस वाले नहीं। यहाँ यह कुकर्म पुलिसकर्मियों द्वारा किया गया है जिनका कर्तव्य क़ानून को बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा करना है।

प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता, 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि फर्ज़ी मुठभेड़ के दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों को मौत की सज़ी दी जानी चाहिए। इसे 'दुर्लभतम' मामला माना जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा :

"पुलिसकर्मी ऐसे व्यक्ति हैं जिनका कर्त्तव्य क़ानून की सुरक्षा करना हैI हमारी राय में यदि अपराध सामान्य लोगों द्वारा किए जाते हैं तो साधारण दंड दिया जाना चाहिए लेकिन अगर पुलिसकर्मियों द्वारा अपराध किया जाता है तो बहुत कठोर दंड दिया जाना चाहिए क्योंकि वे वह काम कर रहे हैं जो पूरी तरह से उनके कर्तव्यों के विपरीत है”।

इसलिए अगर निर्भया के अभियुक्तों को फाँसी दी गई थी तो तूतिकोरिन मामले में सभी पुलिसकर्मी कोर्ट द्वारा दोषी पाए जाने पर इसी सज़ा के हकदार हैं।

नब्बे के दशक में देश में पुलिस हिरासत में मौत के आँकड़े बढ़ रहे थे। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बासू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1996 में अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में नोट किया था। इसलिए धारा 176, आपराधिक प्रक्रिया संहिता में संशोधन किया गया और हिरासत में हुई मौतों की जाँच के लिए एक विशेष प्रक्रिया बनाई गई।

सामान्य अपराधों के लिए, पुलिस द्वारा जाँच की जाती है। लेकिन हिरासत में होने वाली मौतों के लिए धारा 176 में प्रावधान है कि जाँच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही की जानी चाहिए। हिरासत में होने वाली मौतों के लिए इस विशेष प्रावधान को बनाने का उद्देश्य स्पष्ट था: पुलिस किसी सहकर्मी के ख़िलाफ़ निष्पक्ष जाँच नहीं करेगी (क्योंकि अक्सर एक ही सेवा में संग काम करने वाले लोगों की प्रवृत्ति होती है कि वे एक-दूसरे का ही साथ देते हैं)।

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धारा 176 में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें कहा गया हो कि मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच पूरी होने से पहले हिरासत में मौत के आरोपी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। वास्तव में हत्या के मामलों में पुलिस आमतौर पर आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लेती है और जाँच पूरी होने तक ऐसा करने का इंतज़ार नहीं करती।

आश्चर्य की बात है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को केवल निलंबित किया गया है। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था जैसा कि अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड के हत्यारों को किया गया। इसके बाद जाँच और मुक़दमा तेज़ी से पूरा किया जाना चाहिए और अगर आरोपी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए ताकि पूरे भारत में पुलिसकर्मियों को पता चले कि जैसे वे ब्रिटिश राज के दौरान बर्ताव करते थे अब वैसा नहीं चलेगा।
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