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गुजरात दंगा- सांप्रदायिक हिंसा ज्वालामुखी के लावा की तरह: सिब्बल

गुजरात दंगा मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 64 लोगों को दी गई क्लीन चिट को चुनौती देने वाली ज़ाकिया जाफरी की याचिका पर बुधवार को तीसरे दिन सुनवाई हुई। ज़ाकिया की तरफ़ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सांप्रदायिक हिंसा एक ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा की तरह है, जो उस जमीन पर धब्बा छोड़ जाती है जिसे वह छूती है।

ज़ाकिया ने गुजरात दंगे में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य अधिकारियों को एसआईटी की ओर से दी गई क्लीन चिट के ख़िलाफ़ याचिका दायर की है। ज़ाकिया दिवंगत कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी हैं। एहसान की अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसाइटी में हत्या कर दी गई थी।

सिब्बल ने न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सांप्रदायिक हिंसा में उन्होंने भी पाकिस्तान में अपने नाना-नानी को खो दिया है। बेंच में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सी टी रविकुमार भी शामिल थे।

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सिब्बल ने कहा, 'सांप्रदायिक हिंसा ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा की तरह है। यह संस्थागत हिंसा है। वह लावा जहां भी छूता है, वह पृथ्वी को दागदार कर देता है।' 

जाफरी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि वह किसी पर आरोप नहीं लगा रहे हैं, लेकिन दुनिया को एक संदेश भेजा जाना चाहिए कि यह अस्वीकार्य है और इसे सहन नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह एक ऐतिहासिक मामला है क्योंकि चुनाव यह सुनिश्चित करने के बीच है कि कानून का शासन कायम रहेगा या लोगों को आपस में भिड़ने देना चाहिए।

क्लोजर रिपोर्ट पर उठाए थे सवाल 

इससे पहले की सुनवाई में कपिल सिब्बल ने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। अक्टूबर महीने में सुनवाई के दौरान सिब्बल ने बेंच के सामने कहा था कि विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने महत्वपूर्ण सबूतों पर ध्यान नहीं दिया था और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। 

सिब्बल ने बुधवार को कहा, 'नरोदा पाटिया (नरसंहार) मामले में एक स्टिंग ऑपरेशन पर भरोसा किया गया था और किसी को भी इसकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं था, और केवल एसआईटी ने इसे नहीं देखा। पुलिस वायरलेस संदेशों पर भी विचार नहीं किया गया।'

सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

बता दें कि शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त एसआईटी ने दंगों में मोदी की संलिप्तता को दोषमुक्त करने के बाद फ़रवरी 2012 में एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की थी। इसे ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2013 में स्वीकार कर लिया था। गुजरात उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2017 में निर्णय को बरकरार रखा था और तब पीड़ित ज़ाकिया ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पुलिस कंट्रोल रूम में मंत्री?

पिछली सुनवाई के दौरान सिब्बल ने दो मंत्रियों के पुलिस कंट्रोल रूम में होने का सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था, 'आरोप लगाया गया है कि आईके जडेजा, तत्कालीन शहरी विकास मंत्री और अशोक भट क़ानून मंत्री व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री नियंत्रण कक्ष में थे। एसआईटी ने आरोपियों से पूछा कि क्या वे वहां थे या नहीं। एक ने कहा कि मैं वहाँ नहीं था, दूसरे ने कहा कि मैं वहाँ 2-3 घंटे कंट्रोल रूम में था लेकिन मैंने कोई निर्देश नहीं दिया। और एसआईटी ने इसे स्वीकार कर लिया और यह मामला ख़त्म हो गया! यहां तक ​​कि स्थानीय पुलिस भी ऐसा नहीं करेगी! जिसमें एसआईटी ने आरोपी से स्पष्टीकरण मांगा है और वह स्वीकार कर लिया गया है? एक शहरी विकास मंत्री का पुलिस नियंत्रण कक्ष में क्या काम है? किसी को इसकी जांच करनी होगी!'

उन्होंने तत्कालीन गृह राज्य मंत्री और डीजीपी के बयानों में विरोधाभास का भी ज़िक्र किया था। इस पर जस्टिस खानविलकर ने कहा था, 'इस रिपोर्ट में दोनों पहलुओं को नोट किया गया है। उसी के आधार पर निष्कर्ष दिया गया है।' इसके बाद सिब्बल ने पूछा कि लेकिन इस पर जांच क्या हुई?

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