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स्मृतिहीनता के दौर में स्मृति के लिए सजग एक कवि

पिछले कुछ बरसों में शायद ही कोई ऐसा मसला हो जिनको लेकर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी पक्षधरता न दिखाई हो। जब एम एम कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर के साथ अन्य कुछ लोगों की हत्याओं को लेकर हिंदी सहित कई भारतीय भाषाओं के लेखकों और साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए तो मंगलेश डबराल अग्रणी पंक्ति में थे।
रवीन्द्र त्रिपाठी

मंगलेश डबराल (16 मई 1948 – 9 दिसंबर 2020) के नवीनतम और अंतिम काव्य संकलन का नाम है- `स्मृति एक दूसरा समय है’। सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि स्मृति या स्मृतियों की उनके यहाँ एक ख़ास जगह है। अक्सर हम सुनते और पढ़ते रहते हैं, और यह सच भी है कि हम जिस दौर में रह रहे हैं उसमें राजनैतिक सत्ताएँ और पूँजी केंद्रित संस्थाएँ एक स्मृतिहीन समय रचने की कोशिश कर रही हैं। चेक उपन्यासकार मिलान कुंदेरा ने इसी को लक्षित करते हुए लिखा था- ‘मनुष्य का सत्ता के विरुद्ध जो संघर्ष है वो स्मृति की विस्मृति के ख़िलाफ़ लड़ाई है।’

मंगलेश डबराल के यहाँ स्मृति की केंद्रीय उपस्थिति है। उनका पहला काव्य संकलन ‘पहाड़ पर लालटेन’ भी उस कवि और व्यक्ति का अपनी स्मृति को बचाए और बनाए रखने की जद्दोजहद है जो पहाड़ से उतर कर मैदान में आया है। कवि होने के लिए।

इसीलिए उनकी कविताओं में पहाड़ हमेशा मौजूद रहा हालाँकि मैदान भी लगातार विस्तृत होता गया।

आकस्मिक नहीं कि उनकी एक कालजयी रचना ‘गुजरात के मृतक का बयान’ है जो बीसवीं सदी में लिखी गई हिंदी की एक बड़ी कविता है। यह भी मानवीय स्मृति को बचाए रखने के लिए एक प्रयास है। यह समकालीन भारतीय समाज में फैलती और पसरती उस हिंसा का साक्ष्य है जो कई लोगों की नसों में इस तरह प्रवेश कर रहा और कर चुका है कि उनको यह बोध ही नहीं होता है वे अचानक ही क्रूर और हिंसक हो गए हैं।

कौन हैं ऐसे लोग या उन्होंने क्या किया, और क्या कर रहे हैं, यह कविता और उसकी ये पंक्तियाँ इसी की शिनाख्त करती हैं-

“मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गई

वह मुझे बचाने के लिए खड़ी थी मेरे आगे

और मेरे बच्चों का मारा जाना तो पता ही नहीं चला

वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख भी सुनाई नहीं दी

मेरे हाथों में जो हुनर था, पता नहीं उसका क्या हुआ

मेरे हाथों का ही पता नहीं क्या हुआ 

उनमें जो जीवन था, जो हरकत थी, वही थी उनकी कला

और मुझे इस तरह मारा गया

जैसे मारे जा रहे हों एक साथ बहुत से दूसरे लोग 

मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मक़सद नहीं था 

और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मक़सद हो”

यह समय इस पूरी कविता की व्याख्या का नहीं है और न ही मंगलेश जी की बाक़ी कविताओं के विश्लेषण का। लेकिन यह रेखांकित करना आवश्यक है मंगलेश उस तरह की सामाजिक प्रतिबद्धता के कवि थे जो समाज में हो रहे उन बदलावों को लक्षित करते हैं जिनको अमानवीय ताक़तें प्रोत्साहित और प्रेरित कर रही हैं। और ऐसा वह सिर्फ़ कविता लिख कर नहीं करते रहे।

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पिछले कुछ बरसों में शायद ही कोई ऐसा मसला हो जिनको लेकर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी पक्षधरता न दिखाई हो। जब एम एम कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर के साथ अन्य कुछ लोगों की हत्याओं को लेकर हिंदी सहित कई भारतीय भाषाओं के लेखकों और साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए तो मंगलेश डबराल अग्रणी पंक्ति में थे।

कवि होने के साथ-साथ मंगलेश डबराल एक विलक्षण गद्यकार थे। गद्य की कई विधाओं- आलोचना, संस्मरण, अनुवाद आदि में उनका योगदान अलग के इतना बड़ा है कि उनके बारे में बड़े लेखों की ज़रूरत है। देशी-विदेशी कविताओं के अनुवाद तो वह लगभग पचास साल से करते रहे पर दो साल पहले अरूंधती रॉय के उपन्यास `द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का किया हिंदी अनुवाद ‘अपार खुशी का घराना’ हिंदी की उपलब्धि है।

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फ्रांस में रह रहे भारतीय मूल के उपन्यासकार विजय सिंह के एक उपन्यास का अनुवाद अभी प्रकाशित होनेवाला है। जिन विदेशी कवियों के अनुवाद् उन्होंने किए वो अनुवाद-विमर्श के लिहाज से भी उपलब्धि हैं। कई विदेशी भाषाओं में लिखी गई कविताओं को वह हिंदी के मुहावरे में इस तरह ढाल देते थे लगता ही नहीं था कि वे जर्मन, ग्रीक, फ्रांसीसी या किसी भाषा की कविताएँ हैं।

अनुवाद से उनका एक और गहरा नाता था। वह समकालीन हिंदी कविता के उन विरल कवियों में थे जिनकी कविताओं के अनुवाद अंग्रेज़ी सहित कई विदेशी भाषाओं में हुए और हो रहे थे। अभी दो तीन महीने पहले उनकी कई कविताएँ अरबी में प्रकाशित हुईं। वह हिंदी में लिखनेवाले उन कवियों में थे जिनका एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व उभर रहा था।

भारतीय भाषाओं में उनकी कई कविताएँ लगातार अनूदित हुई हैं और वह हिंदी में लिखने वाले एक भारतीय कवि के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।

पिछले साल आई उनकी एक और किताब ‘एक सड़क एक जगह’ एक अद्भुत यात्रा संस्मरण पुस्तक है जो दुनिया के कई देशों की कविताओं और कवियों से परिचित कराती है। यात्रा संस्मरण की विधा में एक अलग तरह का प्रयोग है और इसका गद्य कविता में इस तरह लिपटा हुआ है कि दोनों अभिन्न हो गए हैं। यानी ये कविता और गद्य दोनों एक साथ पढ़ने की अनुभूति कराती हैं। हिंदी में अकेली तरह की पुस्तक जो समकालीन विश्व कविता के बारे में हमारा परिप्रेक्ष्य साफ़ करती है।

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मंगलेश डबराल एक अप्रतिम पत्रकार भी थे। हालाँकि पिछले लगभग सैंतीस बरसों से उनकी पत्रकारीय छवि `जनसत्ता’ को लेकर बनी थी। पर उन्होंने अब बंद हो चुके दो अख़बारों- `हिंदी पेट्रियट’ और `अमृत प्रभात’ में भी लंबे समय तक काम किया। दो बंद हो चुकी पत्रिकाओं- `प्रतिपक्ष’ और `पब्लिक एजंडा’ में भी। इसके अलावा अब बंद हो चुके साप्ताहिक अख़बार `सहारा समय’ में भी। ‘हिंदी पेट्रियट’ को लेकर उनके कुछ क़िस्से बड़े रोचक थे। उनमें एक यह था कि प्रसिद्ध कलाकार जे स्वामीनाथन उस अख़बार में बड़े पद पर थे और उसमें हिंदी में एक जासूसी उपन्यास धारावाहिक रूप से हर हफ्ते लिखते थे। वस्तुत: उस उपन्यास को स्वामीनाथन बोल कर लिखाते थे। मंगलेश जी वो शख्स थे जिनको स्वामीनाथन डिक्टेशन देते थे। जैसा कि मंगलेश जी बताते थे, हर हफ़्ते स्वामी भूल जाते थे कि पिछले हफ़्ते क्या लिखवाया। फिर मंगलेश जी पिछले हफ़्ते वाला स्तंभ पढ़कर सुनाते थे। फिर स्वामी नया एपिसोड लिखाते थे।

बतौर पत्रकार और संपादक मंगलेश डबराल का एक बड़ा योगदान सबिंग या कॉपी एडिटिंग को लेकर है। साधारण लेखों को भी वो थोड़ा फेरबदल कर अनूठा बना देते थे। दिल्ली की पत्रकारिता में इस तरह की कॉपी एडिंटिंग करने वाला कोई दूसरा पत्रकार नहीं हुआ। 

इन दिनों वह अन्य चीजों के अलावा हिंदी के कवि शमशेर बहादुर सिंह की जीवनी लिख रहे थे जो रजा फ़ाउंडेशन से आनेवाली थी। अगर कोरोना ने उनको वक़्त दिया होता तो एक शानदार जीवनी हिंदी में आ जाती।

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रवीन्द्र त्रिपाठी

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