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अफ़्सपा बीजेपी हटाए तो ठीक, कांग्रेस हटाए तो देश के टुकड़े-टुकड़े?

पूर्वोत्तर में अफ़्सपा लागू रखने पर पुनर्विचार करने के कांग्रेस के वायदे पर भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि कांग्रेस देश के टुकड़े-टुकड़े करने पर तुली हुई है। इससे यह साफ़ होता है कि बीजेपी ने इस पर दुहरा रुख़ अपनाया है। जिस पार्टी की सरकार अफ़्सपा को कई जगहों से हटाने का फ़ैसला लेती है, कई दूसरे जगहों से उसे वापस लेने पर विचार करने की बात करती है, वही पार्टी दूसरे दल कांग्रेस के इसी तरह के वायदे पर बिफर कर कहती है कि इससे तो देश को टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।
यदि कांग्रेस अफ़्सपा हटा कर देश के टुकड़े-टुकड़े कर सकती है तो बीजेपी ने कई जगहों पर हटा कर क्या किया, यह सवाल लाज़िमी है। पर कोई पार्टी राजनीतिक फ़ायदे के लिए किसी मुद्दे पर अलग-अलग रवैया कैसे अपना सकती है, यह सवाल पूछा जाना चाहिए।

मोदी सरकार ने मेघालय, त्रिपुरा से अफ़्सपा हटाया

बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार ने मेघालय और त्रिपुरा के कुछ हिस्सों से अफ़्सपा हटाया है। इसके अलावा उसने अलग-अलग समय यह भी आश्वासन दिया था कि जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और अरुणाचल से अफ़्सपा हटाने पर विचार करेगी। बीजेपी ने अफ़्सपा में बदलाव कर उसे लचीला बनाने का भरोसा भी दिया था।

क्या है अफ़्सपा?

अफ़स्पा यानी आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958, के तहत सुरक्षा बलों को यह अधिकार होता है कि वे क़ानून का उल्लंघन करते हुए पाए जाने पर किसी आदमी को गोली मार सकते हैं, बग़ैर सर्च वारंट के तलाशी ले सकते हैं और बग़ैर वारंट के किसी को भी गिरफ़्तार कर सकते हैं। केंद्र  सरकार की अनुमति के बग़ैर सुरक्षा बल के लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता है।

आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट पूर्वोत्तर के असम, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के चुनिंदा इलाक़ों में लगा हुआ है।
  • नरेंद्र मोदी सरकार ने 23 मार्च 2018 को यह फ़ैसला किया कि 1 अप्रैल से मेघालय से अफ़्सपा वापस ले लिया जाए। मेघालय-असम सीमा पर 20 किलोमीटर के दायरे में अफ़्सपा लागू था। तय तारीख़ को मेघालय से अफ़्सपा वापस ले लिया गया।
  • इसी दिन मोदी सरकार ने यह फ़ैसला भी किया कि पूर्वोत्तर में तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों और अफ़सरों की तादाद में कटौती की जाए। 
  • अरुणाचल प्रदेश में अफ़्सपा कई इलाक़ों से हटा दिया गया।
  • असम से सटे इलाक़ों तिरप, लॉन्गदिंग, चॉन्गलॉन्ग के 16 थानों में अफ्सपा लगाया गया था, आठ थाना इलाक़ों से इसे हटा दिया गया। इसके अलावा गृह मंत्रालय ने असम सरकार से कहा कि वह ख़ुद तय करे कि उसे अपने इलाक़ों में अफ़्सपा रखना है या ख़त्म कर देना है। 
  • मोदी सरकार ने साल 2015 में ही त्रिपुरा से यह क़ानून वापस ले लिया था।

अफ़्सपा को बनाएँगे 'मानवीय'

इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने अफ़्सपा में बदलाव कर उसे लचीला बनाने की कोशिश भी की। गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने 20 मार्च को लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में कहा कि अफ़्सपा को ‘ज़्यादा मानवीय और ऑपरेशनल’ बनाने के लिए इसमें परिवर्तन किया जाएगा।
उन्होंने संसद को बताया कि ‘पूर्वोत्तर में लागू आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958 में परिवर्तन कर इसे लचीला, अधिक मानवीय और प्रभावी बनाया जाएगा।’ लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर में लागू आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट, 1990 हटाने पर कोई फ़ैसला नहीं किया गया है।

केंद्र सरकार ने साल 2004 में जस्टिस बी.पी. जीवनरेड्डी की अगुआई में पाँच सदस्यों की एक कमटी बनाई, जिसे यह कहा गया कि वह अफ़्सपा हटाने या उसमें बदलाव करने के मुद्दे पर सिफ़ारिश दे। इस समिति ने 2005 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें कहा गया था कि अनलॉफ़ुल एक्टीविटीज़ प्रीवेन्शन एक्ट, 1967 में बदलाव किया जाना चाहिए ताकि वह अधिक मानवीय और प्रभावी बनाया जा सके।

हालाँकि संसद में केंद्रीय मंत्री अहीर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अफ़्सपा हटाने की फ़िलहाल कोई योजना नहीं है, लेकिन केंद्र के सत्तारूढ़ दल ने पीपल्स डेमोक्रिटेक पार्टी यानी पीडीपी से क़रार करते वक़्त उसे यह आश्वासन दिया था कि वहाँ से अफ़्सपा हटाने पर विचार किया जाएगा।
बीजेपी ने सार्वजनिक रूप से बात घुमाते हुए कहा था कि उनकी सरकार बनने पर अफ़्सपा की कोई ज़रूरत ही नहीं रहेगी और इस क़ानून को वहां से हटा दिया जाएगा। पीडीपी-बीजेपी साझा सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने इस पर कड़ा रुख़ अपनाया था और वह हर हाल में इस क़ानून को राज्य से ख़त्म करवाना चाहती थीं। इस मुद्दे पर बीजेपी से लम्बी बातचीत के बाद यह तय हुआ था कि फ़िलहाल मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। लेकिन सैद्धांतिक तौर पर इस पर पुनर्विचार करने को राजी थी।

जम्मू-कश्मीर बीजेपी ने अफ़्सपा के मुद्दे पर अपनी नीति साल 2014 में ही बदल ली थी। राज्य ईकाई के उपाध्यक्ष रमेश अरोड़ा ने 2 दिसंबर 2014 प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी पार्टी यदि चुनाव जीती और उसकी सरकार बनी तो अफ़्सपा की ज़रूरत ही नहीं होगी। उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना है कि हमारी सरकार बनी तो अफ़्सपा की ज़रूरत ही नहीं होगी। हम ऐसा वातावरण बनाएँगे कि सब कुछ शांति पूर्वक और नियम से चलेगा। इस कठोर क़ानून की आवश्यकता नहीं होगी।’

जम्मू-कश्मीर के सीमाई इलाक़ों राजौरी और पुंछ को 1990 में ‘अशांत’ घोषित कर दिया गया और वहां अफ़्सपा लगा दिया गया। इसके बाद पूरे जम्मू को साल 2000 में  ‘अशांत’ घोषित कर वहां अफ़्सपा लगा दिया गया।

मणिपुर बीजेपी ने साल 2016 में अफ़्सपा हटाने का भरोसा राज्य के लोगों को दिया। राज्य बीजेपी के सचिव चाओबा थोनाओजैम ने 23 मार्च 2016 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी पार्टी अफ़्सपा के ख़िलाफ़ है और वह इसे राज्य से हटाएगी।
दरअसल, बीजेपी ने राष्ट्रवाद का एक ऐसा नैरेटिव तैयार कर रखा है, जो उसकी नीतियों और उग्र हिन्दुत्व के अजेंडे के खाँचे में पूरी तरह फिट बैठता है। उसने पुलावामा आतंकवादी हमले और उसके बाद बालाकोट हवाई हमले को चुनाव का मुद्दा बना लिया और उसका भरपूर राजनीतिक फ़ायदा उठा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुल कर कहा है कि किस तरह उनकी सेना ने पाकिस्तान के अंदर घुस कर मारा और कैसे पाकिस्तान की नींद हराम हो गई। सत्तारूढ़ दल ने  इन हमलों पर सवाल करने वालों को देशद्रोही तक क़रार दिया।
इस वजह से बेरोज़गारी जैसे आम जनता से जुड़े मुद्दे चुनावी बहस से गायब हो गए। बीजेपी की रणनीति भी यही है। ऐसे में जब कांग्रेस ने बेरोज़गारी और दूसरे आर्थिक मुद्दों को अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल किया  तो बीजेपी ने अफ़्सपा का मुद्दा उठा लिया। लेकिन इससे उसका दुहरा चरित्र ही उजागर होता है।

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