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बिहार का चुनावी मुद्दा दलित या रोज़गार?

बिहार में बाढ़ का पानी अभी उतरा नहीं है। कोरोना की महामारी भी ख़तरे की घंटी बजा रही है। मगर, चुनाव का बुखार नेताओं पर चढ़ने लगा है। आप चाहें तो नशा भी समझ सकते हैं, क्योंकि एक नशा सुशांत सिंह मामले को लेकर भी दिख रहा है। बिहार बीजेपी ने सुशांत की तसवीर के साथ पोस्टर बनाया है ‘न भूले हैं ना भूलने देंगे’। मुंबई पुलिस के बाद सीबीआई भी सुशांत की मौत के रहस्य के बारे में कोई खुलासा नहीं कर पायी है। सियासी नशे में नेता भी हैं जो अभी मुद्दा तय करते हुए लड़खड़ा रहे हैं।

‘युवा सरकार’ देंगे तेजस्वी

क्या होगा बिहार में चुनाव का मुद्दा? इस सवाल को लेकर चिंतन-मंथन सत्ताधारी दल में भी है, विपक्ष में भी। और, यह 4 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से चुनाव टलने संबंधी अफवाहों से उलट चुनाव कराने के संकेत के बाद और तेज हो गया है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने एक दिन आगे-पीछे यानी 5 और 6 सितंबर को अपनी-अपनी चुनावी टीमें घोषित कर दी हैं। 
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने चुनावी स्लोगन जारी किया है- ‘नयी सोच नया बिहार/युवा सरकार, अबकी बार।’ एक तरह से मुख्यमंत्री के चेहरे का एलान कर दिया गया है।

दलितों को लुभाने की कोशिश में ‘फंसे’ नीतीश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘दलित’ को सियासी मुद्दा बनाने की कोशिश की है। जिस दलित परिवार में हत्या हो जाए, उस परिवार के सदस्य को नौकरी देने की घोषणा कर नीतीश ने अचानक बिहार का मुद्दा सेट करने की पहल की है। इसकी तुरंत प्रतिक्रिया भी देखने को मिली।

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सियासी चतुराई दिखलायी। उन्होंने नीतीश के कहे गये ‘दलित’ और ‘नौकरी’ शब्दों में से ‘नौकरी’ को पकड़ लिया। कहा कि नौकरी तो हर परिवार को चाहिए। हत्या चाहे किसी की हो, नौकरी सबके लिए ज़रूरी है। इसके साथ ही उन्होंने बिहार में बेरोज़गारी और रोजगार देने में नीतीश सरकार की विफलता का मुद्दा छेड़ दिया।
अब यह तय होना बाकी है कि ‘नौकरी’ और ‘दलित’ में मुद्दा वास्तव में क्या बनने जा रहा है। इस पर बिहार की भावी सियासत निर्भर करने वाली है।

चिंता का सबब बेरोज़गारी

बिहार में रोजगार बड़ी चिंता का सबब है। कोरोना काल में यहां बेरोज़गारी का स्तर 46 फ़ीसदी से भी ज़्यादा हो गया था। आज भी यह दोहरे अंक में है। यहां पक्का रोज़गार करने वाले सिर्फ 12 फ़ीसदी लोग हैं। बाकी लोग खेती या कारोबार करते हैं। कारोबार भी संगठित नहीं, व्यक्तिगत अधिक है।
32 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूरों की मौजूदगी भी नीतीश कुमार के लिए चिंता का विषय है। कोरोना काल में केंद्र-बिहार की एनडीए सरकार से प्रवासी मजदूर निराश हुए हैं। ऐसे में बेरोज़गारी अगर मुद्दा बनती है, तो नीतीश कुमार के लिए परेशानी का सबब हो सकता है।

पप्पू यादव ने सीएम के लिए दिए 3 दलित नाम

जब नीतीश ने दलित को मुद्दा बनाने की कोशिश की, तो इस कोशिश को आगे बढ़ाते हुए और सियासी रूप से नीतीश की घेराबंदी करते हुए पप्पू यादव सामने आ गये। उन्होंने बिहार में अगला सीएम दलित को बनाने की मांग कर डाली और कहा कि जो पार्टी ऐसा करेगी, पप्पू यादव उसके साथ है। उन्होंने तीन नाम सुझाए हैं- मीरा कुमार, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान।

एक तरह से दलित सियासत का मौका पप्पू यादव ने झटकने की कोशिश की है। वहीं उन्होंने बिना बोले यह भी कह डाला है कि नीतीश कुमार अगला सीएम ना हों।

नीतीश के बचाव में उतरे मांझी

नीतीश के ‘दलित’ वाले बयान का एक और मतलब निकाला गया। विरोधी दलों ने जानना चाहा कि अब नौकरी पाने के लिए दलितों को अपने परिजनों की हत्या का इंतजार करना होगा! माहौल उल्टा पड़ता देख जेडीयू को प्रेस कान्फ्रेन्स करनी पड़ी। पार्टी ने कहा कि संविधान में पहले से यह प्रावधान है। वे तो सिर्फ नियम बनाने की बात कर रहे थे। एक तरह से जेडीयू ने परिजनों की हत्या की स्थिति को नौकरी के लिए शर्त बताने जैसे आरोपों से पल्ला झाड़ने की कोशिश की। महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आए जीतन राम मांझी भी इसी तर्क के आधार पर नीतीश का बचाव करने को उतर आए।

दलित सियासत और इसकी अहमयित को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि बिहार में एससी के लिए सुरक्षित सीटें 38 हैं और एक निर्दलीय दलित विधायक हैं। इन 39 विधायकों में एनडीए की ओर निर्दलीय समेत 18 विधायक हैं जबकि महागठबंधन में शामिल या उसके समर्थक दलों में 21 विधायक हैं।

मोदी ने बताया था नीतीश को दलित विरोधी

जेडीयू नेता अब तर्क दे रहे हैं कि बिहार में जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार ही हैं। इसके अलावा स्पीकर जैसे पद पर भी दलित को सम्मान दिलाने का काम जेडीयू ने किया है। मगर, लोग भूले नहीं होंगे जब खुद जीतन राम मांझी ने मुख्यमंत्री से हटाए जाने के बाद नीतीश कुमार को दलित विरोधी कहा था। जीतन राम मांझी ही क्यों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को कौन भुला सकता है जो उन्होंने मुजफ्फरपुर में लोकसभा चुनाव के दौरान दिया था, 

‘जब नीतीश ने हमसे समर्थन वापस लिया था तो मुझे बहुत दुख हुआ था। लेकिन, जब उन्होंने जीतन राम जी जैसे महादलित के साथ भी ऐसा ही किया, तब मैंने सोचा कि उनके राजनीतिक डीएनए में ही कुछ गड़बड़ है।’


नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

दलित वोट की चिंता के पीछे पासवान?

सवाल उठता है कि नीतीश कुमार ने दलितों को लुभाने की कोशिश क्यों की? इसकी जरूरत उन्होंने महसूस की होगी। दलितों का आधार छिटकता दिख रहा होगा। स्थिति यह है कि दलितों को दो बड़े नेता चिराग पासवान और जीतन राम मांझी एनडीए में ही हैं।

नीतीश को दलितों की चिंता सता रही है तो इसकी वजह है एनडीए के भीतर की सियासत, जिसमें चिराग पासवान और नीतीश कुमार में ज़बरदस्त घमासान मचा हुआ है। यह लड़ाई थमने वाली भी नहीं है।
पासवान को बैलेंस करने के लिए मांझी को नीतीश ने अपने साथ जोड़ा है। ऐसे में दलित से लड़ते हुए न दिखें नीतीश- छवि की यही चिंता उन्हें दलितों का हितैषी साबित करने की जरूरत बता रही है।

कोई दलित नहीं?

पासवान जाति को छोड़कर बाकी जातियों को महादलित घोषित करते हुए नीतीश कुमार ने पहले भी दलितों को बाँटने की सियासत की थी। हालांकि आज तकनीकी रूप से बिहार में दलित जाति है ही नहीं। सबके सब महादलित हैं। एक बार फिर ग़ैर- पासवान दलित जातियों को जोड़ने में नीतीश जुटे हैं ताकि चुनाव बाद की परिस्थितियों में भी पासवान के विरोध से लड़ा जा सके।
जेडीयू यह मान कर चल रहा है कि पासवान की पार्टी लोजपा जितनी अधिक सीटें जीतेगी उतनी अधिक दिक्क़त चुनाव के बाद सरकार बनाने में होने वाली है।
आरजेडी दलितों में पैठ रखती है। उसके पास 14 दलित विधायक हैं। श्याम रजक का छिटक कर आरजेडी खेमे में आना तेजस्वी के लिए गिफ्ट की तरह है। इन कारणों से ही नीतीश कुमार दलितों को लुभाने का कार्ड खेल रहे हैं। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि नीतीश दलहित की चिंता कर रहे हैं या दलित की।
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प्रेम कुमार

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