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पीएम केयर्स फंड से बने वेंटिलेटर्स ख़राब, अब तक जांच क्यों नहीं? 

कोरोना महामारी में पीएम केयर्स फंड और उसके द्वारा देश के विभिन्न राज्यों और अस्पतालों में दिए गए वेंटिलेटर्स को लेकर पैदा हुआ विवाद पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा है। पहले इनकी कीमतों और टेंडर पर सवाल उठे तो अब इनकी तकनीक पर। देश के अनेक प्रदेशों से  यह सवाल सामने आ रहा है कि जो वेंटिलेटर्स प्राप्त हुए हैं, उनमें से अधिकाँश चलते ही नहीं। इन वेंटिलेटर्स में सॉफ्टवेयर, प्रेशर ड्रॉप, कुछ समय बाद ख़ुद-ब-ख़ुद बंद होने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। 

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस संबंध में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अधिकाँश वेंटिलेटर्स खराब हैं और यह जांच का विषय है। 

वेंटिलेटर्स में गड़बड़ियों के चलते महाराष्ट्र के सरकारी मेडिकल कॉलेज औरंगाबाद ने तो इनकी जांच करने के लिए मेडिकल एक्सपर्ट्स की कमेटी का ही गठन कर दिया। इस कमेटी ने जांच करके जो रिपोर्ट सौंपी है वह चौंकाने वाली है।

कमेटी ने कहा है कि जिन कंपनियों के ये वेंटिलेटर्स  हैं, वहां के तकनीशियन भी इन्हें ठीक नहीं कर पाए हैं। यानी ये वेंटिलेटर्स अपने आप में अस्पतालों और राज्य सरकारों के लिए एक सिरदर्द साबित हो रहे हैं। 

बड़े घोटाले का संकेत! 

औरंगाबाद मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा अब महाराष्ट्र में अब गरमाने लगा है। कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने कहा कि रिपोर्ट के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि पीएम केयर्स फंड के तहत खरीदे गए ये वेंटिलेटर्स घटिया किस्म के हैं और यह बड़े घोटाले का संकेत दे रहे हैं। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है कि इस मामले की राज्य स्तरीय कमेटी गठित कर जांच कराई जाए। उन्होंने कहा कि यह जनता के पैसे की बर्बादी का मामला है और इस मामले में अब तक मोदी सरकार हर सवाल से इनकार करती रही है। 

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पंजाब में दिक्कत

सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, पीएम केयर्स फंड की ओर से पंजाब में भेजे गए वेंटिलेटर्स को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार के बीच घमासान चल रहा है। केंद्र सरकार ने पंजाब को 809 वेंटिलेटर्स दिए हैं और इनमें से अधिकाँश खराब होने की बात सामने आयी है। 

ताजा मामला फरीदकोट के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का है। यहां पीएम केयर्स फंड के तहत भेजे गए 80 वेंटिलेटर्स में से 71 खराब हैं। ये वेंटिलेटर एजीवीए हेल्थ केयर (AgVa Healthcare) द्वारा पीएम केयर्स फंड के तहत कॉलेज को दिए गए थे। अस्पताल के  डॉक्टरों के हिसाब से "ये  वेंटिलेटर एक या दो घंटे के इस्तेमाल के बाद अपने आप ही बंद हो जाते हैं।”

पंजाब की बाबा फरीद यूनिवर्सिटी में भी पीएम केयर्स फंड द्वारा भेजे गए 62 वेंटिलेटर खराब पड़े हैं। पंजाब सरकार की तरफ से बयान आया है कि उन्होंने वेंटिलेटर्स बनाने वाली संबंधित कंपनी से भी बात की है। कंपनी ने जल्द ही तकनीकी स्टाफ भेज कर इन्हें ठीक करवाने का आश्वासन दिया है। 

मध्य प्रदेश से भी शिकायत

मध्य प्रदेश से भी पीएम केयर्स फंड द्वारा भेजे गए वेंटिलेटर्स को लेकर ऐसी ही शिकायतें प्राप्त हुई हैं। भोपाल का एक मामला प्रकाश में आया है जहां इन वेंटिलेटर्स के कारण मरीज की मौत हो गयी।

भोपाल के हमीदिया अस्पताल के मेडिकल वार्ड-3 में वेंटिलेटर अचानक बंद हो गया। कोविड मरीज को दूसरे वेंटिलेटर पर शिफ्ट करने से पहले ही उसकी जान चली गई। हमीदिया अस्पताल को पीएम केयर्स फंड से अब तक 40 से ज्यादा वेंटिलेटर मिल चुके हैं। इनमें से 9 खराब पड़े हैं। इस अस्पताल ने भी इन वेंटिलेटर्स की शिकायत संबंधित कंपनी से की है।

गहलोत ने मांगी रिपोर्ट 

राजस्थान को पीएम केयर्स फंड से क़रीब डेढ़ हज़ार वेंटिलेटर मिले लेकिन इनमें से अधिकांश में सॉफ्टवेयर, प्रेशर ड्रॉप, कुछ समय बाद ख़ुद-ब-ख़ुद बंद होने समेत कई शिकायतें सामने आ रही हैं। 

डॉक्टरों का कहना है, “मरीज को वेंटिलेटर पर रखने पर हमें बहुत सचेत रहना पड़ता है। वेंटिलेटर दो-तीन घंटे में ख़ुद ही बंद हो जाते हैं। कई बार ऑक्सीजन प्रेशर डाउन हो जाता है। इसमें ऑक्सीजन सेंसर ही नहीं हैं इसलिए पता ही नहीं चलता कि मरीज को कितनी ऑक्सीजन मिल रही है।” 

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन सभी अस्पतालों से रिपोर्ट मांगी है जहाँ-जहाँ ये वेंटिलेटर्स भेजे गए थे। जयपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा सहित अनेक जिला अस्पतालों में पीएम केयर्स वाले 1200 वेंटिलेटर्स लगाए गए और अधिकाँश में प्रेशर ड्रॉप की समस्या है। 

69 में से 58 वेंटिलेटर ख़राब

छत्तीसगढ़ में भी पीएम केयर्स फंड से मिले वेंटिलेटर का मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ डॉक्टरों की बैठक में उठा था। प्रदेश को केंद्र सरकार से मिले 69 में से 58 वेंटिलेटर चल ही नहीं रहे। साथ ही यह भी कहा गया कि बनाने वाली कंपनी से संपर्क करने पर कंपनी में कोई फोन ही नहीं उठा रहा है। इस शिकायत के बाद प्रदेश में आरोप प्रत्यारोप भी शुरू हो गए। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह और बीजेपी के दूसरे नेता राजभवन पंहुच गए। 

रमन सिंह ने कहा, “केंद्र सरकार से जो वेंटिलेटर मिले थे, उनका उपयोग राज्य सरकार ने क्यों नहीं किया? वेंटिलेटर किन परिस्थितियों में खराब हो गए? वे वेंटिलेटर खराब मिले थे या छत्तीसगढ़ में आने के बाद खराब हुए? उन्होंने राज्यपाल से  मामले की जांच की मांग तक कर डाली। 

पीएम केयर्स फंड के तहत खरीदे गए इन वेंटिलेटर्स को लेकर हर राज्य से ऐसी ही शिकायतें आ रही हैं। जहां गैर-बीजेपी सरकारें हैं वहां इस मुद्दे को प्रमुखता उठाया जा रहा है। जबकि बीजेपी व उसकी सहयोगी पार्टियों की राज्य सरकारें इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में हैं।

बिहार: स्टाफ़ की कमी का हवाला 

पीएम केयर्स फंड के तहत बिहार को 500 वेंटिलेटर दिए गए लेकिन पटना के एम्स को छोड़कर राज्य के लगभग सभी सरकारी अस्पतालों में पीएम केयर्स फंड के तहत मिले ये वेंटिलेटर्स अभी तक चालू भी नहीं हो पाए हैं। कहीं स्टाफ़ की कमी का हवाला दिया जा रहा है तो कहीं वेंटिलेटर चलाने के लिए संसाधन की कमी का। 

यूपी में पीएम केयर्स फंड से पांच सौ से भी ज़्यादा वेंटिलेटर दिये गए थे लेकिन ज़्यादातर वेंटिलेटर आज भी अस्पतालों में पड़े हैं और मरीज़ वेंटिलेटर के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। 

राजधानी लखनऊ के केजीएमयू, लोहिया, पीजीआई समेत केवल कुछ ही अस्पतालों में आईसीयू बेड उपलब्ध हैं जहां वेंटिलेटर्स की सुविधा है लेकिन कई अस्पताल ऐसे भी हैं जहां वेंटिलेटर्स हैं तो ज़रूर लेकिन उन्हें अभी तक इंस्टॉल नहीं किया गया है। वजह है प्रशिक्षित स्टाफ का ना होना।

लोगों ने दान की रकम

दरअसल, कोरोना महामारी की शुरुआत में 27 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएम केयर्स फंड का एलान किया था। हालाँकि देश में प्रधानमंत्री राहत कोष पहले से ही मौजूद है। फिर भी प्रधानमंत्री ने देशवासियों से उनके बनाये गए इस नए फंड में सहयोग देने के लिए अपील की। जानी-मानी हस्तियों और औद्योगिक घरानों ने इसमें बड़ी रकम दान की। 

जानकारी देने से इनकार

इस फंड के लिए पैसे देने वालों को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी (सीएसआर) के तहत टैक्स में छूट की सुविधा दी गई। कई मंत्रालयों और सार्वजनिक निगमों में लोगों के वेतन का कुछ हिस्सा काटकर पीएम केयर्स फंड में दान किया गया। इस फंड में कितने पैसे जुटे और उन पैसों का क्या हुआ इसकी जानकारी नहीं मिल सकती क्योंकि सरकार ने इस फंड को काफ़ी आलोचना के बावजूद सूचना के अधिकार संबंधी आरटीआई एक्ट के दायरे से बाहर रखा है। 

18 मई, 2020 को प्रधानमंत्री के सलाहकार भास्कर खुल्बे ने स्वास्थ्य मंत्रालय को एक चिट्ठी लिखी जिसमें पीएम केयर्स फंड से दो हज़ार करोड़ की रकम से 50 हज़ार 'मेड इन इंडिया' वेंटिलेटर्स का ऑर्डर दिए जाने की जानकारी दी थी।

टेक्निकल फ़ीचर्स बदले गए 

इस चिट्ठी से पहले ही स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से वेंटिलेटर ख़रीदने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी। 5 मार्च, 2020 को स्वास्थ्य मंत्रालय के उद्यम एचएलएल लाइफ केयर ने वेंटिलेटर्स की सप्लाई के लिए एक टेंडर निकाला। इस टेंडर प्रक्रिया को लेकर देश भर में अनेक कार्यकर्ताओं ने आरटीआई के तहत जानकारी मांगी। इन जानकारियों से पता चलता है कि एचएलएल ने वेंटिलेटर्स के टेक्निकल फ़ीचर्स की जो लिस्ट जारी की उसे समय-समय पर बदला गया और कुल नौ बार संशोधन किए गए।  

एग्वा हेल्थकेयर को लेकर विवाद

सरकारी उद्यम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) को तीस हज़ार वेंटिलेटर बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला जिसे पूरा करने के लिए उसने मैसूर की कंपनी स्कैनरे की मदद ली। नोएडा की कंपनी एग्वा हेल्थकेयर को दस हज़ार वेंटिलेटर बनाने का ऑर्डर मिला। हैरानी की बात है कि एग्वा के पास वेंटिलेटर बनाने का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए इस कंपनी को टेंडर कैसे मिला इस पर विवाद खड़े हुए। 

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ज्योति सीएनसी पर सवाल

आंध्र प्रदेश सरकार की एक कंपनी आंध्र प्रदेश मेडटेक ज़ोन यानी एएमटीज़ेड को साढ़े तेरह हज़ार वेंटिलेटर बनाने का ऑर्डर मिला। गुजरात के राजकोट की कंपनी ज्योति सीएनसी को पाँच हज़ार वेंटिटेलर का ठेका मिला। ये वही कंपनी है जिसके धमन-1 वेंटिलेटर को लेकर अहमदाबाद के डॉक्टरों ने सवाल खड़े किए थे। इसके बावजूद कंपनी को ऑर्डर दिया गया। 

गुरूग्राम की कंपनी अलाइड मेडिकल को 350 वेंटिलेटर्स का ऑर्डर मिला था। आरटीआई के माध्यम से यह भी जवाब एचएलएल ने दिया कि बीईएल ने 24332, एग्वा ने 5000 और अलाइड मेडिकल ने 350 वेंटिलेटर और बीपीएल के 13 वेंटिलेटरों की सप्लाई की है। इसके बाद से वेंटिलेटर सप्लाई नहीं किए गए हैं। यानी कुल  29695 वेंटिलेटरों की सप्लाई हुई है। 

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अनुभवहीन कंपनी को मिला टेंडर 

इसमें भी कुछ कंपनियों के बारें में ये सवाल उठे कि उनके पास वेंटिलेटर्स बनाने का अनुभव ही नहीं है तो उन्हें टेंडर कैसे मिला। ऐसी ही एक कंपनी है एग्वा हेल्थकेयर। इस कंपनी को नीति आयोग ने ख़ासा प्रचार-प्रसार दिया था लेकिन उसके पास वेंटिलेटर बनाने का कोई तजुर्बा नहीं था। उसे 10 हज़ार वेंटिलेटर का ऑर्डर दिया गया था। 

एग्वा हेल्थकेयर ने कार बनाने वाली कंपनी मारूति की मदद से वेंटिलेटर बनाए। बताया जाता है कि सरकार की ओर से बनाई गई टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी ने 16 मई, 2020 को दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इन वेंटिलेटर्स का ट्रायल किया था। लेकिन एग्वा कंपनी के वैंटिलेटर के बारे में कहा गया कि वे  रेस्पिरेट्री पैरामीटर बनाए नहीं रख पा रहे हैं। बाद में एग्वा वेंटिलेटर्स की दोबारा टेस्टिंग के लिए नई टीम गठित की गई और दोबारा टेस्टिंग हुई। 

सवाल ये है कि देश में बनने वाले इन वेंटिलेटर्स की गुणवत्ता को लेकर जब बार-बार सवाल उठ रहे हैं तो उसकी अब तक जांच क्यों नहीं की गयी? क्या किसी को बचाया जा रहा है? कौन है वो? 

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संजय राय

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