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संसदीय रणनीतिक बैठक में असंतुष्टों से बात करेंगी सोनिया, क्या उनकी सुनेंगी भी?

मंगलवार को होने वाली कांग्रेस संसदीय रणनीतिक बैठक बेहद अहम होगी। इसमें यह साफ़ हो जाएगा कि कांग्रेस नेतृत्व संकट पर उठे सवाल को कैसे ठीक करती है और पार्टी के कथित असंतुष्टों से कैसे निपटती है। इस वर्चुअल बैठक में कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी आनंद शर्मा और ग़ुलाम नबी आज़ाद से बात करेंगी। इससे यह साफ़ हो जाएगा कि पार्टी के कामकाज के तौर तरीकों पर सवाल उठाते हुए चिट्ठी लिखने वाले नेताओं के साथ नेतृत्व क्या करता है।

क्या होगा असंतुष्टों का?

कांग्रेस संसदीय रणनीतिक समूह की बैठक सत्र शुरू होने के पहले इसलिए की जाती है कि पार्टी पूरे सत्र में किन मुद्दों को उठाएगी, सरकार को कैसे घेरेगी और क्या सवाल करेगी, यह तय होता है। ग़ुलाम नबी आज़ाद और आनंद शर्मा इस समूह में हैं। ये दोनों चिट्ठी लिखने वाले 23 लोगों में भी शामिल हैं। समझा जाता है कि पार्टी 14 सितंबर से शुरू होने वाले मानसून सत्र के दौरान सरकार के लाए हुए कुछ अध्यादेशों के मुद्दे को उठाएगी। 
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इसके पहले कुछ सांसदों का एक समूह बनाया गया था, जिसे यह ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वह इन अध्यादेशों का अध्ययन कर पार्टी को सुझाव दे। पर इस समूह में इन 23 नेताओं में से कोई नहीं था। क़ानून के जानकार कपिल सिब्बल और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार शशि थरूर को भी इससे बाहर रखा गया था।

अध्यादेशों पर चर्चा

समझा जाता है कि कांग्रेस संसद में पीएम केअर्स फंड से जुड़े अध्यादेश का विरोध करेगी, पर वह टैक्स से जुड़े अध्यादेश का समर्थन करेगी। इसी तरह सांसदों के वेतन में कटौती का समर्थन किया जाएगा, लेकिन एमपीलैड स्कीम पर दो साल तक रोक लगाने के फ़ैसले का विरोध किया जाएगा। इसी तरह 'एक देश' एक बाज़ार' का विरोध किया जाएगा।
सोनिया गांधी ने अपने निकट के लोगों को संसदीय समिति में शामिल कर यह व्यवस्था कर ली है कि अंसतुष्ट गुट अल्पमत में आ जाए और अलग-अलग पड़ जाए।
चिट्ठी प्रकरण के बाद सोनिया गांधी यह ज़रूर कहा था कि उनके मन में किसी के प्रति कोई दुराव नहीं है और ये सारे लोग उनके सहकर्मी हैं। 
ज़मीनी सचाई यह है कि उन्होंने चिट्ठी लिखने वाले तमाम लोगों को किनारे कर दिया। उन्हें न तो संसदीय समिति में बेहतर स्थान दिया गया न ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बने टास्क फ़ोर्स में शामिल किया गया है।

अलग-थलग पड़ जाएंगे असंतुष्ट?

मंगलवार की बैठक से यह साफ़ हो जाएगा कि पार्टी और ख़ास कर राहुल गांधी व सोनिया गांधी क्या सोचती हैं। क्या इन लोगों की बातें सुनी जाएंगी, उन्हें तरजीह दी जाएगी? या इन लोगों को और दरकिनार किया जाएगा ताकि दूसरे लोगों को भी संकेत मिल जाए? इससे ही पार्टी की दशा-दिशा का संकेत भी मिल जाएगा।
सोनिया गाँधी को भेजे गए इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद, पार्टी के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर, सांसद विवेक तन्खा, एआईसीसी के पदाधिकारी व सीडब्ल्यूसी सदस्यों में- मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्रियों में- भूपिंदर सिंह हुड्डा, राजेंदर कौर भट्टल, एम वीरप्पा मोइली, पृथ्वीराज भवन, पी जे कुरियन, अजय सिंह, रेणुका चौधरी और मिलिंद देवड़ा शामिल हैं। इसके अलावा भी इसमें कई नेता शामिल हैं। 
चिट्ठी में सुधार के एक एजेंडे को पेश किया गया था जो वर्तमान नेतृत्व के लिए काफ़ी चुभने वाला जान पड़ता है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, पत्र में कहा गया था कि एक 'पूर्णकालिक और प्रभावी नेतृत्व' हो जो क्षेत्र में 'नज़र आए' और 'सक्रिय' रहे। इसके साथ ही चिट्ठी में कहा गया था कि नेतृत्व ऐसा हो जो 'संस्थागत नेतृत्व तंत्र' गठित करे और सामूहिक रूप से पार्टी के पुनरुद्धार के लिए मार्गदर्शन करे।
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