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अध्यादेश: 2022 के चुनाव के लिए समाज को बाँटने की तैयारी!

अध्यादेश में अवयस्क महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के धर्म परिवर्तन के लिए इसमें कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। यह अध्यादेश जितना मुसलमानों को केंद्रित करके तैयार हुआ है उतना ही ईसाईयों के विरुद्ध भी है, इसीलिए इसमें सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामले में संबंधित सामाजिक संगठनों की मान्यता रद्द करने और उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने का प्रावधान है। 

अनिल शुक्ल

जिस दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वयस्क जोड़े द्वारा धर्म परिवर्तन करके विवाह करने को वैधानिक तौर पर सही माना और पुलिस और 'राज्य' को इसमें रोक-टोक करने के लिए फ़टकार लगाई, उसके ठीक अगले दिन यूपी सरकार झटपट धर्म परिवर्तन रोकने की नीयत से एक अध्यादेश ले आई। इस अध्यादेश में हालाँकि 'लव जिहाद' का कहीं कोई उल्लेख नहीं है, जिसका मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लम्बे समय से ढिंढोरा पीट रहे थे। 

यह अध्यादेश ऐसे धर्म परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में गिनेगा जो मिथ्या निरूपण, बलपूर्वक, असम्यक प्रभाव, प्रतिपीड़न या कपट रीति से अथवा विवाह द्वारा एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के लिए किया जा रहा हो।

मुसलमानों-ईसाइयों के ख़िलाफ़!

अवयस्क महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के धर्म परिवर्तन के लिए इसमें कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। यह अध्यादेश जितना मुसलमानों को केंद्रित करके तैयार हुआ है उतना ही ईसाईयों के विरुद्ध भी है, इसीलिए इसमें सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामले में संबंधित सामाजिक संगठनों की मान्यता रद्द करने और उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने का प्रावधान है। 

ऐसा धर्म परिवर्तन धोखे और छल से नहीं किया गया है, इसका सबूत देने की ज़िम्मेदारी भी परिवर्तन करने वाले या करवाने वाले की होगी और किसी विहित प्राधिकारी (डीएम) के समक्ष 2 महीने पहले धर्म परिवर्तन की सूचना देनी होगी। इसमें 1 साल से 5 साल की सजा और 15 हज़ार रुपये के दंड (वयस्क महिला, अनुसूचित जाति और जनजाति की महिला के सम्बन्ध में प्रावधान 3 से 10 साल तथा आर्थिक दंड स्वरुप 25 हज़ार रुपये) का है। 

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‘संविधान का उल्लंघन’

उप्र के वरिष्ठ अधिवक्ता अमीर अहमद ज़ाफ़री का कहना है कि “योगी आदित्यनाथ सरकार का अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 25  से 28 का सीधा-सीधा उल्लंघन है। ये सभी मौलिक अधिकार हैं। अनुच्छेद 21 मनुष्य को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है जबकि अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार हैं।”

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अर्थ मात्र एक जीव के अस्तित्व से कहीं अधिक है। मानवीय गरिमा के साथ जीना तथा वे सब पहलू जो जीवन को अर्थपूर्ण तथा जीने योग्य बनाते हैं, इसमें शामिल हैं। न्यायपालिका ने पहले भी कई निर्णयों के माध्यम से इसके दायरे का विस्तार करते हुए इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, त्वरित न्याय, बेहतर पर्यावरण आदि को जोड़ा है। 

2017 में निजता के अधिकार ने इसे और विस्तार दिया। अब जब निजता भी मौलिक अधिकार का हिस्सा बन गई है तो कोई नागरिक अपनी निजता के हनन की स्थिति में याचिका दायर कर न्याय की मांग कर सकता है।

योगी सरकार का अध्यादेश वस्तुतः 1 तीर से 2 शिकार समेटने की नीयत से तैयार किया गया है। यह एक तरफ़ जहाँ मुसलमानों को केंद्रित करता है वहीं, इसकी नज़र ईसाई जमात के आखेट की भी है क्योंकि ऐसा प्रचार किया जाता है कि ग़रीब, बेसहारा, दलित और आदिवासियों के बीच धर्म परिवर्तन की कोशिश क्रिश्चियन संस्थाएं ही ज़्यादा करती हैं। इसमें ज़िला अधिकारी को सूचित करने का प्रावधान है लेकिन विधिक रूप से डीएम में क्या शक्तियां निहित होंगी, इसका कहीं उल्लेख नहीं है। 

देखिए, इस विषय पर चर्चा- 

अध्यादेश में अंतर्विरोध 

पहली दृष्टि में अध्यादेश अंतर्विरोध पूर्ण दिखता है। जब इसमें स्वयं सूचित करने का प्रावधान है तो मध्यस्थ कहाँ से आएगा? तकनीकी तौर पर यह महिलाओं को ज़्यादा क्षति पहुंचाएगा। इसके चलते 'लिव इन रिलेशन' की संभावनाएं ज़्यादा बढ़ जाएंगी और तब जोड़े एक महीने का समय लेकर 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी कर लेंगे। 

Yogi government love jihad ordinance ahead of 2022 UP election - Satya Hindi

सिर्फ़ 2.15 प्रतिशत विवाह अंतर्धार्मिक 

वस्तुतः योगी शासन का ये अध्यादेश बेमेल या जबरिया शादियों की फ़िक्र नहीं करता। आश्चर्य की बात है कि प्रदेश की 67% आबादी ग्रामीण है जहाँ अंतर्धार्मिक विवाह तो दरकिनार, अंतर्जातीय विवाह भी अपवाद स्वरुप ही होते हैं। एक ग़ैर सरकारी संस्था द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार प्रदेश के शहरों में केवल 2.15 प्रतिशत विवाह ही अंतर्धार्मिक होते हैं। 

जिस सरकार को बहुत बड़े पैमाने पर बेरोज़गार युवाओं की चिंता नहीं, वह इतनी छोटी तादाद वाले विवाहों को लेकर बेचैन क्यों है, इसे भली-भांति समझा जा सकता है। दरअसल, अध्यादेश की चौपड़ पर 'लव जिहाद' और इसकी आड़ में सामाजिक विद्वेष को दीर्घ आकार देना ही योगी सरकार का केंद्रीय मुद्दा है।

अगर कोरोना की पीड़ा और आर्थिक विनाश के दंश में डूबे 'प्रदेश' का बहुसंख्य समाज शांत और दुखद मुद्रा में किंकर्तव्यमूढ़ बैठा रह गया तो बीजेपी 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कैसे जीत पायेगी?

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'राम नाम सत्य’ की धमकी 

सामाजिक घृणा और जातिगत उद्वेलन की सीढ़ी के पहले पायदान के रूप में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'लव जेहाद अध्यादेश' लागू करने की घोषणा तो अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में जौनपुर और देवरिया में चुनावी आमसभा में 'राम नाम सत्य’ कर दिए जाने की धमकी भरे नारे के साथ कर दी थी। लेकिन इसकी विधिवत प्रक्रिया की शुरुआत नवंबर के चौथे शुक्रवार को लखनऊ में की गई और अंततः 24 नवम्बर की कैबिनेट मीटिंग में इसे पारित कर दिया गया। 

योगी आदित्यनाथ को पता है कि अप्रैल, 2021 से 'नेशनल रजिस्टर ऑफ़ पॉपुलेशन' (एनआरपी) शुरू होने वाला है। इससे पहले अध्यादेश की आड़ में यूपी पुलिस और 'लव जिहाद' का कवच पहन कर आरएसएस के 'सांस्कृतिक थानेदार', लड़के-लड़कियों की धरपकड़ करके समूचे सूबे को गर्मा देंगे।

ध्रुवीकरण की कोशिश?

बस, फिर क्या? 'एनआरपी' जब शुरू होगा तो 'एनआरसी' और 'सीएए’ का 'टैग' लामुहाला चिपकेगा। मुसलिम मोहल्लों में विवाद भड़केगा (या भड़काया जायेगा), जवाब में हिंदू मोहल्ले सांप्रदायिक रंग की रंगरेज़ी प्रतिक्रिया देंगे। किसी भी चुनाव को जीतने के लिए गुटों में विभक्त (पोलराइज) ज़हर भरे ऐसे समाज से ज़्यादा उन्मुक्त समाज और क्या हो सकता है? यूपी में सन 2022 की पूरी स्क्रिप्ट इस तरह रची जा रही है।

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अनिल शुक्ल

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