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न कन्हैया ख़तरनाक है और न शरजील, उनके क्रोध को महसूस कीजिये

शरजील के स्वर की कड़वाहट को समझना क्या इतना कठिन है? क्या भारत का हिंदू दिल पर हाथ रखकर कह सकता है कि मुसलमानों को पिछले 6 बरस से ज़िल्लत की ज़िंदगी नहीं जीनी पड़ रही है? यह समय शरजील के साथ बिना शर्त खड़े होने का है। इसलिए कि शरजील की तरह के विचार रखने के बावजूद अगर आपका नाम शरजील जैसा नहीं है और अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सामने आप न हों तो शरजील जैसा हश्र आपका कतई न होगा। 
अपूर्वानंद

शरजील ज़्यादा ख़तरनाक है या कन्हैया? क्या आप शरजील के साथ हैं? यह प्रश्न आज के शासक दल के नेताओं और उनके अनुयायियों ने प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों और बेचारे उदारवादियों से पिछले दस दिनों में कई बार किया है। एक राजनीतिक दल, शिव सेना ने माना है कि शरजील कन्हैया से अधिक ख़तरनाक है। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि कुछ भी हो, देश को तोड़ने की बात अस्वीकार्य है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री को चुनौती दे डाली थी कि वह अब तक गिरफ़्तार क्यों नहीं हुआ है! इस चुनौती के अगले दिन पुलिस के दावे के मुताबिक़, उसने शरजील को बिहार में जहानाबाद से गिरफ़्तार किया और शरजील के दोस्तों के अनुसार उसने ख़ुद आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। तो क्या इस फुर्तीली कार्रवाई के लिए पुलिस को बधाई न दी जाए।

शरजील, पुलिस या कहें कि एक मुसलमान विरोधी, बहुसंख्यकवादी राज्य की गिरफ़्त में है। पाँच-पाँच राज्य उसकी ताक में हैं। मीडिया विश्वसनीय स्रोतों के हवाले से सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन कर रहा है। अतिवादी माने जानेवाले संगठनों से शरजील के संबंध होने के दावे क़िए जा रहे हैं और उसे दहशतगर्दों में से एक साबित करने की कोशिश की जा रही है। सामान्य लोगों के पास इन दावों की जाँच करने का कोई रास्ता नहीं है। वैसे ही जैसे कन्हैया, उमर और उनके साथियों पर सरकार और मीडिया के द्वारा लगाए गए आरोपों की पड़ताल का कोई साधन उनके पास न था। इसका नतीजा है कि आज इन्हें ख़तरनाक देशद्रोही मानने वालों की तादाद लाखों में है। इनपर अक्सर हमले होते रहते हैं जिनमें कुछ में इनकी जान भी जा सकती थी। इनके बारे में जो कुछ भी कहा गया, उसमें से कुछ भी साबित नहीं हुआ है। लेकिन आम हिंदुओं के मन में इन्हें लेकर शक और नफ़रत कम होने का नाम नहीं लेती।

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शरजील इन दोनों के मुक़ाबले कहीं अधिक वेध्य है। वह न वामपंथी है, न गाँधीवादी। दोनों के प्रति उसका क्षोभ छिपा हुआ नहीं है। इसलिए उसे अकेला छोड़ दिए जाने और अपने ख़्यालों की सज़ा भुगतने देने के लिए पर्याप्त तर्क हैं। कई भलेमानस मित्रों ने इसी वक़्त उससे वैचारिक बहस भी शुरू कर दी है। वे यह साबित करना चाहते हैं कि शरजील जैसे लोग आज के सरकार विरोधी आंदोलन को नुक़सान पहुँचा रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि शरजील के बयानों से सरकारी पक्ष और भारतीय जनता पार्टी को बल ही मिलेगा और कोई अगर आंदोलन के साथ आना चाहे तो वह इन बयानों से बिदक सकता है। लेकिन इस तर्क में बुनियादी ख़ामी है।

गाँधी ने दलितों के पक्ष में अपनी मुहिम इस कारण नहीं बंद कर दी थी कि आम्बेडकर जैसे दलित नेता ऐसे विचार रखते थे जिनसे गाँधी के सहमत होने का प्रश्न न था। उसी प्रकार भगत सिंह की फाँसी की सज़ा पर पुनर्विचार के लिए जब वह ब्रिटिश हुकूमत से आग्रह कर रहे थे थे तो उनसे वैचारिक शर्त के तौर पर शुद्धता की माँग नहीं कर रहे थे। दलितों के अधिकार के समर्थन का अर्थ यह नहीं है कि उनमें कोई उग्र स्वर हो ही नहीं। यह बात किसी भी ऐसी पहचान के संघर्ष के प्रसंग में सही होगी जो हर प्रकार से अकेली कर दी गई है। उसी पर कटुता का आरोप अन्यायपूर्ण है। उसे समझने की ज़रूरत है, न कि उस पर हमला करने की। इस वक्त मुसलमानों के इस अपमान के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रत्येक मुसलमान से “उत्तम” व्यवहार और “दुरुस्त” राजनीति की शर्त ग़लत है।

शरजील के स्वर की कड़वाहट को समझना क्या इतना कठिन है? क्या भारत का हिंदू दिल पर हाथ रखकर कह सकता है कि मुसलमानों को पिछले 6 बरस से ज़िल्लत की ज़िंदगी नहीं जीनी पड़ रही है? क्या उसे लगातार नीचा नहीं दिखलाया जा रहा? क्या उसे खुलेआम गालियों का सामना नहीं करना पड़ रहा? क्या वह राजकीय और राजनीतिक हिंसा का शिकार नहीं हो रहा? 

क्या यह सच नहीं कि धर्मनिरपेक्ष दल भी हिंदुओं की मुसलमान विरोधी ग्रंथि को सहलाने में एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे हैं और मुसलमानों से मुँह चुरा रहे हैं? फिर शरजील में कड़वाहट क्यों न हो? इसीलिए शरजील से सार्वजनिक विवाद के लिए इससे ग़लत वक़्त और नहीं हो सकता। और यह अनैतिक भी है। सिर्फ़ इस वजह से कि वह इस वाद-विवाद में भाग लेने के लिए आज़ाद नहीं है।

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यह समय शरजील के साथ बिना शर्त खड़े होने का है। इसलिए कि शरजील की तरह के विचार रखने के बावजूद अगर आपका नाम शरजील जैसा नहीं है और अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सामने आप न हों तो शरजील जैसा हश्र आपका कतई न होगा। इसलिए भी उस पर लगाए गए आरोप बिलकुल विचारहीन हैं और मुसलमान विरोधी घृणा से प्रेरित हैं। उनका झूठ यह है कि शरजील भारत से असम या उत्तर-पूर्व को काटने और भारत को तोड़ने की बात कर रहा है। लेकिन वह सिर्फ़ एक लम्बे सड़क जाम की बात कर रहा है। आंदोलन का यह तरीक़ा आज़ाद हिंदुस्तान में अनेक बार अपनाया गया है। जिन्हें शरजील नामधारी आंदोलनकारी की यह माँग देश को तोड़ने वाली लग रही है, वे याद कर लें कि अमरनाथ बोर्ड के नाम पर हिंदू आंदोलनकारियों ने कश्मीर को हिंदुस्तान से लंबे समय के लिए काट दिया था। उन्हें न तो देशद्रोही कहा गया था और न उन पर वे मुक़दमे हुए जो शरजील पर थोप दिए गए हैं।

न कन्हैया ख़तरनाक है और न शरजील। बस! आज का भारत और वह भी हिंदू भारत, इतना समझदार नहीं है कि वह उन्हें ध्यान से सुने। शरजील का क्रोध अपने देश से छले हुए व्यक्ति का क्रोध है। उसे महसूस करिए और ख़ुद पर और जैसा अपना देश होता जा रहा है, उसपर, बेनेडिक्ट एंडरसन के शब्दों में, शर्मिंदा होने की शक्ति जुटाइए।

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