loader
रुझान / नतीजे

बिहार विधानसभा चुनाव 20200 / 243

एनडीए
0
महागठबंधन
0
अन्य
0

चुनाव में दिग्गज

महाराष्ट्र :  खडसे के बाद क्या पंकजा मुंडे भी बीजेपी छोड़ेंगी?

क्या एकनाथ खडसे के पार्टी छोड़ने के बाद पंकजा मुंडे भी अपनी नयी राह चुनने की रणनीति बना रही हैं? या वह भारतीय जनता पार्टी में रहकर ही अपने कद को मज़बूत करने की क़वायद में जुट गयी हैं? महाराष्ट्र बीजेपी में पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के ख़िलाफ़ खडसे की तरह ही पंकजा की नाराज़गी भी समय- समय पर सुर्ख़ियों में रही है। ऐसे में  दशहरे पर बीड के ऐतिहासिक भगवान गढ़ पर सभा कर पंकजा मुंडे ने जो संकेत दिए हैं, उसके कई मायने लगाए जा रहे हैं।

भगवान गढ़ उनके समाज का एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है, जिसे साधकर उनके पिता गोपीनाथ मुंडे ने लोगों में अपनी पकड़ मजबूत की थी। पंकजा ने वहां से घोषणा की है कि आने वाले समय में उन्हें अपने 120 विधायक जितवाने हैं और मुंबई के दादर स्थित शिवाजी पार्क, जहाँ शिवसेना की ऐतिहासिक दशहरा सभाएं होती है, वहाँ बड़ी सभा करनी है।

ख़ास ख़बरें
पंकजा की ये महत्तवाकांक्षी घोषणाएं दो सवाल खड़ी करती हैं। क्या वह बीजेपी में रहकर ऐसा करने वाली हैं या अपनी अलग पार्टी बनाकर? पंकजा मुंडे को लेकर ये सवाल एक साल पहले भी उठे थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

ठाकरे को बताया बड़ा भाई

दरअसल अपने पिता की विरासत वाली सीट पर अपने चचेरे भाई के हाथों पराजय का दंश झेल चुकी पंकजा मुंडे ने हार के बाद अपने पिता द्वारा बनाये गए संगठन 'गोपीनाथ मुंडे प्रतिष्ठान' को फिर से सक्रिय करने और उसके माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक कार्य करने की घोषणा की थी। उस समय देवेंद्र फडणवीस से उनके टकराव के चलते बीजेपी छोड़ने की खबरें गर्म थीं। लेकिन बीजेपी ने पंकजा मुंडे को राष्ट्रीय संगठन में जगह दे दी और क़रीब एक साल बाद वह सक्रिय हुईं तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अपना बड़ा भाई बताया।  

भगवान गढ़ की सभा में पंकजा ने बीड ज़िले के गन्ना तोड़ने वाले मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री व एनसीपी प्रमुख शरद पवार से सहयोग लेने की बात कही। उन्होंने प्रदेश भर में अपनी ताक़त बढ़ाने की अपील कार्यकर्ताओं से की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वह कहीं जाने वाली नहीं है, जहां हैं,  वहीं रहने वाली हैं। 

ओबीसी चेहरा

पंकजा के पिता गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र में ओबीसी समाज के कद्दावर नेता हुआ करते थे। मुंडे के नेतृत्व में एकनाथ खडसे ने भी ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ मज़बूत की थी, लेकिन आज खडसे बीजेपी छोड़ गए हैं।
क्या पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अपने ओबीसी आधार को बनाये रखने के लिए महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे को आगे लाने की रणनीति पर काम कर रहा है?

यह सवाल देवेंद्र फडणवीस को बिहार के विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाये जाने के बाद से ही उठने लगा था कि प्रदेश में बीजेपी के नेतृत्व की डोर क्या किसी और के हाथों में जानी वाली है? 

संगठन में परिवर्तन

ये खबरें भी गर्म हैं कि बिहार चुनाव के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में होने वाले फेरबदल में देवेंद्र फडणवीस को भी स्थान मिल सकता है। ऐसा करके शायद बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व महाराष्ट्र में संगठन में देवेंद्र फडणवीस की कार्यशैली को लेकर उठने वाले विवादों पर अंकुश लगाने की कोशिश करे। सत्ता गंवाने के बाद बीजेपी में देवेंद्र फडणवीस पर लगातार यह आरोप लग रहा है कि वह अपनी टीम बनाने के लिए पुराने नेताओं व कार्यकर्ताओं को हाशिये पर धकेल रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण एकनाथ खडसे विनोद, तावड़े, चंद्रशेखर बावनकुले जैसे नेता हैं, जिन्हें विधानसभा के टिकट ही नहीं दिए गए। 

उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश है और आज शिवसेना उसके साथ नहीं होने के कारण उसे यहां अपनी पकड़ मजबूत बनाये रखना बड़ी चुनौती है। बीजेपी बार बार प्रदेश की महाविकास आघाडी (शिवसेना ,कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस) में विरोधाभास की बात कहकर सरकार गिरने की बात कहती है। 

ठाकरे की रणनीति

केंद्र सरकार की तरफ से जितना दबाव इस सरकार पर बढ़ रहा है उतनी ही अधिक मजबूती इसके घटक दलों में बढ़ती जा रही है।
मुंबई और प्रदेश की अन्य महानगरपालिकाओं के चुनाव साथ मिलकर लड़ने की अब जो ख़बर आ रही है, वह यह संकेत दे रही है कि बीजेपी को अब स्थानीय निकाय संस्थाओं से सत्ता से बाहर करने की रणनीति ठाकरे सरकार ने बना ली है।
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय संस्थाओं पर कई क्षेत्रीय नेताओं का वर्चस्व बना हुआ है। इनमें से ज़्यादातर नेता कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से जुड़े थे, लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में सत्ता के फेर में पाला बदल लिया था। 

अब एक सधी हुई रणनीति के तहत महाविकास आघाडी इन स्थानीय निकाय संस्थाओं पर अपना झंडा फहराना चाहती है। शायद इसलिए भी बीजेपी को अब पंकजा मुंडे और अन्य नाराज़ नेताओं की ज़रूरत आन पड़ी हो। देखना यह है कि बीजेपी इसमें कितना सफल हो पाती है,  क्योंकि 2021 में अधिकांश महानगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं। 

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए


गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
संजय राय

अपनी राय बतायें

महाराष्ट्र से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें