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महामारी पीड़ितों को 'भगवान भरोसे' सौंपने पर उतारू ग़ैर ज़िम्मेदार बीजेपी सरकारें! 

बीजेपी सरकार की प्रशासनिक विफलता का आलम यह है कि राज्य के जूनियर डॉक्टरों के मासिक मानदेय का भुगतान लंबित है और दो बार हड़ताल बेनतीजा है। आयुष डॉक्टर भी हड़ताल पर हैं। यह हाल उस कर्नाटक का है, जिसके स्वास्थ्य मंत्री बी श्रीरामुलु ने कहा कि कोरोना से लड़ाई अब भगवान भरोसे है। क्या है मामला, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अनंत मित्तल।  

कोविड-19 महामारी पीड़ितों की संख्या भारत में दस लाख के पार होने के साथ ही इसकी भयावहता का अंदाजा कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री बी. श्रीरामुलु द्वारा इससे लड़ाई को भगवान भरोसे छोड़ दिए जाने की घोषणा से बखूबी लगाया जा सकता है। 

ताज्जुब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा महामारी के और विकट रूप लेने की चेतावनी के अगले ही दिन बेकाबू हालात के प्रति लाचारगी आईटी में अग्रणी बीजेपी शासित राज्य से नमूदार हुई है।   
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विपक्ष पर बरसे

श्रीरामुलु ने यह बयान कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में एक दिन में 2,344 महामारी पीड़ित सामने आने और राज्य में पीड़ितों की संख्या 50,000 पार करने पर 16 जुलाई को दिया। विपक्षी कांग्रेस ने जब इसे येदियुरप्पा सरकार की नाकामी बता कर सत्ता छोड़ने को कहा तो लोगों का मनोबल तोड़ने की तोहमत श्रीरामुलु ने विपक्ष पर ही जड़ दी। याद रहे कि अप्रैल में लॉकडाउन खुलने के पहले ही दौर में येदियुरप्पा सरकार ने आर्थिक गतिविधियों की झटपट छूट दी थी। 
मई में कर्नाटक में भवन निर्माण और कारखाने भी चालू करवा दिए गए। उनके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन रद्द करके बीजेपी सरकार ने प्रवासी कामगारों को राज्य में ही रहने को मजबूर किया था। हालांकि बिहार में चुनाव और विपक्षी दलों के विरोध के मद्देनज़र केंद्र के दखल पर प्रवासियों को बाद में श्रमिक स्पेशल ट्रेन से घर भेजा गया।
कर्नाटक सरकार पिछले चार महीने में महामारी से लड़ने की पुख्ता तैयारी नहीं कर पाई। इसके अलावा येदियुरप्पा सरकार के तहत महामारी नियंत्रण एवं इलाज संबंधी एजेंसियों में समन्वय का अभाव है।

सरकार की किरकिरी

येदियुरप्पा और उनके मंत्रियों के बीच मध्य प्रदेश की तिरोहित हो चुकी कमलनाथ और राजस्थान की गहलोत सरकार की तरह आपस में ही खींचतान चल रही है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने पहले भी महामारी से लड़ने का जिम्मा चिकित्सा शिक्षा मंत्री के सुधाकर को सौंपा था। श्रीरामुलु मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं, लेकिन महामारी के आगे हथियार डाल कर उन्होंने येदियुरप्पा सरकार की किरकिरी कर दी। 
बेंगलुरू सहित राज्य के कुछ अन्य शहरों को 14 जुलाई से 22 जुलाई तक फिर लॉकडाउन किया गया है। ये हालात तब हैं जबकि राज्य सरकार ने बाहर से आने वालों को सात दिन अनिवार्य संस्थागत क्वरेंटाइन करने में कोई छूट नहीं दी।
बीजेपी सरकार की प्रशासनिक विफलता का आलम यह है कि राज्य के जूनियर डॉक्टरों के मासिक मानदेय का भुगतान लंबित है और दो बार हड़ताल बेनतीजा है। आयुष डॉक्टर भी हड़ताल पर हैं।

बीजेपी का बिहार बदहाल

कर्नाटक की तरह कोरोना हरियाणा, बिहार और असम में भी कुलांचे भर रहा है। बीजेपी के गठबंधन वाली बिहार और असम की सरकार के भी महामारी ने पसीने छुड़ा रखे हैं। बिहार की नीतिश सरकार ने प्रवासियों की बड़ी संख्या में घर वापसी के बावजूद महामारी की जाँच ढीली कर दी थी, जबकि 5000 से ज्यादा आगंतुक महामारी ग्रस्त थे। उनके यहाँ क्वरेंटाइन की व्यवस्था भी लचर थी। 

अब राजधानी पटना में ही संक्रमितों की संख्या रोजाना 650 हो गई। इनमें डॉक्टर, टेक्नीशियन, नर्स आदि शामिल हैं। इससे घबरा कर नीतिश सरकार ने 16 से 31 जुलाई तक लॉकडाउन कर दिया। राज्य में कंटेनमेंट जोन की संख्या 1,000 पार है। 

राज्य, जिला, अनुमंडल और ब्लॉक मुख्यालय के अलावा सभी नगर निकाय, धार्मिक स्थल, पार्क, बाजार, मॉल तथा बसों का परिचालन बंद है। सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोरंजन और खेल-कूद समेत तमाम भीड़भाड़ वाले आयोजन रद्द हैं। सिर्फ राशन, दूध, सब्जी और फल, मांस की दुकानें खुली हैं। 

पीपीई तक नहीं

पटना के 114 इलाकों में ऑटो रिक्शा चलने पर रोक है। संक्रमित कंटेनमेंट जोन में पाबंदियाँ बरक़रार हैं। कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों का इलाज डॉक्टरों को बिना पीपीई और मास्क के करना पड़ रहा है।
एनएमसीएच के जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रवि रमन के अनुसार अस्पताल स्टाफ को प्रबंधन सुरक्षा उपकरण दे नहीं रहा और राज्य सरकार शिथिल है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इसके बावजूद बचाव की साव​धानियों में लापरवाही का उलाहना देकर दोष उन 20,000 लोगों के माथे मढ़ रहे हैं जो संक्रमित हैं।

असम की स्थिति है विषम

असम में भी महामारी पीड़ितों की संख्या 20,000 पार कर गयी है। इस बाढ़ग्रस्त राज्य की बीजेपी गठबंधन सरकार की नाक तले राजधानी गुवाहाटी में ही 10,000 लोग महामारी ग्रस्त हो चुके। मात्र 14 दिन में पीड़ितों की संख्या तिगुनी हो गई।
राज्य में 19 जुलाई तक तीन हफ्ते लंबा लॉकडाउन चल रहा है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बीजेपी को पूर्वोत्तर राज्यों में जमाने वाले हिमंत बिस्व सरमा कसौटी पर हैं। 

खट्टर की नाक के नीचे

इधर दिल्ली से सटे हरियाणा में भी खट्टर सरकार की नाक के नीचे 24,000 से ज्यादा लोग महामारी से पीड़ित हैं। राज्य के सबसे चमकदार शहर गुरुग्राम में पीड़ितों की संख्या 7,000 पार है। मिलनियल सिटी में 100 से अधिक मौत होने के कारण कुल आठ वार्ड यानी 16 से ज्यादा कॉलोनियों में सख़्त लॉकडाउन है।
बीजेपी शासित राज्यों में महामारी का बेकाबू होना केंद्र की मोदी सरकार की लचर नीतियों का ही नतीजा है। समूचे लॉकडाउन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में कार्यकारी घोषणाओं के अलावा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं रहा। 
थाली-घंटे बजाने एवं घर में अंधेरा कर बाहर दीये जलाने जैसे अवैज्ञानिक उपायों को ट्रोल मंडली से लोगों के गले उतरवाने में वे कामयाब रहे। नोटबंदी की तरह ही चार घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन के फरमान से एक अरब 30 करोड़ लोगों के पेट और देश की अर्थव्यवस्था पर सीधी लात मार दी।

तैयारी नहीं?

चीन से पिछले साल दिसंबर में ही कोविड-19 महामारी की ​विकराल चुनौती की भनक लगने के बावजूद भारत सरकार ने मार्च के तीसरे हफ़्ते तक उसके रोकथाम एवं इलाज की कोई  तैयारी नहीं की। हाँ इटली, स्पेन और अमेरिका में महामारी से लोगों के धड़ाधड़ मरने का मंजर देखकर मार्च के चौथे हफ्ते में केंद्र सरकार जागी और जब उसके हाथ पाँव फूले तो आनन फानन में लॉकडाउन कर दिया। 
वे प्रवासी कामगारों, दिहाड़ी मजदूरों, घरों में काम करने वाली बाइयों और पेशेवरों की तकलीफों से भी मुँह चुरा गए। देश भर में प्रवासियों के पैदल घर लौटने का मंजर सामने आने पर भी प्रधानमंत्री उसे नजरअंदाज कर गए। दस लाख लोगों को बीमार और 34 लाख को क्वरेंटाइन करवा के महामारी मात्र '21 दिन में कोविड—19 को हराने' के मोदी के दावे को मुँह चिढ़ा रही है। प्रधानमंत्री 'हार्वर्ड पे हार्ड वर्क' हावी होने का मोदी जुमला भूल कर अब लोगों को महामारी से बचने के उपाय गिना रहे हैं।  

एनसीआर

बीजेपी सरकार की आपराधिक निर्लिप्तता दिल्ली और एनसीआर के मेहनतकश बाशिंदों ने भी बखूबी झेली। यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनसीआर में समन्वयहीनता और घोर प्रशासनिक लापरवाही पर आँखें नहीं तरेरी जातीं तो शायद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जुलाई में भी नमूदार नहीं होते।
 एनसीआर के करीब तीन करोड़ बाशिंदों ने तीन महीने में इतना तनाव, आर्थिक नुक्सान और निराशा झेली जिसकी यहाँ बसते समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों ने अपनी सीमा बंद करके एनसीआर वालों को न घर का छोड़ा न घाट का। 

दिल्ली बेकाबू

दिल्ली और एनसीआर में तेजी से फैलती महामारी से बिगड़ते हालात पर शाह ने जुलाई में दिल्ली-एनसीआर राज्यों से बात की। सर्वोच्च अदालत द्वारा एनसीआर की अनदेखी ख़त्म करके महामारी से निपटने के समन्वित उपाय करने की हिदायत देने पर ही केंद्रीय गृह सचिव ने संबद्ध राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ बैठक की। दिल्ली में भी गृहमंत्री को हालात बेकाबू होने पर ही अपनी ज़िम्मेदारी याद आई। 
केंद्र सरकार के दावे के बावजूद राजधानी दिल्ली के बीजेपी शासित नगर निगम महामारी पीड़ितों की मदद में बीएमसी यानी बंबई महानगर पालिका के पासंग भी साबित नहीं हो रहे। पीड़ित के घर पर नोटिस चस्पाँ करके बस्ती को सील तो नगर निगम फौरन कर रहे हैं मगर मरीज के इलाज या देखभाल से उनका कोई वास्ता नहीं है। 
कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा पीड़ितों को भगवान भरोसे छोड़ने से महामारी की विकरालता से निपटने में मोदी की अगुआई में बीजेपी की विकट प्रशासनिक विफलता बेनकाब हो गई। इसी वजह से अमेरिका के मासाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नॉल्जी यानी एमआईटी की भारत में पीड़ितों की संख्या छह महीने बाद फरवरी 2021 में 2.87 लाख प्रतिदिन पहुँच जाने की आशंका अब डराने लगी है।  
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अनन्त मित्तल

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